छिंदवाड़ा जिले में जहरीले कफ सीरप से 25 बच्चों की मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। इस दिल दहला देने वाली घटना के बाद जबलपुर स्थित कटारिया फार्मास्यूटिकल कंपनी के संचालक राजपाल कटारिया की मुश्किलें बढ़ गई हैं। ड्रग लाइसेंस निरस्त किए जाने के खिलाफ दायर उनकी याचिका पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कोई राहत देने से इंकार कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि इस मामले में अंतिम निर्णय राज्य सरकार के समक्ष अपील के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

मामले की शुरुआत: बच्चों की मौत से मचा हड़कंप
सितंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में छिंदवाड़ा जिले के कई गांवों में अचानक बच्चों की तबीयत बिगड़ने के मामले सामने आए। अस्पतालों में भर्ती किए गए बच्चों में से कई को खांसी, उल्टी, और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत थी। जांच के बाद पता चला कि इन सभी बच्चों को एक ही दवा — कोल्डड्रिफ कफ सीरप — दी गई थी, जो श्रीसन फार्मा द्वारा निर्मित और कटारिया फार्मास्यूटिकल के माध्यम से सप्लाई की गई थी।
कुछ ही दिनों में 25 से अधिक मासूमों की मौत हो गई। स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई करते हुए सीरप के सैंपल जांच के लिए भेजे। जांच में पाया गया कि दवा में डायथिलीन ग्लाइकॉल (Diethylene Glycol) जैसे जहरीले तत्व की मात्रा अनुमत सीमा से अधिक थी — वही रासायनिक तत्व जिसने पहले भी कई देशों में बच्चों की जान ली थी।
ड्रग विभाग की कार्रवाई
11 अक्टूबर 2025 को जबलपुर ड्रग लाइसेंस अथॉरिटी ने तत्काल प्रभाव से कटारिया फार्मास्यूटिकल का लाइसेंस निरस्त कर दिया। विभाग का कहना था कि जिस कंपनी के माध्यम से जहरीली दवा वितरित हुई, उसे प्राथमिक जिम्मेदार माना जाएगा। राजपाल कटारिया को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा गया, लेकिन अधिकारियों को उनका उत्तर संतोषजनक नहीं लगा।
इसके बाद कंपनी पर न केवल लाइसेंस रद्द किया गया, बल्कि थोक वितरण और भंडारण पर भी रोक लगा दी गई।
राजपाल कटारिया की दलीलें
राजपाल कटारिया ने जबलपुर हाईकोर्ट में दायर याचिका में कहा कि उन्होंने हमेशा वैध प्रक्रिया के तहत दवाओं की सप्लाई की है। उन्होंने यह भी बताया कि उनकी कंपनी केवल वितरक (Distributor) के रूप में काम करती है, दवा का निर्माण नहीं करती। उनका कहना था कि दोष निर्माण कंपनी श्रीसन फार्मा का है, न कि उनके वितरण केंद्र का। कटारिया ने अदालत से यह आग्रह किया कि लाइसेंस निरस्तीकरण पर अंतरिम रोक (Stay Order) लगाई जाए, ताकि वे अपना व्यवसाय जारी रख सकें। उन्होंने कहा कि वे वर्षों से लाइसेंसधारी फार्मा व्यवसायी हैं और अब तक उनके खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई थी।
हाईकोर्ट का निर्णय
न्यायमूर्ति पी.के. जोशी की एकलपीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह मामला सीधे अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। लाइसेंस निरस्त किए जाने के आदेश के खिलाफ अपील का उचित मंच राज्य सरकार का अपीलीय प्राधिकरण है। अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपनी अपील राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक राज्य सरकार कोई निर्णय नहीं देती, तब तक लाइसेंस निरस्तीकरण का आदेश प्रभावी रहेगा।
कोर्ट ने क्या कहा – मुख्य बिंदु
- यह मामला प्रशासनिक स्तर पर राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
- अदालत प्रशासनिक कार्रवाई में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकती जब तक कानूनी विकल्प समाप्त न हो।
- याचिकाकर्ता को अपीलीय मंच पर जाकर राहत मांगनी चाहिए।
- बच्चों की मौत जैसी गंभीर घटना में किसी भी लापरवाही को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
छिंदवाड़ा में जांच जारी
इस बीच छिंदवाड़ा जिले में स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम ने जांच जारी रखी है। जांच में यह बात सामने आई कि कोल्डड्रिफ कफ सीरप के कई बैच बिना उचित क्वालिटी चेक के ही बाजार में पहुंच गए थे। कुछ दुकानदारों ने भी यह स्वीकार किया कि उन्हें दवा की गुणवत्ता पर संदेह था, लेकिन कमीशन और मांग के कारण उन्होंने बिक्री जारी रखी। अब तक इस मामले में श्रीसन फार्मा के तीन अधिकारियों और कटारिया फार्मा के दो कर्मचारियों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया जा चुका है।
स्वास्थ्य विभाग की सख्ती
राज्य स्वास्थ्य विभाग ने घटना के बाद पूरे प्रदेश में दवा दुकानों और वितरकों की अचानक जांच (Raid) शुरू कर दी है। पिछले एक महीने में 200 से अधिक सैंपल जांच के लिए भेजे जा चुके हैं। कई कंपनियों को चेतावनी दी गई है कि अगर गुणवत्ता मानकों का पालन नहीं हुआ तो उनके लाइसेंस भी निलंबित कर दिए जाएंगे।
राज्य सरकार का रुख
राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि बच्चों की मौत जैसे गंभीर मामलों में कोई नरमी नहीं बरती जाएगी।
स्वास्थ्य मंत्री ने कहा —
“यह केवल एक कानूनी मामला नहीं, बल्कि मानवता से जुड़ा अपराध है। हर उस व्यक्ति या कंपनी पर कार्रवाई होगी जिसने ज़रा सी भी लापरवाही की है।”
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, कोर्ट का यह आदेश सही दिशा में है। जब तक अपीलीय प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक किसी भी राहत की उम्मीद करना जल्दबाज़ी होगी। अगर राज्य सरकार भी लाइसेंस निरस्तीकरण को सही ठहराती है, तो कंपनी को उच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच या सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ सकता है।
लोगों का गुस्सा और पीड़ित परिवारों की मांग
छिंदवाड़ा के पीड़ित परिवार अब भी न्याय की उम्मीद में हैं। कई परिवारों ने कहा कि उन्हें आज तक किसी भी कंपनी अधिकारी या सरकारी प्रतिनिधि ने औपचारिक रूप से माफी तक नहीं मांगी। मृत बच्चों के माता-पिता की आंखों में अब भी उस दर्द की छवि है जो कभी मिट नहीं सकती। वे मांग कर रहे हैं कि दोषियों को सख्त सजा मिले और दवा सुरक्षा कानूनों को और कठोर बनाया जाए।
भारत में दवा सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
इस घटना ने भारत की ड्रग मॉनिटरिंग सिस्टम पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। हर साल देश में हजारों नई दवाएं बाजार में आती हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता जांचने वाली एजेंसियों की संख्या सीमित है। विशेषज्ञों का कहना है कि “जांच केवल कागजों पर होती है, जबकि जमीनी स्तर पर निरीक्षण बेहद कमजोर है।” इस घटना के बाद केंद्र सरकार ने भी निर्देश जारी किए हैं कि सभी राज्य ड्रग कंट्रोलर अपने-अपने क्षेत्रों में थोक वितरकों का पुनः सत्यापन करें।
अंतरराष्ट्रीय असर
भारत की दवाओं की साख पर भी असर पड़ा है। अफ्रीका और एशिया के कुछ देशों ने भारत से आयातित कफ सीरप के बैचों की जांच शुरू कर दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने पहले ही चेतावनी दी थी कि कम गुणवत्ता वाली दवाएं विकासशील देशों के लिए गंभीर खतरा हैं।
कटारिया फार्मा की भविष्य की चुनौती
अब कटारिया फार्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है — अपनी साख वापस पाना। राजपाल कटारिया को न केवल कानूनी लड़ाई लड़नी होगी, बल्कि जनता के विश्वास को भी पुनः हासिल करना होगा। कंपनी की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हुई है, क्योंकि लाइसेंस निरस्त होने से कारोबार पूरी तरह ठप हो गया है।
निष्कर्ष
छिंदवाड़ा कफ सीरप कांड सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि देश की दवा प्रणाली की कमजोर कड़ी को उजागर करने वाला आईना है।
25 मासूमों की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब तक हम दवा उत्पादन, वितरण और निगरानी में पारदर्शिता नहीं लाते — तब तक ऐसे हादसे दोहराए जा सकते हैं। हाईकोर्ट का फैसला यह याद दिलाता है कि न्याय प्रक्रिया का पालन हर स्तर पर होना चाहिए, चाहे आरोपी कितना भी बड़ा क्यों न हो।
