भोपाल, मध्य प्रदेश की राजधानी, आज भी यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी के 41 साल बाद अपने अतीत की भयंकर छाया में जूझ रही है। यह त्रासदी, जो 1984 में हुई थी, केवल तत्कालीन समय के लिए ही नहीं बल्कि आज भी यहाँ के 42 बस्तियों में रह रहे लोगों के जीवन को प्रभावित कर रही है। इन बस्तियों में बड़ी संख्या में लोग आज भी दूषित जल पीने को मजबूर हैं, जो मल-मूत्र और खतरनाक रसायनों से मिश्रित है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और नगर निगम द्वारा कई बार किए गए वादों के बावजूद इन बस्तियों में पानी की गुणवत्ता सुधारने का कोई ठोस परिणाम नहीं निकला है। विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का कहना है कि पानी में हैवी मेटल, डाइक्लोरोइथीन और ई.कोलाई बैक्टीरिया की उपस्थिति ने स्वास्थ्य जोखिम को और गंभीर बना दिया है। इन रसायनों और बैक्टीरिया से बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर विशेष खतरा मंडरा रहा है।
निगरानी और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
गैस पीड़ित संगठनों की लगातार शिकायतों के बाद, मई 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने भोपाल की प्रभावित बस्तियों की निगरानी के लिए एक विशेष समिति बनाई थी। इस समिति ने विभिन्न बस्तियों के हैंडपंप और कुओं का पानी परीक्षण किया, जिसमें हैवी मेटल और डाइक्लोरोइथीन पाए गए। इस समिति ने नगर निगम को निर्देश दिया कि पानी की पाइपलाइन को सीवर से अलग किया जाए और सभी जल स्रोतों को सुरक्षित बनाया जाए।
नगर निगम ने 2017 में पाइपलाइन से जलापूर्ति शुरू की, लेकिन पाइपलाइन नालियों और सीवेज लाइन के पास से होकर गुज़री, जिससे 2018 में ई.कोलाई बैक्टीरिया पाए गए। यह स्पष्ट संकेत था कि अमृत-1 और अमृत-2 योजनाओं का उद्देश्य पूरी तरह से पूरा नहीं हुआ और जल वितरण प्रणाली में गंभीर कमियाँ अभी भी मौजूद हैं।
अमृत योजना का विफल होना
अमृत-1 योजना के तहत नगर निगम को सीवर लाइन और जलापूर्ति लाइन को अलग करना था, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया। अप्रैल 2025 में दोबारा निरीक्षण में कई कॉलोनियों में टूटी पाइपलाइन, सीवर मिश्रित पानी और टैप कनेक्शन की कमी जैसी समस्याएं सामने आईं। अमृत-2 योजना के तहत भी कोई सुधार नहीं हुआ। गैस पीड़ित संगठन भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन के अनुसार, यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के पीछे बसे इलाके आज भी दूषित जल पीने को मजबूर हैं।
नगर निगम की हालिया कार्रवाई
भोपाल नगर निगम ने शनिवार को शहर के अलग-अलग हिस्सों में पाइपलाइन मेंटेनेंस, सीवेज चैंबर की सफाई और डोर-टू-डोर पानी सैंपलिंग का काम जारी रखा। करोंद, हाउसिंग पार्क कॉलोनी, नवाब कॉलोनी, साकेत नगर, शिर्डीपुरम, अमराई, सुरेश नगर, दमखेड़ा, संजय नगर और आंबेडकर नगर समेत 35 से ज्यादा इलाकों में लीकेज सुधार और पानी की गुणवत्ता जांच की गई।
जलकार्य अधीक्षण यंत्री उदित गर्ग ने बताया कि लीकेज सुधार का काम लगातार जारी रहेगा और किसी भी शिकायत मिलने पर तत्काल कार्रवाई की जा रही है। नगर निगम ने भी शहर के भीम नगर, यादव मोहल्ला, कुमार मोहल्ला, अंबेडकर नगर, कोटरा, नया बसेरा, जहांगीराबाद, प्रजापति मोहल्ला, रेलवे स्टेशन झुग्गी, वन ट्री हिल्स झुग्गी, सिंगारचोली गांव, धोबी घाट, हज हाउस, महावीर बस्ती, नई बस्ती, शिव शक्ति नगर, प्रीत नगर, उड़िया बस्ती, ब्लू मून कॉलोनी, गरीब नगर, वाजपेयी नगर, मदर इंडिया झुग्गी, हरिजन बस्ती, जाटखेड़ी, अमराई, सुरेश नगर, कन्हाकुंज फेज-2, दमखेड़ा बी सेक्टर, दमखेड़ा ए सेक्टर, संजय नगर झुग्गी और आंबेडकर नगर से पानी के सैंपल लिए हैं।
दूषित पानी से स्वास्थ्य संकट
पानी में मौजूद हैवी मेटल्स और डाइक्लोरोइथीन से लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले लोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इसमें त्वचा रोग, पेट संबंधी बीमारियां, लीवर और गुर्दे की समस्याएं शामिल हैं। ई.कोलाई बैक्टीरिया से पेयजल संक्रमण का खतरा भी बढ़ गया है, जिससे दस्त, बुखार और अन्य संक्रामक रोग फैल सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन जल स्रोतों की सफाई और सुरक्षित वितरण पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया, तो भविष्य में कई और स्वास्थ्य आपातकाल पैदा हो सकते हैं। वहीं स्थानीय निवासियों का कहना है कि घर-घर आरओ सिस्टम लगाने और उबला पानी पीने के बावजूद वह पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।
स्थानीय निवासियों की स्थिति
अटल अय्यूब नगर, करोंद, हाउसिंग पार्क कॉलोनी जैसे इलाके अब भी गंभीर स्थिति में हैं। वहां के लोग प्रतिदिन मल-मूत्र और रसायन मिश्रित पानी पीने को मजबूर हैं। बच्चों और बुजुर्गों की संख्या अधिक होने के कारण स्वास्थ्य पर इसका असर गंभीर है। स्थानीय लोग कई बार नगर निगम से शिकायत कर चुके हैं, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हुआ।
