मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले से सामने आया जहरीले कफ सिरप का मामला न सिर्फ राज्य बल्कि पूरे देश को झकझोर देने वाला है। यह कोई साधारण दवा लापरवाही का प्रकरण नहीं, बल्कि एक ऐसा संगठित अपराध है, जिसमें मुनाफे की भूख ने इंसानियत को पूरी तरह कुचल दिया। लगभग 45 दिनों के भीतर 24 मासूम बच्चों की असमय मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्था, दवा वितरण प्रणाली और निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इस बहुचर्चित मामले में विशेष जांच दल यानी एसआईटी ने अब तक 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। ताजा गिरफ्तारी परासिया क्षेत्र के रसेला मेडिकल स्टोर के संचालक अनिल रसेला की हुई है, जिस पर न सिर्फ प्रतिबंधित कफ सिरप बेचने बल्कि दवा स्टॉक का हिसाब छिपाने और डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा के बजाय जानलेवा सिरप देने के गंभीर आरोप हैं।
मासूम मयंक की मौत से खुला मौत के सिरप का राज
इस पूरे कांड की परतें तब खुलनी शुरू हुईं, जब उमरेठ मोरडोंगरी निवासी साढ़े तीन वर्षीय मासूम मयंक सूर्यवंशी की तबीयत अचानक बिगड़ गई। परिजनों ने बताया कि बच्चे को खांसी की शिकायत थी और डॉक्टर ने सामान्य कफ सिरप लिखी थी। लेकिन मेडिकल स्टोर से जो दवा दी गई, वह कोल्ड्रिफ नाम की वही जहरीली कफ सिरप थी, जिसने बाद में 24 बच्चों की जान ले ली।
जांच में यह बात सामने आई कि रसेला मेडिकल स्टोर से खरीदी गई इसी दवा के सेवन के बाद मयंक की मौत हुई। आरोपी संचालक अनिल रसेला ने न सिर्फ दवा का रिकॉर्ड छिपाया बल्कि 22 शीशियों का कोई हिसाब भी नहीं दे सका। यही नहीं, उसने डॉक्टर के पर्चे की अनदेखी करते हुए जानबूझकर खतरनाक सिरप दी।
24 घरों में मातम, बुझ गए भविष्य के चिराग
यह मामला केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि 24 परिवारों के सपनों, उम्मीदों और खुशियों की दर्दनाक समाप्ति की कहानी है। मरने वाले बच्चों में कोई छह महीने का था, तो कोई आठ साल का। किसी ने अभी बोलना सीखा था, तो किसी ने स्कूल जाना।
इन मासूमों में मयंक सूर्यवंशी, दिव्यांशु यदुवंशी, आतिया खान, शिवम राठौर, दिव्यांशु उईके, विधी डेहरिया, सत्या पवार, अदनान खान, उसैद खान, ऋषिका पीपरे, सेहरिश सैयद अली, चंचलेश यदुवंशी, विकास यदुवंशी, संध्या बोसम, योगिता ठाकरे, धानी डेहरिया, जयुषा यदुवंशी, वेदांश पवार, गार्विक पवार, हितांश सोनी, अंबिका विश्वकर्मा, आराध्या यदुवंशी, प्रांशु लोधी और पीयूष शामिल हैं।
इन सभी की मौत एक ही कारण से हुई, एक जहरीली दवा, जिसे दवा नहीं बल्कि मौत का सिरप कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
45 दिनों में 24 मौतें और प्रशासन की नींद
सबसे डरावनी बात यह रही कि इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौतें होने के बावजूद शुरुआत में इसे सामान्य बीमारी मानकर नजरअंदाज किया गया। जब मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था, तब जाकर स्वास्थ्य विभाग और पुलिस हरकत में आई।
4 अक्टूबर को बीएमओ की शिकायत पर डॉक्टर प्रवीण सोनी के खिलाफ पहला प्रकरण दर्ज किया गया। अगले ही दिन उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। यहीं से इस मामले ने तूल पकड़ना शुरू किया।
तमिलनाडु से छिंदवाड़ा तक फैला मौत का नेटवर्क
एसआईटी की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, यह साफ होता गया कि यह सिर्फ स्थानीय स्तर की लापरवाही नहीं बल्कि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा है। जांच टीम तमिलनाडु पहुंची, जहां से श्रीसन फार्मा के मालिक जी. रंगनाथन को गिरफ्तार किया गया। जांच में पुष्टि हुई कि कंपनी द्वारा बनाए गए सिरप में जानलेवा रसायन डायएथिलीन ग्लाइकोल मिलाया गया था।
इसके बाद केमिकल एनालिस्ट के. माहेश्वरी को भी गिरफ्तार किया गया, जिसने खतरनाक केमिकल की गुणवत्ता को नजरअंदाज किया। आगे चलकर स्थानीय मेडिकल स्टोरों की भूमिका भी सामने आई, जहां बिना जांच और बिना रिकॉर्ड के यह सिरप बेची जा रही थी।
मेडिकल स्टोरों की लापरवाही या जानबूझकर अपराध
अपना मेडिकल, आशीर्वाद मेडिकल और अब रसेला मेडिकल जैसे स्टोरों पर हुई कार्रवाई ने यह साफ कर दिया कि केवल निर्माता ही नहीं, बल्कि दवा बेचने वाले भी बराबर के दोषी हैं। कई मामलों में डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा के बजाय कोल्ड्रिफ सिरप दी गई।
कुंडीपुरा पुलिस ने आशीर्वाद मेडिकल के संचालक अनिल मिश्रा और अशोक मिश्रा को भी गिरफ्तार किया। इसके बाद 28 दिसंबर को रसेला मेडिकल के संचालक अनिल रसेला को दबोच लिया गया, जो अब इस कांड का 11वां आरोपी बन चुका है।
जांच में चौंकाने वाला खुलासा: 500 गुना ज्यादा जहरीला रसायन
एसआईटी की जांच में यह तथ्य सामने आया कि सिरप में मौजूद डायएथिलीन ग्लाइकोल की मात्रा सुरक्षित मानक से करीब 500 गुना अधिक थी। यह वही रसायन है, जो किडनी फेलियर और मल्टी ऑर्गन फेलियर का कारण बनता है।
यह सवाल अब भी बना हुआ है कि इतनी खतरनाक मात्रा में मिलावट के बावजूद यह सिरप बाजार तक कैसे पहुंची और किसकी अनुमति से इसे बेचने दिया गया।
अब अधिकारियों की भूमिका पर जांच
सरकार ने संकेत दिए हैं कि अब जांच का दायरा ड्रग इंस्पेक्टरों और उन उच्च अधिकारियों तक बढ़ाया जाएगा, जिन्होंने इस दवा को पास किया या समय रहते कार्रवाई नहीं की। यह मामला अब सिर्फ अपराध नहीं बल्कि सिस्टम की सामूहिक विफलता का प्रतीक बन चुका है।
