किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने जीवित लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है, लेकिन उससे भी बड़ी कसौटी यह है कि वह अपने मृतकों को कितना सम्मान देता है। अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा का आखिरी पड़ाव होता है। जब किसी इंसान को मृत्यु के बाद भी यह सम्मान न मिल पाए, तो यह पूरे समाज के लिए आत्मचिंतन का विषय बन जाता है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के एक छोटे से गांव में सामने आई घटना ने यही सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जमीन का विवाद इंसानियत से बड़ा हो सकता है।

सतनूर गांव की वह सुबह जो सवाल बन गई
छिंदवाड़ा जिले की उमरेठ तहसील के ग्राम सतनूर में 31 दिसंबर की सुबह आम दिनों की तरह ही शुरू हुई थी। ठंड का मौसम था और गांव अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त था। इसी सुबह करीब छह बजे गांव की निवासी इंदिरा बाई का निधन हो गया। इंदिरा बाई एक सामान्य ग्रामीण महिला थीं, जिनका जीवन परिवार और गांव तक ही सीमित रहा। परिजनों के लिए यह दुखद क्षण था, लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार उसी दिन कर दिया जाएगा।
अंतिम यात्रा की तैयारी और अचानक खड़ा हुआ संकट
मृत्यु के बाद परिजनों ने अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू कीं। रिश्तेदारों और परिचितों को सूचना दी गई। लेकिन जैसे ही शव को मोक्षधाम ले जाने की बात आई, एक ऐसा संकट सामने खड़ा हो गया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। गांव का जो रास्ता मोक्षधाम तक जाता था, वह एक दबंग परिवार की निजी जमीन से होकर गुजरता था। जमीन विवाद के चलते उस परिवार ने शव को उस रास्ते से ले जाने से साफ इंकार कर दिया।
जब रास्ता बंद हुआ और समय थम गया
गांव में मोक्षधाम तक पहुंचने के लिए कोई वैकल्पिक सरकारी रास्ता नहीं था। यही वजह थी कि अंतिम यात्रा वहीं रुक गई। परिजन असहाय थे। सामने मां का पार्थिव शरीर था और दूसरी ओर जमीन का विवाद। शव को घर में ही रखना पड़ा। यह केवल एक परिवार का दुख नहीं था, बल्कि पूरे गांव के लिए शर्मिंदगी का कारण बन गया।
31 घंटे तक घर में पड़ा रहा शव
समय बीतता गया, लेकिन स्थिति नहीं बदली। एक दिन बीत गया, फिर रात हुई। घर में शव रखा रहा और परिजन मानसिक पीड़ा से गुजरते रहे। गांव में तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं। लोग सवाल करने लगे कि क्या किसी इंसान को मरने के बाद भी रास्ते के लिए तरसना पड़ेगा। करीब 31 घंटे तक शव घर में ही रखा रहा, जो किसी भी दृष्टि से अमानवीय स्थिति थी।
प्रशासन और पुलिस की दखल, फिर भी नहीं मानी जिद
जब मामला बढ़ता गया, तो ग्रामीणों ने प्रशासन और पुलिस को सूचना दी। उमरेठ तहसीलदार और पुलिस की टीम गांव पहुंची। उम्मीद जगी कि अब रास्ता खुल जाएगा और अंतिम संस्कार हो सकेगा। लेकिन जिस परिवार ने रास्ता रोका हुआ था, वह प्रशासन की मौजूदगी में भी अपनी जिद पर अड़ा रहा। जमीन विवाद इतना हावी हो गया कि इंसानियत पीछे छूट गई।
वैकल्पिक निजी रास्ता बना मजबूरी
स्थिति को और अधिक नहीं खींचा जा सकता था। अंततः परिजनों ने गांव के ही एक अन्य निजी रास्ते से शव को मोक्षधाम ले जाने का निर्णय लिया। यह रास्ता स्थायी समाधान नहीं था, बल्कि एक मजबूरी थी। गुरुवार दोपहर करीब एक बजे, यानी मृत्यु के 31 घंटे बाद, इंदिरा बाई का अंतिम संस्कार हो सका। उस वक्त वहां मौजूद हर व्यक्ति के मन में एक ही सवाल था कि क्या यही हमारा समाज है।
पुराना है जमीन और रास्ते का विवाद
ग्रामीणों के अनुसार मोक्षधाम तक जाने वाला रास्ता लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। यह रास्ता गौली परिवार की निजी भूमि से होकर गुजरता है। पहले इस मामले को उमरेठ तहसील न्यायालय में ले जाया गया था, जहां 12 फीट चौड़ा रास्ता देने का आदेश हुआ था। यह आदेश गांव के लिए उम्मीद की किरण था, लेकिन जमीन मालिक ने इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में अपील कर दी। मामला कोर्ट में लंबित है और इसी कानूनी पेंच का खामियाजा आम ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है।
मोक्षधाम की जमीन पर कब्जे के आरोप
सिर्फ रास्ते का ही नहीं, बल्कि मोक्षधाम की जमीन को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव का मोक्षधाम पहले करीब दो एकड़ भूमि में फैला हुआ था। समय के साथ दबंगों द्वारा अतिक्रमण किया गया और अब केवल आधा एकड़ जमीन ही बची है। बाकी भूमि पर खेती की जा रही है। इससे न सिर्फ अंतिम संस्कार में दिक्कत आती है, बल्कि गांव में लगातार तनाव की स्थिति बनी रहती है।
मोक्षधाम की बदहाली और प्रशासनिक उदासीनता
सतनूर जैसे बड़ी आबादी वाले गांव में मोक्षधाम की हालत भी चिंताजनक है। वहां आज तक शेड तक नहीं बन पाया है। बारिश के मौसम में शवों का अंतिम संस्कार तिरपाल के सहारे करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि शेड निर्माण के लिए राशि स्वीकृत हुई थी, लेकिन जमीन विवाद के चलते काम शुरू नहीं हो सका। यह प्रशासनिक लापरवाही का भी संकेत देता है।
सरपंच की भूमिका पर उठे सवाल
जब इस घटना की जानकारी गांव के सरपंच को दी गई, तो उन्होंने हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि फोन पर संपर्क करने की कोशिश भी की गई, लेकिन कॉल रिसीव नहीं की गई। इस रवैये ने गांव में नाराजगी को और बढ़ा दिया। लोग यह सवाल करने लगे कि अगर चुने हुए प्रतिनिधि भी ऐसे मामलों में आगे नहीं आएंगे, तो आम लोग किससे उम्मीद करें।
हिंदू संगठनों का विरोध और मांग
घटना की जानकारी मिलने पर कुछ हिंदू संगठनों के पदाधिकारी गांव पहुंचे। उन्होंने घटना की कड़ी निंदा की और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की। साथ ही उन्होंने गांव में मोक्षधाम तक स्थायी और सुरक्षित रास्ता उपलब्ध कराने की मांग भी रखी। उनका कहना था कि अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील मामले में जमीन विवाद को आड़े नहीं आने देना चाहिए।
गांव में फैला आक्रोश और असहजता
इस पूरी घटना के बाद गांव का माहौल बदला-बदला सा है। लोग खुलकर बोलने से डर भी रहे हैं और भीतर ही भीतर गुस्सा भी है। हर कोई जानता है कि आज यह एक परिवार के साथ हुआ है, कल किसी और के साथ भी हो सकता है। जमीन के विवाद ने गांव की सामाजिक एकता को गहरी चोट पहुंचाई है।
सवाल जो समाज से पूछे जाने चाहिए
यह घटना केवल एक खबर नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक आईना है। क्या निजी जमीन का अधिकार इतना बड़ा हो सकता है कि अंतिम संस्कार तक रोका जाए। क्या कानून की जटिलताएं मानवीय संवेदनाओं से ऊपर हो सकती हैं। और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या हम इंसान होने के नाते अपनी जिम्मेदारी भूलते जा रहे हैं।
निष्कर्ष: इंसानियत की हार और चेतावनी
छिंदवाड़ा के सतनूर गांव की यह घटना आने वाले समय के लिए एक चेतावनी है। अगर समय रहते स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। जरूरत है कि प्रशासन, न्याय व्यवस्था और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि किसी भी इंसान को मृत्यु के बाद अपमान और इंतजार का सामना न करना पड़े। मोक्षधाम का रास्ता केवल एक रास्ता नहीं, बल्कि इंसानियत की अंतिम यात्रा का प्रतीक है।
