हिंदी सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो शोर में नहीं, बल्कि अपने काम की गहराई से पहचान बनाते हैं। चित्रांगदा सिंह उन्हीं में से एक हैं। हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’ में उनके अभिनय ने दर्शकों और समीक्षकों का ध्यान एक बार फिर उनकी ओर खींचा है। यह फिल्म सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है, बल्कि इंसानी भावनाओं, रिश्तों और मानसिक संघर्षों की परतें खोलती है, जिसमें चित्रांगदा का किरदार बेहद अहम भूमिका निभाता है।

‘रात अकेली है’ और एक जटिल किरदार की चुनौती
फिल्म में चित्रांगदा सिंह का किरदार बहुआयामी है। उसमें दर्द भी है, रहस्य भी, असहजता भी और एक तरह की आंतरिक शक्ति भी। चित्रांगदा के मुताबिक, इस तरह के किरदार निभाना किसी भी अभिनेता के लिए आसान नहीं होता क्योंकि इसमें हर दृश्य के साथ भावनात्मक संतुलन बनाए रखना पड़ता है। उन्होंने कहा कि उनके किरदार में ऐसे कई पल हैं, जहां दर्शक उससे सहानुभूति भी महसूस करता है और उस पर शक भी करता है। यही इस रोल की सबसे बड़ी चुनौती थी।
लेखन और टीमवर्क को दिया श्रेय
चित्रांगदा मानती हैं कि किसी भी अच्छी फिल्म की नींव उसकी स्क्रिप्ट होती है। उन्होंने बताया कि ‘रात अकेली है’ की कहानी और संवाद इतने सधे हुए थे कि कलाकारों को ज्यादा बदलाव करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। एक थ्रिलर फिल्म में हर शब्द और हर भाव मायने रखता है। लेखकों ने किरदारों को जिस गहराई से लिखा, उसी ने फिल्म को मजबूत बनाया और कलाकारों को अपने अभिनय को निखारने का मौका दिया।
सेट का माहौल और अभिनय की सहजता
चित्रांगदा ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि किसी भी फिल्म के सेट का माहौल कलाकार के प्रदर्शन को बहुत प्रभावित करता है। ‘रात अकेली है’ और ‘हाउसफुल 5’ जैसी अलग-अलग शैलियों की फिल्मों पर एक साथ काम करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण जरूर था, लेकिन सेट पर मौजूद सकारात्मक ऊर्जा ने उन्हें किरदार में ढलने में मदद की। उन्होंने माना कि जब माहौल सहयोगी और रचनात्मक होता है, तो कलाकार खुद-ब-खुद अपने रोल के करीब पहुंच जाता है।
अब नजरें ‘बैटल ऑफ गलवान’ पर
जहां एक ओर चित्रांगदा ओटीटी पर अपने दमदार अभिनय के लिए सराही जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी आने वाली फिल्म ‘बैटल ऑफ गलवान’ को लेकर भी उत्सुकता बढ़ती जा रही है। इस फिल्म में वह सलमान खान के साथ नजर आएंगी। यह पहली बार होगा जब दोनों कलाकार एक साथ पर्दे पर दिखाई देंगे, जिससे दर्शकों की उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं।
सलमान खान के साथ काम करने का अनुभव
चित्रांगदा सिंह ने सलमान खान के साथ काम करने के अनुभव को बेहद खास बताया। उनके अनुसार सलमान सिर्फ एक बड़े स्टार नहीं हैं, बल्कि सेट पर अनुशासन और ऊर्जा का माहौल भी बनाते हैं। उन्होंने कहा कि सलमान के साथ काम करते हुए यह अहसास होता है कि वह अपने काम को लेकर कितने गंभीर हैं और अपने सह-कलाकारों को भी सहज महसूस कराते हैं।
‘गलवान’ सिर्फ फिल्म नहीं, एक भावना
चित्रांगदा ने ‘बैटल ऑफ गलवान’ को लेकर कहा कि यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमाई प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि एक गहरी भावना है। उनके शब्दों में, यह कहानी मसालेदार मनोरंजन से अलग है। इसमें ऐसे दृश्य हैं जो सीधे दिल को छूते हैं और दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोर सकते हैं। यह फिल्म उन बलिदानों और संघर्षों को सामने लाती है, जो अक्सर शब्दों में बयां नहीं हो पाते।
करियर के लिए अहम मोड़
चित्रांगदा को उम्मीद है कि ‘बैटल ऑफ गलवान’ उनके करियर के लिए एक नया मोड़ साबित होगी। उन्होंने कहा कि हर कलाकार अपने सफर में ऐसे प्रोजेक्ट की तलाश में रहता है, जो उसे सिर्फ लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि संतोष भी दे। ‘गलवान’ उनके लिए ऐसा ही प्रोजेक्ट है, जो उन्हें एक कलाकार के रूप में और मजबूत बनाएगा।
पर्दे के पीछे भी सक्रिय चित्रांगदा
अभिनय के साथ-साथ चित्रांगदा अब निर्माण के क्षेत्र में भी कदम बढ़ा रही हैं। उन्होंने बताया कि वह एक स्पोर्ट्स बायोपिक को प्रोड्यूस करने की तैयारी कर रही हैं। हालांकि, उन्होंने फिलहाल फिल्म के विषय और नाम का खुलासा नहीं किया है, लेकिन इतना जरूर कहा कि यह कहानी भी प्रेरणादायक होगी और वास्तविक संघर्ष पर आधारित होगी।
बदलता सिनेमा और महिला कलाकार
चित्रांगदा मानती हैं कि हिंदी सिनेमा अब बदल रहा है। महिला कलाकारों को पहले से ज्यादा सशक्त और जटिल किरदार मिल रहे हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने इस बदलाव को और तेज किया है, जहां कहानी और अभिनय को प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि आज का दर्शक भी कंटेंट को लेकर ज्यादा समझदार हो गया है और वही फिल्म पसंद करता है, जिसमें सच्चाई और भावनात्मक गहराई हो।
आगे की राह
अपने आने वाले प्रोजेक्ट्स को लेकर चित्रांगदा बेहद उत्साहित हैं। वह ऐसे किरदार चुनना चाहती हैं जो उन्हें चुनौती दें और उनके भीतर के कलाकार को नए आयाम दें। ‘रात अकेली है’ और ‘बैटल ऑफ गलवान’ इसी दिशा में उठाए गए मजबूत कदम हैं।
निष्कर्ष
चित्रांगदा सिंह का सफर इस बात का प्रमाण है कि सिनेमा में टिके रहने के लिए शोर नहीं, बल्कि सच्चा और ईमानदार अभिनय जरूरी होता है। चाहे ओटीटी प्लेटफॉर्म हो या बड़े पर्दे की भव्य फिल्म, वह हर जगह अपनी अलग छाप छोड़ रही हैं। ‘गलवान’ को लेकर उनका भावनात्मक जुड़ाव यह साफ करता है कि यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक अनुभव बनने वाली है।
