कभी-कभी राजनीति के शोर, कानूनी बहसों और कूटनीतिक शब्दावली के बीच एक छोटा सा मानवीय इशारा सबसे ज़्यादा असर छोड़ जाता है। न्यूयॉर्क सिटी के नवनिर्वाचित मेयर ज़ोहरान ममदानी द्वारा छात्र नेता उमर ख़ालिद के लिए लिखा गया एक हस्तलिखित नोट इसी तरह का इशारा बनकर सामने आया है। यह नोट न सिर्फ़ एक व्यक्ति के प्रति समर्थन का प्रतीक है, बल्कि यह उस लंबे संघर्ष, पीड़ा और उम्मीद की कहानी भी कहता है, जो पिछले पांच वर्षों से उमर ख़ालिद और उनके परिवार के साथ जुड़ी रही है।

ज़ोहरान ममदानी का यह नोट ऐसे समय सामने आया है जब उमर ख़ालिद 2020 से दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले में यूएपीए के तहत जेल में बंद हैं। इस नोट के सार्वजनिक होने के बाद भारत और अमेरिका, दोनों देशों में राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नई चर्चा शुरू हो गई है।
कुम्हार के हाथ से निकले शब्द, जो दीवारें पार कर गए
ज़ोहरान ममदानी ने उमर ख़ालिद को अपने हाथ से लिखा जो संदेश भेजा, उसमें शब्द कम थे लेकिन भावनाएं गहरी थीं। इस नोट में उन्होंने लिखा कि वे अक्सर उमर की उस बात को याद करते हैं जिसमें कड़वाहट को अपने भीतर हावी न होने देने की बात कही गई थी। उन्होंने यह भी लिखा कि उमर के माता-पिता से मिलकर उन्हें खुशी हुई और अंत में साफ़ शब्दों में कहा कि “हम सब आपके साथ हैं।”
यह नोट उमर ख़ालिद की पार्टनर बनज्योत्सना लाहिड़ी ने सोशल मीडिया पर साझा किया। उन्होंने इसे सिर्फ़ एक राजनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि एक भावनात्मक सेतु बताया, जिसने लगभग 11,700 किलोमीटर की दूरी के बावजूद न्यूयॉर्क और दिल्ली की एक जेल के बीच मानवीय रिश्ता जोड़ दिया।
शपथ के बाद सामने आया संदेश
ज़ोहरान ममदानी ने हाल ही में न्यूयॉर्क सिटी के मेयर पद की शपथ ली है। शपथ ग्रहण के कुछ ही दिनों बाद यह नोट सामने आना अपने आप में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह दिखाता है कि सत्ता संभालने के बाद भी उन्होंने उन मुद्दों को नहीं भुलाया है, जिनसे वे पहले जुड़े रहे हैं।
ममदानी इससे पहले भी उमर ख़ालिद के समर्थन में सार्वजनिक रूप से बोलते रहे हैं। जब वे न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली के सदस्य थे, तब भी उन्होंने उमर की जेल से लिखी गई रचनाओं को सार्वजनिक मंच से पढ़ा था। उनका मानना रहा है कि लंबी हिरासत, बिना ट्रायल के, लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े करती है।
उमर ख़ालिद के माता-पिता की अमेरिका यात्रा
बनज्योत्सना लाहिड़ी के अनुसार, उमर ख़ालिद के माता-पिता दिसंबर में अमेरिका गए थे। यह यात्रा निजी और पारिवारिक कारणों से शुरू हुई थी, क्योंकि उनकी बड़ी बेटी वहां रहती हैं और छोटी बेटी की शादी में शामिल नहीं हो सकी थीं। इसी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात ज़ोहरान ममदानी और कई अन्य लोगों से हुई।
इसी मुलाकात के दौरान ममदानी ने उमर के माता-पिता के साथ समय बिताया और बातचीत की। उसी भावनात्मक माहौल में उन्होंने यह हस्तलिखित नोट लिखा, जो बाद में उमर तक पहुंचाया गया।
जेल, ज़मानत और सीमित आज़ादी
उमर ख़ालिद को पिछले साल दिसंबर में अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए अस्थायी अनुमति मिली थी। यह उनके और परिवार के लिए भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण पल था। हालांकि ज़मानत की सख्त शर्तों के कारण वे घर से बाहर नहीं जा सके और पूरा समय घर के भीतर ही बिताना पड़ा।
इससे पहले सितंबर में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें ज़मानत देने से इनकार कर दिया था। उनकी ज़मानत याचिकाएं पिछले पांच वर्षों में कई बार खारिज हो चुकी हैं। दिसंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिससे उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई।
जेएनयू से राष्ट्रीय बहस तक का सफर
उमर ख़ालिद का नाम पहली बार फरवरी 2016 में राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया, जब वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्र नेता कन्हैया कुमार के साथ जुड़े विवादों में सामने आए। उस समय से लेकर आज तक वे कई बार सुर्खियों में रहे हैं, कभी अपने बयानों के कारण तो कभी लगाए गए आरोपों की वजह से।
उमर का कहना रहा है कि मीडिया द्वारा गढ़ी गई छवि ने उन्हें एक खास खांचे में डाल दिया, जिसके चलते वे नफरत और हिंसा का निशाना बने। अगस्त 2018 में दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब के बाहर उन पर कथित तौर पर गोली चलाने की घटना ने इस खतरे को और उजागर कर दिया था।
2020 की गिरफ्तारी और कानूनी लड़ाई
सितंबर 2020 में उमर ख़ालिद को दिल्ली दंगों से जुड़ी एक कथित साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया। हालांकि एक एफआईआर में दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया, लेकिन यूएपीए के तहत दर्ज एक अन्य मामले में वे अब भी न्यायिक हिरासत में हैं।
पिछले पांच वर्षों में उनका ट्रायल शुरू न होना भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है। यही कारण है कि उनके समर्थन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज़ें उठने लगी हैं।
अमेरिकी सांसदों की अपील और अंतरराष्ट्रीय बहस
ज़ोहरान ममदानी के अलावा अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई सांसदों ने भी उमर ख़ालिद के समर्थन में आवाज़ उठाई है। जिम मैकगवर्न और जेमी रस्किन के नेतृत्व में अमेरिकी सांसदों ने भारत में उनके लिए ज़मानत और ट्रायल शुरू किए जाने की अपील की है।
भारतीय राजदूत को लिखे गए पत्र में सांसदों ने कहा कि बिना ट्रायल के लंबी हिरासत अंतरराष्ट्रीय कानून के मानदंडों का उल्लंघन है। इस पत्र पर कई प्रमुख सांसदों के हस्ताक्षर हैं और इसे सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया।
भारत में प्रतिक्रियाएं और कूटनीतिक चिंता
अमेरिकी सांसदों की इस अपील पर भारत में तीखी प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इसे भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के बयान भारत-अमेरिका संबंधों को और जटिल बना सकते हैं, जो पहले से ही वैश्विक राजनीति के दबाव में हैं।
उनका तर्क है कि विदेशी नेताओं को भारत के आंतरिक कानूनी मामलों में टिप्पणी करने के बजाय अपने देश की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।
एक नोट, कई अर्थ
ज़ोहरान ममदानी का लिखा गया वह छोटा सा नोट अब सिर्फ़ एक निजी संदेश नहीं रहा। यह एक प्रतीक बन गया है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, न्यायिक प्रक्रिया और मानवीय संवेदना जैसे मुद्दों को फिर से चर्चा के केंद्र में ले आया है।
यह घटना दिखाती है कि कैसे एक व्यक्ति की कहानी अंतरराष्ट्रीय राजनीति, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़कर एक व्यापक बहस का रूप ले सकती है।
निष्कर्ष
उमर ख़ालिद का मामला अब केवल एक कानूनी केस नहीं, बल्कि एक वैश्विक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। ज़ोहरान ममदानी का नोट, अमेरिकी सांसदों की अपील और भारत में उठी प्रतिक्रियाएं इस बात का संकेत हैं कि आने वाले समय में यह मुद्दा और गहराएगा। सवाल यह नहीं है कि कौन किस पक्ष में है, बल्कि यह है कि न्याय, प्रक्रिया और मानवीय दृष्टिकोण के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
