महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां बीते वर्षों की कड़वाहट, टूटे रिश्ते और अधूरे वादे एक नई राजनीतिक गणित में बदलते नजर आ रहे हैं। मुंबई के वर्ली इलाके में स्थित होटल ब्लू सी में हुई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस ने न सिर्फ राज्य की सियासत को हिला दिया, बल्कि आने वाले नगर निगम चुनावों की दिशा भी तय कर दी। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ आने की घोषणा ने यह साफ कर दिया कि मराठी अस्मिता और सत्ता की राजनीति एक बार फिर केंद्र में लौट आई है।

इस ऐलान ने केवल गठबंधन की खबर नहीं दी, बल्कि यह भी दिखाया कि राजनीति में स्थायी दुश्मनी या स्थायी दोस्ती जैसी कोई चीज नहीं होती। समय, परिस्थितियां और ज़रूरतें पुराने घावों पर मरहम भी बन जाती हैं।
ब्लू सी होटल: सिर्फ एक इमारत नहीं, राजनीतिक प्रतीक
होटल ब्लू सी मुंबई की उन इमारतों में से एक है, जिसने बीते कुछ वर्षों में कई बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों को करीब से देखा है। वर्ली के समुद्र किनारे स्थित यह होटल अब केवल एक लग्जरी प्रॉपर्टी नहीं, बल्कि सत्ता की राजनीति का प्रतीक बन चुका है। छह साल पहले इसी जगह पर एक ऐसा ऐलान हुआ था, जिसने महाराष्ट्र की राजनीति की दिशा बदल दी थी। उस वक्त इसी होटल में शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के बीच गठबंधन का ऐलान किया गया था।
अब उसी स्थान पर, उसी शहर में, लेकिन बदले हालात और बदले सहयोगियों के साथ, एक नई राजनीतिक कहानी लिखी गई। इस संयोग ने राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या जगहें भी इतिहास को दोहराने का संकेत देती हैं।
ठाकरे भाइयों की साझा मौजूदगी का महत्व
उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का एक साथ मंच साझा करना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संदेश था। वर्षों तक अलग-अलग राजनीतिक राहों पर चलने वाले ये दोनों नेता अब एक साझा लक्ष्य के लिए साथ खड़े नजर आए। यह दृश्य केवल कैमरों के लिए नहीं था, बल्कि यह मराठी राजनीति के उस वर्ग के लिए भी था, जो लंबे समय से इस एकता की प्रतीक्षा कर रहा था।
राज ठाकरे ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में कहा कि मुंबई का मेयर मराठी होगा और मराठी हितों की रक्षा की जाएगी। उनके शब्दों में आक्रामकता कम और दृढ़ता ज्यादा थी, जो यह संकेत देती है कि यह गठबंधन केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि विचारधारा की वापसी भी है।
मराठी अस्मिता फिर केंद्र में
इस गठबंधन की सबसे अहम धुरी मराठी अस्मिता है। मुंबई और महाराष्ट्र की नगर निगम राजनीति में यह मुद्दा हमेशा से निर्णायक रहा है। उद्धव और राज दोनों ने अपने-अपने राजनीतिक जीवन में मराठी पहचान को केंद्र में रखा है, भले ही उनके रास्ते अलग रहे हों।
नगर निगम चुनावों में उतरने का फैसला इस बात का संकेत है कि दोनों दल जमीनी राजनीति पर फोकस करना चाहते हैं। स्थानीय निकाय चुनाव केवल सत्ता का रास्ता नहीं होते, बल्कि वे जनता के रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़े होते हैं। इसी वजह से यह गठबंधन राज्य की राजनीति से ज्यादा शहरों और कस्बों की राजनीति को प्रभावित करेगा।
अतीत की दरारें और उनका बोझ
ठाकरे परिवार के भीतर का राजनीतिक विभाजन महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे चर्चित अध्याय रहा है। बालासाहेब ठाकरे के बाद नेतृत्व, दिशा और शैली को लेकर मतभेद बढ़ते गए। राज ठाकरे ने अलग राह चुनी और मनसे की स्थापना की, जबकि उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की बागडोर संभाली।
इन वर्षों में दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप, कटाक्ष और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों को और जटिल बना दिया। लेकिन समय के साथ यह भी साफ हुआ कि विभाजन का सबसे बड़ा नुकसान मराठी राजनीति को ही हुआ। यही समझ शायद अब एक नए अध्याय की वजह बनी।
2019 की यादें और ब्लू सी का संयोग
ब्लू सी होटल का नाम आते ही 2019 की वह घटना याद आती है, जब इसी जगह पर शिवसेना और बीजेपी के गठबंधन की घोषणा हुई थी। उस वक्त माहौल उत्साह से भरा था और सत्ता का समीकरण मजबूत नजर आ रहा था। लेकिन चुनाव के बाद हालात बदले, वादों पर सवाल उठे और गठबंधन टूट गया।
उद्धव ठाकरे ने बाद में दावा किया था कि मुख्यमंत्री पद को लेकर किए गए वादे पूरे नहीं किए गए। इसी विश्वासघात की भावना ने उन्हें अलग रास्ता चुनने पर मजबूर किया। अब छह साल बाद, उसी होटल में एक नया गठबंधन, पुराने अनुभवों के सबक के साथ सामने आया।
मातोश्री की बैठक और उसके मायने
ब्लू सी में प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले मातोश्री में हुई बंद कमरे की बैठक का भी खास महत्व है। मातोश्री केवल एक आवास नहीं, बल्कि ठाकरे राजनीति का केंद्र रही है। यहां लिए गए फैसलों ने दशकों तक महाराष्ट्र की दिशा तय की है।
अतीत में इसी मातोश्री में हुई बैठकों से बड़े गठबंधन बने और टूटे। इस बार भी मातोश्री की भूमिका पर्दे के पीछे लेकिन निर्णायक मानी जा रही है। यह दर्शाता है कि प्रतीकों और परंपराओं का महत्व महाराष्ट्र की राजनीति में आज भी बना हुआ है।
नगर निगम चुनावों का बढ़ता महत्व
राज्य और केंद्र की राजनीति से इतर, नगर निगम चुनावों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। मुंबई, पुणे, ठाणे जैसे शहर केवल आर्थिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक ताकत का आधार भी हैं। इन शहरों की नगर निगम पर नियंत्रण का मतलब है संसाधनों, विकास परियोजनाओं और स्थानीय राजनीति पर सीधा प्रभाव।
शिवसेना और मनसे का साथ आना इस बात का संकेत है कि दोनों दल इन चुनावों को बेहद गंभीरता से ले रहे हैं। यह गठबंधन न केवल वोटों का जोड़ है, बल्कि संगठनात्मक ताकत का भी मेल है।
संजय राउत की मौजूदगी का संकेत
प्रेस कॉन्फ्रेंस में संजय राउत की मौजूदगी ने यह स्पष्ट किया कि यह गठबंधन केवल प्रतीकात्मक नहीं है। संजय राउत लंबे समय से उद्धव ठाकरे के राजनीतिक विचारों के प्रवक्ता रहे हैं। उनकी मौजूदगी ने इस बात पर मुहर लगा दी कि यह फैसला सोच-समझकर लिया गया है और इसके पीछे रणनीतिक तैयारी है।
राजनीतिक संदेश और भविष्य की राह
यह गठबंधन आने वाले समय में कई समीकरण बदल सकता है। जहां एक ओर सत्ताधारी दलों के लिए यह चुनौती बनेगा, वहीं दूसरी ओर विपक्ष की राजनीति को भी नई दिशा देगा। मराठी वोट बैंक का एकजुट होना कई सीटों पर निर्णायक साबित हो सकता है।
हालांकि यह भी सच है कि गठबंधन को जमीन पर उतारना उतना आसान नहीं होगा। दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच वर्षों की प्रतिस्पर्धा रही है। इस दूरी को पाटना एक बड़ी चुनौती होगी।
राजनीति में संयोग का खेल
ब्लू सी होटल का चुनाव महज संयोग है या सोची-समझी रणनीति, यह कहना मुश्किल है। लेकिन राजनीति में प्रतीकों का अपना महत्व होता है। एक ही जगह पर दो अलग-अलग दौर के गठबंधनों की घोषणा होना यह दिखाता है कि इतिहास खुद को नए संदर्भ में दोहराता है।
जहां एक समय यह जगह टूटे रिश्तों की गवाह बनी थी, वहीं अब यह नए रिश्तों की शुरुआत का मंच बनी है।
