नए साल की शुरुआत आमतौर पर नई उम्मीदों और योजनाओं के साथ होती है, लेकिन 2026 के पहले ही कारोबारी दिनों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जापान से ऐसा आर्थिक संकेत सामने आया है, जिसने वैश्विक वित्तीय बाजारों की धड़कनें तेज कर दी हैं। यह संकेत किसी नीति घोषणा या आपातकालीन बयान के रूप में नहीं आया, बल्कि बॉन्ड मार्केट के आंकड़ों के जरिए सामने आया है।

जापान के सरकारी बॉन्ड की यील्ड करीब 30 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। यह घटना केवल जापान तक सीमित नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर ग्लोबल बॉन्ड मार्केट, करेंसी बाजार, इक्विटी मार्केट और भारत जैसे उभरते देशों की अर्थव्यवस्थाओं तक महसूस किया जा सकता है।
जापान की अर्थव्यवस्था और बॉन्ड मार्केट की पृष्ठभूमि
जापान दशकों से बेहद कम ब्याज दरों वाली अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता रहा है। लंबे समय तक डिफ्लेशन और कमजोर मांग से जूझने के कारण जापान ने लगभग शून्य या बेहद कम ब्याज दरों की नीति अपनाई थी। यही कारण है कि जापान को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सस्ते पैसे का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता रहा है।
जापान के सरकारी बॉन्ड, जिन्हें जापानी गवर्नमेंट बॉन्ड या जेजीबी कहा जाता है, लंबे समय तक बेहद कम यील्ड पर ट्रेड होते रहे हैं। निवेशकों के लिए यह सामान्य बात थी कि जापान में बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न बेहद सीमित होगा, लेकिन स्थिरता और सुरक्षा बनी रहेगी।
30 साल बाद बॉन्ड यील्ड में ऐतिहासिक उछाल
2026 के पहले कारोबारी दिन जापान के बॉन्ड मार्केट में जो हलचल दिखी, उसने निवेशकों को सतर्क कर दिया। जापान के 10 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड बढ़कर 2.125 प्रतिशत तक पहुंच गई। यह स्तर फरवरी 1999 के बाद पहली बार देखा गया है।
इतना ही नहीं, शॉर्ट टर्म बॉन्ड मार्केट में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला। जापान के 2 साल के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 1.195 प्रतिशत तक चढ़ गई, जो अगस्त 1996 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।
यह स्थिति इस बात का संकेत है कि बाजार अब यह मानकर चल रहा है कि आने वाले समय में ब्याज दरों में और बढ़ोतरी हो सकती है। शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म, दोनों ही मोर्चों पर यील्ड का बढ़ना किसी गहरे बदलाव की ओर इशारा करता है।
बैंक ऑफ जापान की भूमिका और नीति बदलाव
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में बैंक ऑफ जापान की भूमिका को देखा जा रहा है। पिछले महीने बैंक ऑफ जापान ने अपनी पॉलिसी रेट को 0.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.75 प्रतिशत कर दिया था। यह कदम अपने आप में ऐतिहासिक माना गया, क्योंकि जापान लंबे समय तक बेहद नरम मौद्रिक नीति का पालन करता रहा है।
हालांकि बैंक ऑफ जापान के गवर्नर काजुओ उएडा ने आगे की ब्याज दर बढ़ोतरी को लेकर कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं बताई है, लेकिन बाजार की धारणा कुछ और ही संकेत दे रही है। निवेशकों और विश्लेषकों का मानना है कि कमजोर येन और बढ़ती महंगाई केंद्रीय बैंक को और सख्त कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकती है।
कमजोर येन और बढ़ती महंगाई का दबाव
जापानी येन लंबे समय से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमजोर बना हुआ है। कमजोर मुद्रा का सीधा असर आयात पर पड़ता है। जब येन कमजोर होता है, तो जापान के लिए कच्चा माल, ऊर्जा और ईंधन जैसी जरूरी चीजें महंगी हो जाती हैं।
इसका परिणाम यह होता है कि घरेलू महंगाई पर दबाव बढ़ता है। जापान, जो लंबे समय तक डिफ्लेशन से लड़ता रहा, अब धीरे-धीरे महंगाई के दबाव को महसूस कर रहा है। यही दबाव बॉन्ड यील्ड में उछाल की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है।
कैरी ट्रेड और वैश्विक बाजारों पर असर
जापान की अर्थव्यवस्था का एक अहम पहलू कैरी ट्रेड से जुड़ा हुआ है। दशकों तक जापान में बेहद कम ब्याज दरें रहने के कारण जापानी निवेशक सस्ते ब्याज पर पैसा उधार लेते रहे हैं और उसे अमेरिका, यूरोप, एशिया और भारत जैसे बाजारों में निवेश करते रहे हैं।
इस प्रक्रिया को कैरी ट्रेड कहा जाता है। इसमें निवेशक कम ब्याज वाले देश से कर्ज लेकर ज्यादा रिटर्न वाले बाजारों में निवेश करते हैं। जापान इस कैरी ट्रेड का सबसे बड़ा स्रोत रहा है।
लेकिन अब जैसे-जैसे जापान में बॉन्ड यील्ड बढ़ रही है और ब्याज दरें ऊपर जा रही हैं, यह सस्ता पैसा वापस जापान लौट सकता है। यही वह बिंदु है, जहां से वैश्विक बाजारों के लिए जोखिम बढ़ता है।
भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए खतरे की घंटी
भारत को लंबे समय से उभरते बाजारों में एक मजबूत निवेश गंतव्य माना जाता रहा है। विदेशी निवेशकों की बड़ी हिस्सेदारी भारतीय शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट में देखने को मिलती है।
अगर जापानी निवेशक अपने देश में ही बेहतर रिटर्न पाने लगते हैं, तो वे भारत समेत अन्य उभरते बाजारों से पूंजी निकाल सकते हैं। इसका सीधा असर भारतीय बॉन्ड यील्ड, रुपये की विनिमय दर और शेयर बाजार पर पड़ सकता है।
रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव आ सकता है और शेयर बाजार में अस्थिरता देखने को मिल सकती है। यही कारण है कि जापान में हुए इस बदलाव को भारत के संदर्भ में भी बेहद अहम माना जा रहा है।
ग्लोबल बॉन्ड, करेंसी और इक्विटी मार्केट पर प्रभाव
जापान की बॉन्ड यील्ड में 30 साल बाद आया यह उछाल केवल एक देश की कहानी नहीं है। वैश्विक वित्तीय बाजार आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।
अगर जापान में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड, यूरोपीय बॉन्ड और अन्य देशों के बॉन्ड पर भी दबाव आ सकता है। निवेशक अपने पोर्टफोलियो को नए सिरे से संतुलित कर सकते हैं, जिससे करेंसी और इक्विटी मार्केट में भी हलचल बढ़ सकती है।
जापान सरकार के कदम और आगे की चुनौतियां
जापान सरकार ने अगले वित्त वर्ष में सुपर-लॉन्ग टर्म बॉन्ड की नई इश्यू को घटाने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य बाजार में बॉन्ड की अधिक आपूर्ति से होने वाले दबाव को कम करना है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा यील्ड मूवमेंट यह संकेत दे रहा है कि सरकार और केंद्रीय बैंक को आगे और भी कदम उठाने पड़ सकते हैं। यदि महंगाई और मुद्रा दबाव बना रहता है, तो नीति निर्माताओं के सामने संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगा।
जापान की बदलती पहचान और वैश्विक संकेत
कुल मिलाकर, जापान की बॉन्ड यील्ड में 30 साल बाद आया यह उछाल केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह उस बड़े बदलाव का संकेत है, जहां दुनिया की एक बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी पुरानी लो-रेट पहचान को धीरे-धीरे छोड़ रही है।
जापान लंबे समय तक कम ब्याज दरों और सस्ते पैसे का प्रतीक रहा है। अब अगर यह ट्रेंड बदलता है, तो इसका असर वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर गहराई से पड़ेगा।
निवेशकों के लिए संकेत और सावधानी
निवेशकों के लिए यह समय सतर्क रहने का है। वैश्विक संकेतों को नजरअंदाज करना जोखिम भरा हो सकता है। जापान से आया यह झटका बताता है कि आने वाले समय में ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
भारत समेत दुनिया भर के बाजारों को इस बदलाव के अनुरूप खुद को ढालना होगा।
निष्कर्ष
2026 की शुरुआत में जापान की बॉन्ड यील्ड का 30 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचना एक ऐतिहासिक घटना है। यह न केवल जापान की आर्थिक दिशा में बदलाव का संकेत है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी भी है।
अगर यह ट्रेंड आगे बढ़ता है, तो ग्लोबल बॉन्ड, करेंसी और इक्विटी मार्केट पर इसका असर दिखना तय है। भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए यह समय सतर्कता और समझदारी से फैसले लेने का है।
