पूर्वी भारत के नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबे समय से सक्रिय माओवादी नेटवर्क को एक बड़ा झटका उस समय लगा, जब कुख्यात नक्सली कमांडर गणेश उइके एक मुठभेड़ में मारा गया। गणेश उइके वही नाम था, जिसे माओवादी संगठन की रीढ़ माना जाता था और जिस पर एक करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था। उसकी मौत को न केवल ओडिशा बल्कि पूरे पूर्वी और मध्य भारत में नक्सल विरोधी अभियान की अब तक की सबसे बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

ओडिशा के कंधमाल जिले के घने जंगलों में हुई इस कार्रवाई ने यह संकेत दिया है कि नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। सुरक्षा बलों द्वारा की गई सटीक रणनीति, खुफिया सूचनाओं की मजबूती और लगातार दबाव के चलते माओवादी नेतृत्व पूरी तरह बिखरता नजर आ रहा है।
कौन था गणेश उइके और क्यों था वह नक्सलियों का सबसे बड़ा चेहरा
गणेश उइके नक्सली संगठन की सेंट्रल कमेटी का सक्रिय सदस्य था। वह केवल एक फील्ड कमांडर नहीं, बल्कि रणनीतिक निर्णय लेने वाला शीर्ष नेतृत्व माना जाता था। कई बड़े नक्सली हमलों की योजना और क्रियान्वयन में उसका नाम सामने आ चुका था। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, वह नक्सली संगठन के विस्तार, फंडिंग नेटवर्क और नए कैडरों की भर्ती में अहम भूमिका निभाता था।
उइके का प्रभाव छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड तक फैला हुआ था। वह अक्सर सीमावर्ती इलाकों में ठिकाने बदलता रहता था, जिससे उसकी गिरफ्तारी या मुठभेड़ बेहद चुनौतीपूर्ण बन गई थी। वर्षों से उसकी तलाश में विशेष टीमें तैनात थीं, लेकिन वह हर बार बच निकलता था।
मुठभेड़ की पूरी कहानी: कैसे घिरा गणेश उइके
खुफिया एजेंसियों को कुछ दिनों पहले सूचना मिली थी कि कंधमाल जिले के बेलघर थाना क्षेत्र के अंतर्गत गुम्मा जंगल में नक्सलियों की एक बड़ी बैठक होने वाली है। इस बैठक में शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी की आशंका थी। इसी सूचना के आधार पर विशेष अभियान समूह की एक मोबाइल टीम को जंगल में भेजा गया।
जैसे ही सुरक्षा बलों ने इलाके में सर्च ऑपरेशन शुरू किया, नक्सलियों ने अचानक फायरिंग शुरू कर दी। इसके बाद दोनों ओर से भीषण गोलीबारी हुई। इस मुठभेड़ में गणेश उइके समेत कई नक्सली मारे गए। घटनास्थल से हथियार, संचार उपकरण और दस्तावेज भी बरामद किए गए, जो नक्सल नेटवर्क के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं।
दो दिनों में छह नक्सली ढेर, ऑपरेशन की बड़ी सफलता
यह मुठभेड़ अकेली घटना नहीं थी। इससे पहले भी कंधमाल जिले में अलग-अलग अभियानों में पांच नक्सली मारे जा चुके थे। इनमें एक महिला कैडर भी शामिल थी, जिसकी पहचान बाद में की गई। लगातार दो दिनों में छह नक्सलियों के मारे जाने से यह स्पष्ट हो गया कि सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके को घेरकर नक्सल नेटवर्क की कमर तोड़ दी है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, मारे गए नक्सलियों में से कई लंबे समय से सक्रिय थे और उन पर लाखों रुपये का इनाम घोषित था। इन अभियानों में सुरक्षा बलों को कोई नुकसान नहीं हुआ, जो इस ऑपरेशन की रणनीतिक सफलता को दर्शाता है।
नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक दौर में ओडिशा
ओडिशा लंबे समय तक नक्सल प्रभावित राज्यों की सूची में शामिल रहा है। खासतौर पर कंधमाल, मलकानगिरी, कोरापुट और रायगड़ा जैसे जिले नक्सल गतिविधियों के गढ़ माने जाते थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की सक्रियता, विकास योजनाओं की पहुंच और स्थानीय लोगों के सहयोग से हालात तेजी से बदले हैं।
गणेश उइके की मौत को इसी बदलाव का निर्णायक मोड़ माना जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि शीर्ष नेतृत्व के खत्म होने से नक्सली संगठन का मनोबल टूटेगा और शेष कैडर या तो आत्मसमर्पण करेंगे या संगठन छोड़ने पर मजबूर होंगे।
आत्मसमर्पण की बढ़ती संख्या, बदलता माहौल
इस मुठभेड़ से ठीक एक दिन पहले मलकानगिरी जिले में 22 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया था। यह घटना इस बात का संकेत है कि नक्सली संगठन के भीतर डर और असंतोष गहराता जा रहा है। शीर्ष नेताओं के मारे जाने से निचले स्तर के कैडर खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
सरकार द्वारा घोषित पुनर्वास योजनाओं और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयासों ने भी आत्मसमर्पण की प्रक्रिया को तेज किया है।
सुरक्षा और विकास का संयुक्त मॉडल
विशेषज्ञ मानते हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ केवल सैन्य कार्रवाई ही पर्याप्त नहीं होती। इसके साथ-साथ विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की योजनाएं भी उतनी ही जरूरी हैं। ओडिशा में इन दोनों पहलुओं पर एक साथ काम किया गया है।
जंगलों और दूरदराज इलाकों में सड़क, बिजली और संचार सुविधाओं के विस्तार से नक्सलियों की पकड़ कमजोर हुई है। स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलने से नक्सली संगठनों में भर्ती भी घटी है।
नक्सल मुक्त भारत की दिशा में एक और कदम
गणेश उइके की मौत को नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक जीत के रूप में देखा जा रहा है। यह संकेत है कि देश अब उस दौर से बाहर निकल रहा है, जहां नक्सली हिंसा विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा थी।
सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि आने वाले समय में भी अभियान जारी रहेंगे और शेष नक्सली नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करने पर जोर दिया जाएगा।
निष्कर्ष
एक करोड़ के इनामी नक्सली गणेश उइके का मारा जाना केवल एक मुठभेड़ नहीं, बल्कि नक्सलवाद के अंत की ओर बढ़ता एक मजबूत संकेत है। ओडिशा अब नक्सल मुक्त बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और यह सफलता पूरे देश के लिए एक संदेश है कि संगठित प्रयास, मजबूत रणनीति और जनता के सहयोग से किसी भी चुनौती को हराया जा सकता है।
