बिहार की राजनीति और खेल जगत के इतिहास में यह एक दुर्लभ क्षण है, जब कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी खुद खेल मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहा हो। श्रेयसी सिंह के रूप में बिहार को एक ऐसी खेल मंत्री मिली हैं, जो केवल फाइलों और योजनाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मैदान, अभ्यास, संघर्ष और जीत-हार के अनुभव से निकली हुई नेता हैं।

उनकी सोच, उनकी प्राथमिकताएं और उनका विज़न बिहार के खेल परिदृश्य को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। हालिया बातचीत में उन्होंने न केवल अपनी योजनाओं का खुलासा किया, बल्कि अपने निजी अनुभवों, भावनाओं और उस सोच को भी साझा किया, जो उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है।
खेल मंत्री बनने तक का सफर
श्रेयसी सिंह की पहचान केवल एक मंत्री के रूप में नहीं है। वह एक स्थापित निशानेबाज रही हैं और शूटिंग जैसे अनुशासन वाले खेल में उन्होंने भारत और बिहार का नाम रोशन किया है। यही कारण है कि जब उन्होंने खेल मंत्री पद की शपथ ली, तो यह केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि बिहार के खिलाड़ियों के लिए उम्मीद का नया अध्याय भी था।
उनके लिए यह पद सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक मिशन है। उन्होंने साफ शब्दों में स्वीकार किया है कि एक खिलाड़ी बनकर खेल मंत्री की शपथ लेना उन्हें गर्व के साथ-साथ बड़ी जिम्मेदारी का एहसास भी कराता है।
20 नवंबर: एक भावनात्मक संयोग
श्रेयसी सिंह के जीवन में 20 नवंबर की तारीख विशेष महत्व रखती है। इसी दिन उन्होंने मंत्री पद की शपथ ली और यह वही तारीख थी, जब वर्षों पहले उनके पिता दिवंगत दिग्विजय सिंह ने केंद्रीय मंत्री पद की शपथ ली थी।
यह संयोग उनके लिए केवल तारीखों का मेल नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक क्षण था, जिसने उन्हें अपने परिवार की राजनीतिक विरासत और अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों का गहरा एहसास कराया। उन्होंने स्वीकार किया कि उस दिन खुशी और जिम्मेदारी दोनों भावनाएं साथ-साथ थीं।
पहला फोन और जिम्मेदारी का अहसास
जब उन्हें मंत्री पद की शपथ के लिए पहला फोन आया, तो वह पल उनके लिए अविस्मरणीय था। एक ओर खुशी थी कि उन्हें राज्य की सेवा का अवसर मिला है, दूसरी ओर यह चिंता भी थी कि अब उनकी जिम्मेदारी केवल एक जिले तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे बिहार के खिलाड़ियों से जुड़ जाएगी।
शुरुआत में उन्हें यह भी स्पष्ट नहीं था कि उन्हें कौन सा मंत्रालय मिलेगा, लेकिन जब खेल मंत्रालय की जिम्मेदारी उनके हिस्से आई, तो उन्होंने इसे अपने जीवन का सबसे बड़ा अवसर माना।
बिहार के माथे से “सस्ते लेबर” की पहचान हटाने का सपना
श्रेयसी सिंह का मानना है कि बिहार की पहचान केवल श्रमिक राज्य के रूप में सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके अनुसार खेल वह माध्यम बन सकता है, जो बिहार के युवाओं को नई पहचान और आत्मसम्मान दिलाए।
उनका सपना है कि बिहार के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें और दुनिया को दिखाएं कि बिहार केवल मेहनतकश श्रमिकों का राज्य नहीं, बल्कि प्रतिभा और खेल कौशल की भूमि भी है।
इंफ्रास्ट्रक्चर: पहली और सबसे बड़ी प्राथमिकता
श्रेयसी सिंह की सबसे बड़ी प्राथमिकता खेल इंफ्रास्ट्रक्चर है। उनका मानना है कि जब तक खिलाड़ियों को राज्य में ही बेहतर सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तब तक प्रतिभा का सही विकास संभव नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि बिहार के खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के लिए राज्य से बाहर जाने की मजबूरी खत्म करना उनका मुख्य लक्ष्य है। इसके लिए आधुनिक स्टेडियम, ट्रेनिंग सेंटर और एकेडमी का विकास किया जा रहा है।
बांका की वाटर स्पोर्ट्स एकेडमी: भविष्य की नींव
बांका में प्रस्तावित वाटर स्पोर्ट्स एकेडमी को लेकर श्रेयसी सिंह की सोच बेहद स्पष्ट है। वह चाहती हैं कि यह एकेडमी चरणबद्ध तरीके से विकसित हो और भविष्य में राष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण केंद्र बने।
उनका मानना है कि बिहार के खिलाड़ी पानी से जुड़े खेलों में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकते हैं, बशर्ते उन्हें सही मार्गदर्शन और सुविधाएं मिलें। यह एकेडमी इसी दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।
राजगीर मॉडल से सीख
राजगीर में अंतरराष्ट्रीय स्तर के हॉकी इवेंट्स और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का उदाहरण देते हुए श्रेयसी सिंह ने बताया कि इसी तरह का मॉडल बिहार के अन्य हिस्सों में भी लागू किया जाएगा।
राजगीर में हॉकी, एथलेटिक्स और वेटलिफ्टिंग जैसी विधाओं में प्रशिक्षण की सुविधा पहले से मौजूद है। वहीं क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण भी अंतिम चरण में है। यह मॉडल दिखाता है कि सही योजना और इच्छाशक्ति से बिहार खेल के बड़े केंद्र के रूप में उभर सकता है।
क्रिकेट को लेकर स्पष्ट सोच
बिहार में क्रिकेट को लेकर लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि सरकार का फोकस इस खेल पर पर्याप्त नहीं है। इस पर श्रेयसी सिंह ने साफ कहा कि उन्हें अभी जिम्मेदारी संभाले ज्यादा समय नहीं हुआ है, लेकिन सुधार की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
मोइनुल हक स्टेडियम के काम को जल्द शुरू करने की योजना है और क्रिकेट के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत किया जा रहा है। उनका मानना है कि बिहार से भी सचिन तेंदुलकर और विराट कोहली जैसे खिलाड़ी निकल सकते हैं, बस सही माहौल बनाने की जरूरत है।
खिलाड़ी की नजर से नीति
श्रेयसी सिंह की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह खिलाड़ियों की समस्याओं को खुद जी चुकी हैं। उन्हें पता है कि एक खिलाड़ी को किन मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। यही वजह है कि उनकी नीतियां कागजों से ज्यादा जमीन पर असर डालने की क्षमता रखती हैं।
उनका मानना है कि जब नीति निर्माता खुद खेल के मैदान से आया हो, तो फैसले ज्यादा व्यावहारिक और प्रभावी होते हैं।
निजी जिंदगी और सार्वजनिक जिज्ञासा
श्रेयसी सिंह की निजी जिंदगी भी लोगों के लिए चर्चा का विषय रहती है। शादी को लेकर पूछे जाने वाले सवालों पर उन्होंने सहजता से जवाब दिया कि जब सही समय आएगा और सही व्यक्ति मिलेगा, तो यह भी हो जाएगा। फिलहाल उनका पूरा ध्यान बिहार के खेल विकास पर है।
यह जवाब उनके संतुलित व्यक्तित्व को दर्शाता है, जहां निजी जीवन और सार्वजनिक जिम्मेदारी दोनों को समान समझदारी से संभाला जा रहा है।
रात-दिन एक करने की वजह
जब उनसे पूछा गया कि वह किस प्राथमिकता के लिए सबसे ज्यादा मेहनत कर रही हैं, तो उनका जवाब सीधा था। वह चाहती हैं कि बिहार के किसी भी खिलाड़ी को खेलने या सीखने के लिए राज्य से बाहर न जाना पड़े।
उनके अनुसार, अगर इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत हो जाए, तो प्रतिभा खुद-ब-खुद निखर कर सामने आएगी।
निष्कर्ष: उम्मीदों की नई किरण
श्रेयसी सिंह का खेल मंत्री के रूप में सफर अभी शुरू हुआ है, लेकिन उनकी सोच, अनुभव और प्रतिबद्धता यह संकेत देती है कि बिहार के खेल जगत में बड़ा बदलाव संभव है।
एक खिलाड़ी की संवेदना और एक मंत्री की शक्ति जब साथ आती है, तो नतीजे भी असाधारण हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि उनका विज़न किस तरह बिहार के खिलाड़ियों के सपनों को हकीकत में बदलता है।
