दुनिया की कूटनीतिक राजनीति में कभी-कभी ऐसे फैसले सामने आते हैं, जो केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे वैश्विक ढांचे को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2025 के अंतिम दिनों में इजरायल द्वारा लिया गया एक ऐसा ही फैसला अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का केंद्र बन गया है। इजरायल ने अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र में स्थित सोमालिलैंड को औपचारिक रूप से मान्यता देने की घोषणा की, जिसके बाद दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक और कूटनीतिक हलचल तेज हो गई।

यह फैसला न केवल अफ्रीकी महाद्वीप के लिए, बल्कि अरब जगत, मुस्लिम देशों और संयुक्त राष्ट्र की राजनीति के लिए भी दूरगामी प्रभाव वाला माना जा रहा है। इस निर्णय के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को आपात बैठक बुलानी पड़ी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मामला साधारण नहीं है।
सोमालिलैंड का ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ
सोमालिलैंड पूर्वी अफ्रीका के हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में स्थित एक ऐसा इलाका है, जिसने 1991 में खुद को सोमालिया से अलग घोषित कर दिया था। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने अब तक सोमालिलैंड को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी थी। तकनीकी रूप से यह क्षेत्र अब भी सोमालिया का हिस्सा माना जाता है, भले ही इसकी अपनी सरकार, प्रशासन, मुद्रा और सुरक्षा तंत्र मौजूद हो।
पिछले तीन दशकों से सोमालिलैंड अंतरराष्ट्रीय मान्यता की मांग करता रहा है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र और अधिकांश देशों ने सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता को प्राथमिकता देते हुए इसे मान्यता नहीं दी। इसी पृष्ठभूमि में इजरायल का यह फैसला अभूतपूर्व माना जा रहा है।
इजरायल का ऐलान और उसका संदेश
इजरायल ने जब सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की कि वह सोमालिलैंड को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में मान्यता देता है, तो इसे वैश्विक राजनीति में एक बड़ा मोड़ माना गया। यह पहली बार है जब किसी संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश ने सोमालिलैंड को औपचारिक मान्यता दी है।
इजरायली नेतृत्व ने इस फैसले को अपनी व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा बताया। उनके अनुसार, यह कदम क्षेत्र में इजरायल की राजनीतिक और रणनीतिक पहुंच को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया है। साथ ही, इसे मध्य पूर्व और अफ्रीका के बीच नए संबंधों के निर्माण की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
अब्राहम समझौते की छाया
इजरायल के इस फैसले को अब्राहम समझौतों की भावना से भी जोड़कर देखा जा रहा है। अब्राहम समझौते के तहत इजरायल ने हाल के वर्षों में कई अरब और मुस्लिम बहुल देशों के साथ संबंध सामान्य किए हैं। सोमालिलैंड को मान्यता देने का निर्णय इसी कड़ी का विस्तार माना जा रहा है, जहां इजरायल अपनी कूटनीतिक सीमाओं का विस्तार अफ्रीकी महाद्वीप तक करना चाहता है।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि यह कदम अब्राहम समझौतों की मूल भावना से अलग है, क्योंकि इसमें एक ऐसे क्षेत्र को मान्यता दी गई है, जिसकी स्थिति अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अभी भी विवादित है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक
इजरायल के इस फैसले के तुरंत बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने आपात बैठक बुलाने का निर्णय लिया। यह बैठक सोमवार को प्रस्तावित की गई, जिसमें इस मुद्दे पर गंभीर चर्चा होने की संभावना है।
संयुक्त राष्ट्र के भीतर यह चिंता जताई गई है कि इस मान्यता से हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में शांति और स्थिरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यह इलाका पहले ही राजनीतिक अस्थिरता, गृह संघर्ष और मानवीय संकटों से जूझ रहा है। ऐसे में किसी एकतरफा मान्यता से क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
सोमालिया की तीखी प्रतिक्रिया
इजरायल के फैसले पर सबसे कड़ी प्रतिक्रिया सोमालिया की ओर से आई है। सोमालिया ने इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा हमला बताया है। सोमाली नेतृत्व का कहना है कि सोमालिलैंड देश का अभिन्न हिस्सा है और किसी भी देश को इसे मान्यता देने का कोई अधिकार नहीं है।
सोमालिया ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह इस फैसले की निंदा करे और संयुक्त राष्ट्र के स्थापित सिद्धांतों का पालन करे। खास बात यह है कि कुछ ही दिनों में सोमालिया संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता संभालने वाला है, जिससे इस विवाद को और अधिक राजनीतिक महत्व मिल गया है।
अफ्रीकी देशों की चिंता
केवल सोमालिया ही नहीं, बल्कि कई अफ्रीकी देशों ने भी इस फैसले पर चिंता जताई है। अफ्रीकी संघ लंबे समय से सदस्य देशों की सीमाओं और क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांत का समर्थन करता रहा है। ऐसे में किसी अलगाववादी क्षेत्र को मान्यता देना अफ्रीकी राजनीति के लिए एक खतरनाक उदाहरण माना जा रहा है।
अफ्रीकी नेताओं का मानना है कि यदि इस तरह की मान्यताएं बढ़ती हैं, तो महाद्वीप के कई देशों में अलगाववादी आंदोलन और तेज हो सकते हैं, जिससे राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी।
अरब और मुस्लिम जगत की प्रतिक्रिया
इजरायल के इस फैसले को अरब और मुस्लिम देशों में भी गंभीरता से लिया गया है। कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के खिलाफ बताया है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला मुस्लिम देशों की उस मांग के उलट है, जिसमें वे लंबे समय से फिलिस्तीन जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन चाहते रहे हैं।
हालांकि कुछ लोग इसे मुस्लिम देशों की ‘दुआ कबूल होने’ जैसे शब्दों में भी देख रहे हैं, लेकिन अधिकांश कूटनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह स्थिति को और जटिल बनाने वाला कदम है।
यूरोपीय संघ की स्पष्ट राय
यूरोपीय संघ ने सुरक्षा परिषद में इजरायल के फैसले की आलोचना करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वह सोमालिया की एकता और संप्रभुता का समर्थन करता है। यूरोपीय संघ का मानना है कि हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए सोमालिया की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान अनिवार्य है।
साथ ही, यूरोपीय संघ ने सोमालिलैंड और सोमालिया की संघीय सरकार के बीच संवाद और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। उसका कहना है कि किसी भी एकतरफा कदम से समस्या और गंभीर हो सकती है।
हॉर्न ऑफ अफ्रीका में बढ़ती अस्थिरता की आशंका
हॉर्न ऑफ अफ्रीका क्षेत्र पहले से ही राजनीतिक संघर्ष, आतंकवाद, सूखा और मानवीय संकटों से प्रभावित रहा है। इजरायल के इस फैसले से इस क्षेत्र में नई कूटनीतिक दरारें पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अन्य देश भी इस रास्ते पर चलते हैं, तो यह पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल सकता है और नए संघर्षों को जन्म दे सकता है।
अंतरराष्ट्रीय कानून और मान्यता का सवाल
यह मामला अंतरराष्ट्रीय कानून के एक बुनियादी प्रश्न को भी सामने लाता है कि किसी क्षेत्र को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने का अधिकार किसके पास है। संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए।
इजरायल के फैसले ने इस सिद्धांत को चुनौती दी है और यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को हस्तक्षेप करना पड़ा है।
भविष्य की संभावनाएं और निष्कर्ष
इजरायल द्वारा सोमालिलैंड को मान्यता देना केवल एक कूटनीतिक निर्णय नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति में नई बहसों और चुनौतियों की शुरुआत है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या कोई सर्वसम्मत समाधान निकल पाता है।
यह भी स्पष्ट है कि यह फैसला केवल इजरायल और सोमालिलैंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर अफ्रीका, मध्य पूर्व और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर लंबे समय तक देखने को मिलेगा।
