करीब तीन वर्षों से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरी दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति को गहराई से प्रभावित किया है। लाखों लोग विस्थापित हुए, शहर खंडहर बने और वैश्विक अस्थिरता बढ़ी। ऐसे समय में जब थकान, संसाधनों की कमी और जनदबाव चरम पर हैं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के बीच हुई तीन घंटे लंबी बैठक ने नई उम्मीद जगा दी है। दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह संकेत दिया है कि युद्ध समाप्त करने के लिए व्यापक सहमति बन चुकी है और केवल कुछ जटिल मुद्दे ही शेष हैं।

यह मुलाकात केवल एक राजनयिक घटना नहीं थी, बल्कि उस संभावित मोड़ की ओर इशारा करती है, जहां से युद्ध का अंत और शांति की शुरुआत संभव है। हरिगीत प्रवाह की तरह यह प्रक्रिया धीमी, गंभीर और गहन संवाद से भरी हुई दिखती है।
बैठक की पृष्ठभूमि: क्यों अहम थी यह मुलाकात
यह बैठक अमेरिका के फ्लोरिडा स्थित मार-ए-लागो परिसर में हुई, जहां दोनों नेता बंद कमरे में करीब तीन घंटे तक बातचीत करते रहे। बैठक से पहले ही यह स्पष्ट था कि यह चर्चा औपचारिक नहीं बल्कि निर्णायक हो सकती है। युद्ध के मैदान में हालात जटिल बने हुए हैं और कूटनीतिक स्तर पर सभी पक्ष किसी स्थायी समाधान की तलाश में हैं।
अमेरिका, यूरोप और अन्य वैश्विक शक्तियों की निगाहें इस मुलाकात पर टिकी थीं। वजह साफ थी, यदि इस स्तर पर सहमति बनती है तो इसका असर केवल यूक्रेन और रूस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर पड़ेगा।
ट्रंप और जेलेंस्की का बयान: भरोसे की नई भाषा
बैठक के बाद दोनों नेताओं ने प्रेस के सामने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया, उसने शांति की संभावनाओं को और मजबूत किया। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है और कुछ ही हफ्तों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि अंतिम समझौता संभव है या नहीं। उनके शब्दों में आत्मविश्वास झलक रहा था।
वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी बैठक को सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि शांति के ढांचे पर लगभग पूरी सहमति बन चुकी है और सुरक्षा गारंटी जैसे अहम मुद्दे पर ठोस समझ बनी है। दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बिना विश्वसनीय सुरक्षा व्यवस्था के युद्धविराम टिकाऊ नहीं हो सकता।
सुरक्षा गारंटी: शांति की रीढ़
इस पूरी बातचीत का केंद्र सुरक्षा गारंटी रहा। यूक्रेन लंबे समय से यह मांग करता रहा है कि युद्ध समाप्त होने के बाद उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी आक्रमण की पुनरावृत्ति न हो।
बैठक में इस बात पर लगभग पूरी सहमति बनी कि यूरोपीय देश सुरक्षा व्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभाएंगे, जबकि अमेरिका उनका समर्थन करेगा। यह व्यवस्था केवल सैन्य नहीं होगी, बल्कि आर्थिक, तकनीकी और कूटनीतिक सहयोग पर भी आधारित होगी। ट्रंप ने इसे 95 फीसदी सहमति बताया, जो इस दिशा में बड़ी प्रगति मानी जा रही है।
डोनबास का सवाल: सबसे बड़ी चुनौती
जहां अधिकांश मुद्दों पर सहमति बनती दिखी, वहीं डोनबास क्षेत्र का भविष्य अब भी सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। यह इलाका लंबे समय से संघर्ष का केंद्र रहा है और दोनों पक्ष इसे लेकर कठोर रुख अपनाए हुए हैं।
रूस चाहता है कि यूक्रेन अपनी सेना को इस क्षेत्र से हटाए, जबकि यूक्रेन इसे अपनी संप्रभुता का सवाल मानता है। जेलेंस्की ने स्पष्ट किया कि इस तरह का कोई भी फैसला जनता की सहमति के बिना संभव नहीं है और इसके लिए जनमत संग्रह का विकल्प खुला रखा गया है। ट्रंप ने भी स्वीकार किया कि यह सबसे कठिन मुद्दा है, लेकिन बातचीत जारी है।
पुतिन से ट्रंप की बातचीत: पर्दे के पीछे की कूटनीति
इस बैठक से पहले ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच भी फोन पर बातचीत हुई थी। इस बातचीत को उपयोगी और दोस्ताना बताया गया। रूस की ओर से यह संकेत दिया गया कि लंबा युद्धविराम संघर्ष को खींच सकता है और डोनबास जैसे मुद्दों पर जल्द फैसला जरूरी है।
इसके साथ ही आर्थिक और सुरक्षा मामलों पर संयुक्त कार्य समूह बनाने पर भी सहमति बनी। यह दर्शाता है कि पर्दे के पीछे कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं।
हमलों की छाया में शांति प्रयास
दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह रहा कि जिस समय यह बैठक हो रही थी, उसी दौरान यूक्रेन के कई शहरों पर मिसाइल और ड्रोन हमले जारी थे। कीव में बिजली और हीटिंग व्यवस्था प्रभावित हुई, जिससे आम नागरिकों की मुश्किलें बढ़ गईं।
जेलेंस्की ने इन हमलों को दबाव बनाने की रणनीति बताया, जबकि ट्रंप ने उम्मीद जताई कि दोनों नेता शांति को लेकर गंभीर हैं। यह विरोधाभास इस युद्ध की जटिलता को उजागर करता है, जहां बातचीत और संघर्ष साथ-साथ चलते दिखते हैं।
जापोरिज्जिया परमाणु संयंत्र और अन्य मुद्दे
बैठक में जापोरिज्जिया न्यूक्लियर पावर प्लांट का मुद्दा भी उठा, जिसे लेकर लंबे समय से चिंता जताई जा रही है। अमेरिका ने इस संयंत्र पर साझा नियंत्रण का प्रस्ताव रखा है और वहां बिजली लाइनों की मरम्मत का काम शुरू हो चुका है।
इसके अलावा अमेरिका और यूक्रेन के बीच 20 बिंदुओं की शांति योजना पर भी चर्चा हुई, जिसमें अधिकांश बिंदुओं पर सहमति की बात कही गई है। यह योजना युद्ध के बाद की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को भी संबोधित करती है।
क्या ट्रंप यूक्रेन जाएंगे
डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया कि यदि उनके यूक्रेन जाने से शांति प्रक्रिया को बल मिलता है, तो वह वहां जाने और संसद को संबोधित करने के लिए तैयार हैं। हालांकि उन्होंने इसे फिलहाल जरूरी नहीं बताया। जेलेंस्की ने उन्हें औपचारिक रूप से आमंत्रित किया है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि आने वाले हफ्तों में कूटनीतिक गतिविधियां और तेज हो सकती हैं।
यूरोप की भूमिका: बढ़ता प्रभाव
इस पूरी प्रक्रिया में यूरोपीय देशों की भूमिका भी अहम होती जा रही है। ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय नेताओं से जेलेंस्की की बातचीत हुई है और सामूहिक रणनीति पर काम चल रहा है।
यूरोप के लिए यह युद्ध केवल पड़ोसी संघर्ष नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा और स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। इसलिए यूरोपीय देश शांति समझौते में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार दिख रहे हैं।
निष्कर्ष: निर्णायक मोड़ पर खड़ा युद्ध
रूस-यूक्रेन युद्ध अब ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से शांति संभव नजर आ रही है, लेकिन अंतिम कदम अभी बाकी हैं। ट्रंप और जेलेंस्की की तीन घंटे लंबी बैठक ने यह साफ कर दिया है कि इच्छाशक्ति मौजूद है।
यदि डोनबास जैसे जटिल मुद्दों पर समाधान निकल आता है, तो यह समझौता न केवल इस युद्ध का अंत करेगा, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी नया अध्याय जोड़ेगा। आने वाले कुछ हफ्ते सचमुच निर्णायक साबित हो सकते हैं।
