शिक्षा किसी भी समाज की आत्मा होती है और जब वही व्यवस्था सबसे कमजोर वर्ग के साथ अन्याय करने लगे, तो यह केवल एक संस्थान की विफलता नहीं बल्कि पूरे तंत्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न बन जाती है। इंदौर के सुखलिया क्षेत्र में स्थित औद्योगिक प्रशिक्षण संस्था यानी आईटीआई का दिव्यांग केंद्र इन दिनों ऐसे ही आरोपों के कारण चर्चा में है। यहां पढ़ने वाले मूक-बधिर विद्यार्थियों ने जो खुलासे किए हैं, वे केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि संवेदनहीनता और शोषण की तस्वीर भी पेश करते हैं।

मूक-बधिर छात्रों की आवाज, जो अब सुनाई देने लगी
दिव्यांग छात्र अक्सर अपनी समस्याएं खुलकर सामने नहीं ला पाते। संवाद की सीमाएं, भय और व्यवस्था पर निर्भरता उन्हें चुप रहने पर मजबूर कर देती है। लेकिन इंदौर आईटीआई के मूक-बधिर छात्रों ने इस चुप्पी को तोड़ने का साहस दिखाया। उन्होंने प्रशासन के सामने जाकर यह बताया कि उन्हें तकनीकी शिक्षा देने के नाम पर मजदूरी जैसे काम कराए जा रहे हैं।
इन छात्रों का कहना है कि पढ़ाई के निर्धारित समय में उनसे परिसर की साफ-सफाई, शौचालयों की सफाई और बगीचे में घास कटवाने जैसे कार्य कराए जाते हैं। यह सब उस समय हो रहा है, जब उन्हें अपने कोर्स से जुड़ी तकनीकी जानकारी हासिल करनी चाहिए।
तकनीकी शिक्षा के नाम पर औपचारिकता
आईटीआई के दिव्यांग केंद्र में कंप्यूटर ऑपरेटर और प्रोग्रामिंग असिस्टेंट जैसे कोर्स संचालित किए जा रहे हैं। यह ऐसे कोर्स हैं, जिनका सीधा संबंध रोजगार से है। लेकिन छात्रों का आरोप है कि यहां तकनीकी शिक्षा केवल कागजों तक सीमित है। कक्षाएं नियमित नहीं लगतीं और जो पढ़ाया जाना चाहिए, वह या तो अधूरा रहता है या होता ही नहीं।
कई छात्रों ने बताया कि कक्षा के नाम पर कभी-कभी एक छोटा सा वीडियो रिकॉर्ड कर लिया जाता है और उसे व्हाट्सएप ग्रुप में डालकर यह दिखा दिया जाता है कि पढ़ाई हो रही है। वास्तविकता में न तो उन्हें सॉफ्टवेयर की प्रैक्टिकल जानकारी मिलती है और न ही कंप्यूटर पर पर्याप्त अभ्यास का मौका।
सांकेतिक भाषा की सबसे बड़ी कमी
मूक-बधिर छात्रों के लिए सबसे जरूरी चीज होती है सांकेतिक भाषा में संवाद। लेकिन संस्थान में न तो ऐसे शिक्षक मौजूद हैं, जो सांकेतिक भाषा में पढ़ा सकें और न ही प्रभावी दुभाषिया। इससे छात्रों को पढ़ाई समझने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
छात्रों का कहना है कि कई बार शिक्षक सामान्य भाषा में पढ़ाकर चले जाते हैं और मूक-बधिर विद्यार्थी केवल एक-दूसरे का चेहरा देखते रह जाते हैं। यह स्थिति न केवल उनकी शिक्षा को प्रभावित कर रही है, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी तोड़ रही है।
रोजगार कौशल का अभाव और भविष्य की चिंता
कोपा जैसे कोर्स में ‘एम्प्लॉयबिलिटी स्किल्स’ यानी रोजगार से जुड़ी दक्षताओं का विशेष महत्व होता है। लेकिन छात्रों का आरोप है कि यह विषय लगभग पढ़ाया ही नहीं जाता। परिणामस्वरूप, कोर्स पूरा करने के बाद भी उन्हें नौकरी के लिए जरूरी कौशल नहीं मिल पा रहे।
यह स्थिति उन छात्रों के लिए और भी गंभीर है, जिनके पास पहले से ही सीमित अवसर होते हैं। शिक्षा ही उनके लिए आत्मनिर्भर बनने का सबसे बड़ा साधन है, और जब वही अधूरी रह जाए, तो उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है।
छात्रावास की बदहाल तस्वीर
केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि रहने की व्यवस्था भी सवालों के घेरे में है। छात्रों ने बताया कि हॉस्टल में शौचालयों की हालत बेहद खराब है। कई जगह पानी की व्यवस्था नहीं है, सीटें टूटी हुई हैं और दरवाजों के ताले काम नहीं करते।
मेस में मिलने वाला भोजन भी पौष्टिकता और गुणवत्ता दोनों के लिहाज से बेहद खराब बताया गया है। कई छात्रों ने कहा कि भोजन अक्सर ठंडा और बेस्वाद होता है, जिससे उनकी सेहत पर भी असर पड़ रहा है।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव
हॉस्टल में न तो गीजर हैं, न कूलर और न ही सर्दियों के लिए हीटर। मच्छरों से बचाव के लिए जाली या मच्छरदानी तक उपलब्ध नहीं कराई गई है। पढ़ाई के लिए पर्याप्त कंप्यूटर भी छात्रों को नहीं मिल पाते, जिससे प्रैक्टिकल अभ्यास लगभग असंभव हो जाता है।
इन सभी समस्याओं ने छात्रों के दैनिक जीवन को बेहद कठिन बना दिया है। शिक्षा के लिए आया छात्र यहां केवल संघर्ष कर रहा है।
भ्रष्टाचार के आरोप और डर का माहौल
छात्रों ने संस्थान में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उनका कहना है कि कई बार दानदाताओं द्वारा किताबें, यूनिफॉर्म और कॉपियां निःशुल्क दी जाती हैं, फिर भी इनके नाम पर छात्रों से पैसे वसूले जाते हैं।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि जब कोई छात्र इन समस्याओं का विरोध करता है या सवाल उठाता है, तो उसे परीक्षा में फेल करने की धमकी दी जाती है। इस डर के कारण कई छात्र लंबे समय तक चुप रहे।
प्रशासन तक पहुंची बात, शुरू हुई जांच
आखिरकार छात्रों ने हिम्मत जुटाकर अपनी शिकायत कलेक्टर की जनसुनवाई में रखी। इसके बाद प्रशासन हरकत में आया। प्रारंभिक जांच के बाद आईटीआई प्रबंधन ने प्रभारी अधिकारी और दुभाषिया को पद से हटा दिया है।
हालांकि यह केवल शुरुआत मानी जा रही है। छात्रों और उनके परिजनों को उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष होगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी।
यह केवल एक संस्थान की कहानी नहीं
यह मामला केवल इंदौर आईटीआई तक सीमित नहीं है। यह पूरे सिस्टम की उस कमजोरी को उजागर करता है, जहां दिव्यांग छात्रों के अधिकारों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। योजनाएं और नीतियां कागजों पर तो अच्छी लगती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर अलग होती है।
निष्कर्ष: न्याय और संवेदनशीलता की जरूरत
मूक-बधिर छात्रों की यह लड़ाई केवल सुविधाओं की नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकारों की भी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान के साथ जीने लायक बनाना है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच के बाद क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं। क्या दोषियों को सजा मिलेगी और क्या इन छात्रों को वह शिक्षा और सम्मान मिलेगा, जिसके वे हकदार हैं। हरिगीत प्रवाह की तरह यह मुद्दा भी समाज की चेतना को झकझोरता है और जवाब मांगता है।
