नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत से पहले ही बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक अहम और चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आ रही है। अप्रैल माह से बिजली की दरों में लगभग दस प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। यह बढ़ोतरी यदि लागू होती है तो इसका सीधा असर घरेलू उपभोक्ताओं से लेकर छोटे व्यापारियों, उद्योगों और किसानों तक सभी पर पड़ेगा। बिजली जैसी आवश्यक सेवा की कीमत बढ़ना आम जीवन की लागत को भी प्रभावित करेगा।

क्यों बढ़ सकती हैं बिजली की दरें
पश्चिमी क्षेत्र में बिजली वितरण से जुड़ी एजेंसी ने आगामी वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए अपनी संभावित बिजली दरों का प्रस्ताव तैयार कर लिया है। यह प्रस्ताव पॉवर मैनेजमेंट से जुड़ी संस्था को भेजा जा चुका है। इस प्रस्ताव में बिजली उत्पादन, वितरण, ट्रांसमिशन लागत, कर्मचारियों के वेतन, तकनीकी सुधार और पुराने घाटे की भरपाई जैसे कई बिंदुओं को आधार बनाया गया है।
बीते कुछ वर्षों में बिजली कंपनियों की लागत में लगातार इजाफा हुआ है। कोयले की कीमतों में उतार-चढ़ाव, ट्रांसमिशन लॉस, मेंटेनेंस खर्च और तकनीकी उन्नयन पर होने वाला व्यय बिजली दरों पर दबाव डाल रहा है। कंपनियों का कहना है कि मौजूदा दरों पर काम करना अब आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।
मार्च में होगा अंतिम निर्णय
हालांकि फिलहाल यह केवल एक प्रस्ताव है, लेकिन इस पर अंतिम फैसला मार्च महीने में नियामक आयोग द्वारा लिया जाएगा। आयोग सभी हितधारकों की राय सुनने के बाद ही निर्णय करेगा। इस प्रक्रिया में आम नागरिक, उपभोक्ता संगठन और उद्योग प्रतिनिधि भी अपनी आपत्तियाँ या सुझाव दर्ज करा सकते हैं।
यदि आयोग इस प्रस्ताव को मंजूरी देता है, तो अप्रैल से नई बिजली दरें लागू हो जाएंगी। वहीं, यदि प्रस्ताव में संशोधन होता है तो बढ़ोतरी का प्रतिशत कम या अधिक भी हो सकता है।
घरेलू उपभोक्ताओं पर क्या पड़ेगा असर
यदि बिजली की दरों में दस प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो इसका सबसे अधिक असर मध्यम और निम्न आय वर्ग के घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे परिवारों का मासिक बजट और अधिक बिगड़ सकता है। बिजली बिल बढ़ने से अन्य जरूरी खर्चों में कटौती करनी पड़ सकती है।
गर्मी के मौसम में एयर कंडीशनर, कूलर और पंखों का उपयोग बढ़ जाता है। ऐसे समय में बिजली महंगी होना आम लोगों की परेशानी को और बढ़ा सकता है।
छोटे व्यापारियों और उद्योगों की चिंता
बिजली दरों में बढ़ोतरी का असर केवल घरों तक सीमित नहीं रहेगा। छोटे दुकानदार, कुटीर उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स भी इससे प्रभावित होंगे। उत्पादन लागत बढ़ने से वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ता पर ही पड़ेगा।
कई व्यापारिक संगठनों ने पहले ही आशंका जताई है कि यदि बिजली महंगी हुई तो कारोबार पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। विशेष रूप से वे उद्योग जो पूरी तरह बिजली पर निर्भर हैं, उनके लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
किसानों के लिए बढ़ेगी मुश्किल?
ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्य के लिए बिजली का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। सिंचाई पंप, कोल्ड स्टोरेज और अन्य कृषि उपकरण बिजली पर आधारित हैं। यदि बिजली दरें बढ़ती हैं, तो खेती की लागत भी बढ़ेगी। इससे किसानों की आय पर असर पड़ सकता है।
हालांकि सरकार द्वारा किसानों के लिए सब्सिडी योजनाएँ चलती हैं, लेकिन दरों में बढ़ोतरी का अप्रत्यक्ष प्रभाव फिर भी महसूस किया जा सकता है।
बिजली कंपनियों का पक्ष
बिजली वितरण कंपनियों का कहना है कि दरों में संशोधन समय की आवश्यकता है। उनका तर्क है कि यदि समय-समय पर दरों में सुधार नहीं किया गया, तो सिस्टम को बेहतर बनाना मुश्किल हो जाएगा। स्मार्ट मीटर, नई ट्रांसमिशन लाइनें, बिजली चोरी रोकने के उपाय और तकनीकी सुधार के लिए पूंजी की जरूरत होती है।
कंपनियों का यह भी कहना है कि लंबे समय तक घाटे में काम करने से सेवा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
उपभोक्ता संगठनों की प्रतिक्रिया
उपभोक्ता संगठनों ने प्रस्तावित बढ़ोतरी पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बिजली कंपनियों को पहले अपने आंतरिक नुकसान, बिजली चोरी और प्रशासनिक खर्चों को कम करना चाहिए। आम जनता पर भार डालना अंतिम विकल्प होना चाहिए।
कुछ संगठनों ने यह भी मांग की है कि नियामक आयोग सार्वजनिक सुनवाई में उपभोक्ताओं की बातों को गंभीरता से सुने और दरों में किसी भी तरह की अनुचित बढ़ोतरी को रोके।
महंगाई के दौर में नई चुनौती
देश पहले ही महंगाई के दबाव से जूझ रहा है। ईंधन, खाद्य पदार्थ और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में बिजली दरों में इजाफा आम लोगों के लिए एक और झटका साबित हो सकता है।
बिजली केवल एक सुविधा नहीं बल्कि जीवन की बुनियादी आवश्यकता बन चुकी है। पढ़ाई, काम, स्वास्थ्य सेवाएँ और डिजिटल सेवाएँ सभी बिजली पर निर्भर हैं।
आगे क्या हो सकता है
अब सभी की निगाहें मार्च में होने वाले निर्णय पर टिकी हैं। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो उपभोक्ताओं को अपनी बिजली खपत और बजट पर फिर से विचार करना पड़ेगा। ऊर्जा की बचत और वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुझान बढ़ सकता है।
वहीं यदि आयोग उपभोक्ताओं के हित में फैसला लेता है, तो बढ़ोतरी को सीमित किया जा सकता है या कुछ श्रेणियों को राहत दी जा सकती है। harigeet pravaah के अनुसार आने वाला समय बिजली उपभोक्ताओं के लिए बेहद अहम साबित होने वाला है।
