पिछले साल अगस्त में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद से ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में तनाव लगातार बढ़ता रहा है। ढाका और अन्य शहरों में भारतीय उच्चायोग और इसके सहायक कार्यालयों को धमकियों का सामना करना पड़ा। इस स्थिति ने यह साफ कर दिया कि आगामी फ़रवरी में होने वाले चुनाव से पहले भारत बांग्लादेश की राजनीतिक दृष्टि में एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है।

ढाका में भारतीय उच्चायोग के आसपास बड़ी भीड़ जमा हो गई थी। नेशनल सिटिज़न पार्टी के नेता हसनत अब्दुल्लाह ने उच्चायुक्त को हटाने की मांग की। भारत ने सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ढाका में अपने मिशनों से संपर्क किया और दिल्ली में बांग्लादेश के राजदूत को तलब किया।
हत्या के बाद भड़की हिंसा
12 दिसंबर को 32 वर्षीय शरीफ़ उस्मान हादी की गोली मारकर हत्या ने बांग्लादेश की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति को और जटिल बना दिया। हादी उस आंदोलन का हिस्सा थे जिसने अगस्त 2024 में प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को सत्ता से हटाया। हादी पर हमला ढाका में बाइक सवार नकाबपोश हमलावरों ने किया था।
हादी की मौत के बाद सोशल मीडिया पर कहा जाने लगा कि हमलावर सीमा पार कर भारत चले गए हैं। इस दावे ने समर्थकों में गुस्सा भड़का दिया और हिंसा की घटनाओं ने ढाका के कई हिस्सों को प्रभावित किया। वीज़ा आवेदन केंद्रों को एक दिन के लिए बंद करना पड़ा और मीडिया संस्थानों पर हमले हुए।
मीडिया पर हमले और भारत समर्थक आरोप
द डेली स्टार और प्रथम आलो जैसे प्रमुख समाचार संगठनों के दफ्तरों पर हमले हुए। विपक्ष का आरोप था कि ये मीडिया हसीना सरकार के सहयोगी और भारत समर्थक थे। हालांकि, इन दोनों संस्थानों ने पिछले साल छात्रों के नेतृत्व में हुए हसीना-विरोधी प्रदर्शनों का समर्थन किया था।
शेख़ हसीना अगस्त 2024 से भारत में रही हैं। अंतरिम सरकार ने उनसे प्रत्यर्पण की मांग की, जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया। इस कारण से दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बढ़ गया है।
चुनावों में भारत की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय निगरानी
भारत ने कहा कि वह बांग्लादेश में शांतिपूर्ण माहौल में स्वतंत्र, निष्पक्ष, समावेशी और विश्वसनीय चुनावों के पक्ष में है। इसका मतलब था कि चुनाव में हसीना की अवामी लीग को शामिल किया जाए। बांग्लादेश की सरकार ने इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया और अपने अनुसार सर्वोच्च मानकों वाले चुनाव कराने की इच्छा जताई।
भारत के विदेश सचिवों और विशेषज्ञों ने भी स्थिति पर ध्यान दिया। उनकी राय थी कि चुनाव में किसी भी प्रकार की हिंसा या ध्रुवीकरण से बचना आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी इस चुनाव की प्रक्रिया पर कड़ी नजर रखे हुए है।
बीएनपी, ख़ालिदा ज़िया और भारत
बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया की स्थिति भी महत्वपूर्ण रही। बीएनपी और भारत के संबंध बीते वर्षों में तनावपूर्ण रहे। इस बार के चुनाव में अवामी लीग को प्रतिबंधित किया गया और बीएनपी को सत्ता में आने की संभावना जताई जा रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ख़ालिदा ज़िया की सेहत के लिए मदद की पेशकश की। इसे बीएनपी के प्रति भारत की नरमी के रूप में देखा गया। ख़ालिदा ज़िया ने बीएनपी की कमान अपने हाथों में ली और देश में बहुदलीय लोकतंत्र की समर्थक रही हैं।
शेख़ हसीना का राजनीतिक योगदान और आलोचना
पूर्व विदेश सचिव निरूपमा राव और अन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि शेख़ हसीना ने हिंसक तत्वों के खिलाफ एक मजबूत दीवार बनाई। उनके पतन ने राजनीतिक अस्थिरता और हिंसा के लिए जगह बनाई। स्टैनली जॉनी और यूसुफ़ ख़ान जैसे विश्लेषक मानते हैं कि हसीना के विरोधियों ने सत्ता के खालीपन को चरमपंथी ताक़तों के पक्ष में भरने का अवसर पाया।
उनके शासनकाल में लोकतंत्र, नागरिक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए प्रयास किए गए। हालांकि उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन उन्होंने हिंसा और अराजकता को रोकने के लिए संस्थागत उपाय अपनाए।
वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियाँ
अगले साल फ़रवरी में होने वाले चुनावों से पहले बांग्लादेश की स्थिति बेहद संवेदनशील है। हिंसक घटनाएँ, भारत विरोधी भावनाएँ और अंतरिम सरकार की नीतियाँ मिलकर राजनीतिक माहौल को अस्थिर कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और भारत की नजर इस प्रक्रिया पर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के बाद भी हिंसा और अराजकता की संभावना बनी रहेगी। जनता में गुस्सा और रोष फैल गया है, और यह स्थिति केवल चुनावों तक ही सीमित नहीं रहेगी।
