दुनिया के सबसे खुशहाल, विकसित और सामाजिक सुरक्षा के लिए पहचाने जाने वाले देशों में डेनमार्क का नाम हमेशा शीर्ष पर लिया जाता है। स्कैंडिनेवियाई जीवनशैली, स्वच्छ वातावरण, उच्च जीवन स्तर और सामाजिक समानता के लिए मशहूर यह देश अब एक ऐसे कारण से वैश्विक चर्चा में है, जिसने चिकित्सा, नैतिकता और मानव भविष्य से जुड़े गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला डेनमार्क की तेजी से फलती-फूलती स्पर्म डोनेशन इंडस्ट्री से जुड़ा है, जिसे लंबे समय से आधुनिक परिवार नियोजन और प्रजनन स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता रहा है।

डेनमार्क में स्पर्म डोनेशन अब केवल एक चिकित्सा सेवा नहीं बल्कि एक संगठित वैश्विक उद्योग बन चुका है। यहां हर सौ बच्चों में से एक बच्चा स्पर्म डोनेशन के जरिए जन्म लेता है। छह मिलियन की आबादी वाला यह छोटा सा देश दुनिया भर में शुक्राणु निर्यात करने में एक पावरहाउस के रूप में उभरा है। लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसा स्याह सच छिपा है, जिसने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को झकझोर दिया है।
डेनमार्क के दूसरे सबसे बड़े शहर आरहस के केंद्र में स्थित लाल ईंटों की एक इमारत, जो बाहर से किसी सामान्य दफ्तर जैसी दिखती है, दरअसल दुनिया के सबसे बड़े स्पर्म बैंक का संचालन केंद्र है। यहीं से हजारों डोनरों का डेटा, जैविक सैंपल और वैश्विक ऑर्डर मैनेज किए जाते हैं। यह संस्था 100 से अधिक देशों में स्पर्म की आपूर्ति करती है और आधुनिक मेडिकल टेक्नोलॉजी के जरिए मानव प्रजनन के स्वरूप को बदलने में अहम भूमिका निभा रही है।
बीते वर्षों में दुनियाभर की महिलाओं और दंपतियों में डेनमार्क से स्पर्म खरीदने की होड़ देखी गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह डेनिश डोनरों की शारीरिक बनावट, गोरा रंग, नीली आंखें और मजबूत जेनेटिक प्रोफाइल को लेकर बनी धारणा है। इसी धारणा ने ‘वाइकिंग स्पर्म’ और ‘वाइकिंग बेबी’ जैसे शब्दों को जन्म दिया। यह कल्पना की जाने लगी कि डेनमार्क के डोनरों से जन्म लेने वाले बच्चे न केवल सुंदर बल्कि अधिक स्वस्थ, मजबूत और बुद्धिमान होंगे।
यहीं से इस इंडस्ट्री का सबसे खतरनाक पहलू सामने आता है। सुंदरता और स्वास्थ्य के वादे ने महिलाओं को एक तरह की जैविक पसंद की ओर धकेल दिया, जहां जेनेटिक्स को एक उत्पाद की तरह बेचा जाने लगा। डोनर की प्रोफाइल में उसकी तस्वीरें, शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि और शारीरिक गुण दिखाए जाने लगे। यह सब कुछ कानूनी और तकनीकी रूप से वैध था, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणामों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
इस पूरे मॉडल की कमजोरियां तब उजागर हुईं जब एक चौंकाने वाली जांच रिपोर्ट सामने आई। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि एक ही स्पर्म डोनर 14 देशों की 67 क्लीनिकों के जरिए कम से कम 197 बच्चों का जैविक पिता बन चुका है। इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह था कि उस डोनर में एक ऐसा जेनेटिक म्यूटेशन मौजूद था, जो एक जानलेवा कैंसर से जुड़ा हुआ है। इस म्यूटेशन के कारण कई बच्चों में कैंसर विकसित होने का खतरा पाया गया और कुछ मामलों में बच्चों की मौत भी हो चुकी है।
यह डोनर वर्ष 2005 से लगातार स्पर्म डोनेशन कर रहा था और करीब 17 वर्षों तक उसकी पहचान और जेनेटिक जोखिम पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं रखा गया। इतने लंबे समय तक एक ही व्यक्ति का स्पर्म दर्जनों देशों में उपयोग होना, मौजूदा निगरानी प्रणालियों की गंभीर विफलता को उजागर करता है। जिन बच्चों में यह म्यूटेशन पाया गया है, उन्हें अब जीवन भर नियमित मेडिकल निगरानी की आवश्यकता होगी।
यह मामला केवल एक व्यक्ति या एक संस्था की लापरवाही तक सीमित नहीं है। यह पूरी स्पर्म डोनेशन इंडस्ट्री की संरचना और वैश्विक रेगुलेशन पर सवाल उठाता है। जब एक ही डोनर सैकड़ों बच्चों का जैविक पिता बन जाता है, तो न केवल जेनेटिक बीमारियों का जोखिम बढ़ता है, बल्कि भविष्य में अनजाने में रिश्तों के बीच विवाह जैसी सामाजिक जटिलताएं भी उत्पन्न हो सकती हैं।
यूरोप में स्पर्म डोनेशन का बाजार लगभग 1.3 अरब यूरो का आंका गया है, जिसके 2033 तक 2.3 अरब यूरो तक पहुंचने की उम्मीद है। इस तेजी से बढ़ते बाजार में डेनमार्क सबसे बड़ा निर्यातक है। यहां से एक छोटी सी शीशी, जिसमें मात्र आधा मिलीलीटर स्पर्म होता है, 100 से लेकर 1,000 यूरो तक में बेची जाती है। यह कीमत डोनर की प्रोफाइल, जेनेटिक टेस्ट और अतिरिक्त सेवाओं पर निर्भर करती है।
नीदरलैंड और बेल्जियम जैसे देशों में स्पर्म डोनेशन से जन्म लेने वाले बच्चों में से करीब 60 प्रतिशत के जैविक पिता डेनिश होते हैं। यह आंकड़ा इस बात को दर्शाता है कि डेनमार्क की स्पर्म इंडस्ट्री का प्रभाव केवल राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे यूरोप और उससे आगे तक फैला हुआ है।
कैंसर म्यूटेशन वाले मामले के सामने आने के बाद यूरोपीय संघ के अधिकारियों ने स्पर्म एक्सपोर्ट की निगरानी के लिए एक अंतरराष्ट्रीय रजिस्ट्री की मांग तेज कर दी है। उनका मानना है कि जब जैविक सामग्री सीमाओं के पार भेजी जा रही है, तो उसकी ट्रैकिंग और नियंत्रण भी वैश्विक स्तर पर होना चाहिए।
डेनमार्क की स्पर्म इंडस्ट्री के लिए यह समय एक बड़ी चुनौती का है। एक ओर दुनिया भर से वाइकिंग स्पर्म की मांग बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर नियामक खामियां और नैतिक सवाल इस पूरे मॉडल की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। यह बहस अब केवल मेडिकल विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाजशास्त्री, नीति निर्माता और मानवाधिकार संगठनों का भी ध्यान आकर्षित कर रही है।
यह मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भविष्य में इंसानों का चयन भी बाजार के नियमों से तय होगा। क्या सुंदरता, रंग और आंखों के आधार पर जेनेटिक्स को प्राथमिकता देना मानव विविधता के लिए खतरा बन सकता है। डेनमार्क की यह कहानी आधुनिक विज्ञान की ताकत और उसकी सीमाओं दोनों को उजागर करती है।
आज जब पूरी दुनिया इस इंडस्ट्री की ओर देख रही है, तो यह साफ है कि स्पर्म डोनेशन को केवल एक निजी निर्णय नहीं बल्कि एक वैश्विक जिम्मेदारी के रूप में देखने की जरूरत है। डेनमार्क का यह अनुभव आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मेडिकल एथिक्स को नई दिशा दे सकता है।
