साल 2025 के अंतिम दिन और 2026 के आगमन से ठीक पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नववर्ष संबोधन पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया। आमतौर पर नववर्ष संदेश में शांति, सहयोग और विकास की बातें की जाती हैं, लेकिन इस बार शी जिनपिंग के शब्दों में कड़ा राजनीतिक और रणनीतिक संदेश साफ झलक रहा था। उन्होंने ताइवान को लेकर ऐसा बयान दिया, जिसने एशिया ही नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति में हलचल तेज कर दी।

राष्ट्रीय टेलीविजन पर प्रसारित अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ताइवान का चीन के साथ पुनः एकीकरण अब केवल समय की बात है और इसे रोका नहीं जा सकता। उनके इस कथन को केवल एक भावनात्मक बयान नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे चीन की दीर्घकालिक रणनीति और भविष्य की कार्रवाइयों का संकेत माना जा रहा है।
ताइवान और चीन का जटिल रिश्ता
ताइवान और चीन का संबंध दशकों से विवाद और तनाव से भरा रहा है। चीन ताइवान को अपने मुख्य भूभाग का अविभाज्य हिस्सा मानता है, जबकि ताइवान खुद को एक स्वशासित इकाई के रूप में प्रस्तुत करता है। यह टकराव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक आयामों से भी जुड़ा हुआ है।
अपने नववर्ष संदेश में शी जिनपिंग ने ताइवान जलडमरूमध्य के दोनों किनारों पर रहने वाले लोगों के बीच रक्त और पारिवारिक संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दोनों ओर रहने वाले चीनी लोगों का इतिहास, संस्कृति और पहचान एक है और इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। उनके अनुसार, यह साझा विरासत ही पुनः एकीकरण का सबसे मजबूत आधार है।
“इसे रोका नहीं जा सकता” जैसे शब्दों का महत्व
शी जिनपिंग द्वारा यह कहना कि ताइवान का पुनः एकीकरण अपरिहार्य है और इसे रोका नहीं जा सकता, कूटनीतिक भाषा में बेहद मजबूत संदेश माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शब्दों का चयन अक्सर भविष्य की रणनीति का संकेत देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान केवल घरेलू जनता को संबोधित नहीं था, बल्कि अमेरिका, जापान और ताइवान समर्थक देशों को भी स्पष्ट चेतावनी देने के उद्देश्य से दिया गया।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब बीते कुछ दिनों से चीन ने ताइवान के आसपास अपनी सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है। युद्धपोतों की आवाजाही, लड़ाकू विमानों की उड़ानें और सैन्य अभ्यासों ने पहले से मौजूद तनाव को और गहरा कर दिया है।
बढ़ती सैन्य गतिविधियां और रणनीतिक दबाव
नववर्ष संदेश से ठीक पहले के तीन दिनों में चीन ने ताइवान द्वीप के आसपास सैन्य गतिविधियों को जिस तरह से बढ़ाया, उसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान खींचा। इन गतिविधियों को कई विश्लेषक “दबाव की रणनीति” के रूप में देख रहे हैं, ताकि ताइवान और उसके समर्थकों को यह संकेत दिया जा सके कि चीन अपने इरादों को लेकर गंभीर है।
शी जिनपिंग ने अपने संबोधन में देश की बढ़ती रक्षा क्षमताओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चीन ने बीते वर्षों में सैन्य, तकनीकी और रणनीतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। यह प्रगति केवल रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष, साइबर और अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों तक फैली हुई है।
ब्रह्मपुत्र नदी पर विशाल बांध का जिक्र
अपने नववर्ष संदेश में शी जिनपिंग ने एक और अहम मुद्दे का उल्लेख किया, जिसने भारत और बांग्लादेश जैसे देशों की चिंता बढ़ा दी है। उन्होंने कहा कि यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से में एक विशाल जलविद्युत परियोजना का निर्माण शुरू हो चुका है। यही नदी भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है।
यह परियोजना दुनिया के सबसे बड़े बांधों में से एक मानी जा रही है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 170 अरब अमेरिकी डॉलर बताई जा रही है। यह बांध पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तिब्बत क्षेत्र में, अरुणाचल प्रदेश के निकट भारतीय सीमा के पास बनाया जा रहा है।
भारत और बांग्लादेश की बढ़ती चिंताएं
ब्रह्मपुत्र नदी पर इस विशाल बांध के निर्माण को लेकर भारत और बांग्लादेश में पहले से ही चिंता व्यक्त की जा रही है। दोनों ही देश इस नदी के निचले प्रवाह पर निर्भर हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस परियोजना से जल प्रवाह प्रभावित हो सकता है, जिससे भविष्य में बाढ़ या जल संकट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर बांध निर्माण से न केवल पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होगा, बल्कि क्षेत्रीय राजनीति में भी नए तनाव पैदा हो सकते हैं। शी जिनपिंग द्वारा इस परियोजना का उल्लेख यह संकेत देता है कि चीन अपनी आंतरिक विकास योजनाओं को रणनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देख रहा है।
आर्थिक, तकनीकी और रक्षा प्रगति का दावा
अपने संबोधन में शी जिनपिंग ने चीन की आर्थिक, तकनीकी और रक्षा प्रगति को एक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि चीन ने वैश्विक चुनौतियों के बावजूद अपनी विकास गति बनाए रखी है और भविष्य में भी आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ेगा।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि चीन अब केवल आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि रणनीतिक और सैन्य शक्ति के रूप में भी अपनी स्थिति मजबूत कर चुका है। यह बयान ताइवान मुद्दे के संदर्भ में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह दिखाता है कि चीन अपने दावों को समर्थन देने के लिए संसाधनों और क्षमता से लैस है।
वैश्विक राजनीति पर असर
शी जिनपिंग के इस नववर्ष संदेश का असर केवल चीन और ताइवान तक सीमित नहीं है। अमेरिका, जापान और अन्य एशियाई देश भी इस बयान को गंभीरता से ले रहे हैं। ताइवान जलडमरूमध्य पहले से ही वैश्विक व्यापार और सुरक्षा के लिए संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यहां किसी भी प्रकार का टकराव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि शी जिनपिंग का यह बयान आने वाले वर्षों में एशिया-प्रशांत क्षेत्र की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। यह संदेश चीन की दीर्घकालिक नीति और उसके आत्मविश्वास को दर्शाता है।
निष्कर्ष: नववर्ष संदेश में छिपा बड़ा संकेत
नववर्ष के अवसर पर दिया गया यह संबोधन केवल शुभकामनाओं तक सीमित नहीं था। इसमें ताइवान को लेकर स्पष्ट चेतावनी, सैन्य शक्ति का प्रदर्शन और ब्रह्मपुत्र पर बांध निर्माण जैसी रणनीतिक घोषणाएं शामिल थीं। शी जिनपिंग के शब्दों ने यह साफ कर दिया कि चीन आने वाले समय में अपने क्षेत्रीय और वैश्विक हितों को लेकर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है।
ताइवान का मुद्दा, ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध और बढ़ती सैन्य गतिविधियां मिलकर यह संकेत देती हैं कि वर्ष 2026 और उसके बाद का समय एशिया के लिए बेहद महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
