नए साल की शुरुआत जहां आम लोगों के लिए खुशी, उत्सव और नई उम्मीदों का प्रतीक होती है, वहीं इस बार छिंदवाड़ा कलेक्ट्रेट परिसर में हुई एक घटना ने प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी अनुशासन और सोशल मीडिया संस्कृति को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। जिला मुख्यालय स्थित कलेक्टर कार्यालय परिसर में 34 सरकारी कर्मचारियों द्वारा फिल्मी गाने पर डांस करते हुए बनाई गई एक रील सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गई, जिसके बाद सवाल उठने लगे कि क्या सरकारी दफ्तरों की गरिमा अब कैमरे और रील्स के शोर में दबती जा रही है।

यह पूरा मामला शुक्रवार का बताया जा रहा है, जब नए साल के मौके पर कलेक्टर कार्यालय परिसर की पार्किंग में कर्मचारियों के एक समूह ने हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘धुरंधर’ के लोकप्रिय गाने ‘रहमान डकैत’ पर डांस करते हुए वीडियो रिकॉर्ड किया। इस रील में कुल 34 कर्मचारी दिखाई दे रहे हैं, जिनमें 12 पुरुष और 22 महिला कर्मचारी शामिल हैं। वीडियो की अवधि करीब एक मिनट बीस सेकंड है और इसमें कुछ वरिष्ठ अधिकारी भी फ्रेम में नजर आते हैं।
वीडियो सामने आने के बाद यह कुछ ही घंटों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वायरल हो गया। देखते ही देखते यह वीडियो छिंदवाड़ा से निकलकर पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया। लोग इसे मनोरंजन के तौर पर देख रहे हैं तो वहीं बड़ी संख्या में लोग इसे सरकारी दफ्तर की मर्यादा के खिलाफ मान रहे हैं।
सरकारी कार्यालयों को आमतौर पर अनुशासन, समयबद्धता और गंभीरता का प्रतीक माना जाता है। यहां आने वाला हर नागरिक यह उम्मीद करता है कि उसकी समस्याओं को जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ सुना जाएगा। ऐसे में कार्यालय परिसर में फिल्मी गानों पर डांस और रील बनाना कई लोगों को असहज कर रहा है। उनका कहना है कि इससे प्रशासन की गंभीर छवि को नुकसान पहुंचता है और कर्मचारियों के कामकाज पर भी सवाल उठते हैं।
हालांकि इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी सामने आया है। वीडियो में शामिल कुछ कर्मचारियों का कहना है कि यह गतिविधि कार्यालय समय के दौरान नहीं बल्कि लंच ब्रेक के समय की गई थी। उनका तर्क है कि नए साल के अवसर पर सभी ने आपसी खुशी साझा करने और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देने के लिए यह छोटा सा वीडियो बनाया था। कर्मचारियों के अनुसार इसका उद्देश्य किसी भी तरह से अनुशासन भंग करना या कार्यालय की छवि को नुकसान पहुंचाना नहीं था।
इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या सरकारी कार्यालयों में सोशल मीडिया कंटेंट बनाने को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश मौजूद हैं या नहीं। तकनीक और सोशल मीडिया के इस दौर में हर व्यक्ति के हाथ में कैमरा है और हर पल रिकॉर्ड होकर इंटरनेट पर पहुंच सकता है। सरकारी कर्मचारी भी इसी समाज का हिस्सा हैं, लेकिन उनसे जुड़े नियम और अपेक्षाएं आम लोगों से अलग होती हैं।
वीडियो के वायरल होते ही स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई। कुछ लोग इसे कर्मचारियों की सहजता और मानवीय पक्ष से जोड़कर देख रहे हैं, तो वहीं कई नागरिकों का कहना है कि सरकारी दफ्तर किसी उत्सव स्थल या मनोरंजन केंद्र की तरह नहीं होने चाहिए। उनका मानना है कि अगर इस तरह की गतिविधियों को सामान्य मान लिया गया, तो भविष्य में कार्यालयों की कार्यसंस्कृति पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
मामले पर कलेक्टर हरेंद्र नारायण की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस वीडियो के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी। कलेक्टर के अनुसार, फिलहाल कार्यालय परिसर में वीडियो शूटिंग पर कोई स्पष्ट प्रतिबंध लागू नहीं था, लेकिन वायरल वीडियो को संज्ञान में लेते हुए पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली जा रही है। उन्होंने यह भी संकेत दिए कि तथ्यों की जांच के बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।
यह बयान प्रशासन की सतर्कता को दर्शाता है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि सरकारी कार्यालयों में सोशल मीडिया गतिविधियों को लेकर एक स्पष्ट नीति की कमी महसूस की जा रही है। आज जब रील और शॉर्ट वीडियो युवाओं से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक की दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं, तब सरकारी तंत्र के सामने यह एक नई चुनौती है कि वह आधुनिक अभिव्यक्ति और प्रशासनिक अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाए।
छिंदवाड़ा कलेक्ट्रेट का यह मामला कोई पहला उदाहरण नहीं है, जब सरकारी कर्मचारियों की सोशल मीडिया गतिविधियां विवाद का कारण बनी हों। देश के अलग-अलग हिस्सों में पहले भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां सरकारी दफ्तरों में वीडियो शूटिंग, रील बनाना या सोशल मीडिया पोस्ट पर अनुशासनात्मक सवाल उठे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या सरकारी कार्यस्थलों के लिए डिजिटल आचरण संहिता को और स्पष्ट करने की जरूरत है। कर्मचारी अपनी व्यक्तिगत खुशी और अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ-साथ जिस संस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसकी गरिमा बनाए रखना भी उनकी जिम्मेदारी होती है।
फिलहाल छिंदवाड़ा कलेक्ट्रेट की यह रील चर्चा में है और प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं। यह मामला आने वाले समय में सरकारी दफ्तरों में सोशल मीडिया व्यवहार को लेकर एक मिसाल बन सकता है।
