देश में न्यायिक प्रणाली और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय हमेशा ध्यान केंद्रित करते हैं। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों के 2020 के मामले में एक अहम फैसला सुनाया, जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका को खारिज कर दिया गया। यह मामला केवल दिल्ली दंगों तक सीमित नहीं था, बल्कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (UAPA) के दायरे और उसकी व्याख्या के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण साबित हुआ।

नई दिल्ली की सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल थे, ने जमानत खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि प्रत्येक आरोपी की याचिका अलग-अलग दृष्टिकोण से जाँची जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि सातों आरोपी समान नहीं हैं, और उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य आरोपियों की तुलना में गुणात्मक रूप से भिन्न है। इसके विपरीत गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफाउर रहमान, शादाब अहमद और मोहम्मद सलीम खान को जमानत दे दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों के आधार पर खालिद और इमाम के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इन दोनों के संबंध में ‘केंद्रीय और निर्णायक भूमिका’ और ‘घटनास्थलीय और स्थानीय कृत्यों से परे योजना, लामबंदी और रणनीतिक दिशा’ के स्तर पर संलिप्तता दिखाई देती है। न्यायालय ने यह निर्देश दिया कि ये आरोपी संरक्षित गवाहों की जांच के बाद या एक वर्ष बाद अपनी जमानत याचिकाएं फिर से दाखिल कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि UAPA की धारा 43डी(5) के तहत हिरासत की अवधि के बावजूद किसी आरोपी को स्वतः वैधानिक सुरक्षा प्रदान नहीं होती। न्यायालय ने यह साफ किया कि मुकदमे की सुनवाई में देरी को ‘ट्रंप कार्ड’ के रूप में इस्तेमाल करना कानूनी सुरक्षा को स्वतः निरस्त नहीं करता। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया कि UAPA का दायरा व्यापक है और इसमें केवल व्यक्तिगत सुरक्षा के तर्कों से जमानत की स्वीकृति नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जमानत के चरण में बचाव पक्ष के तर्कों की पूर्ण जांच नहीं की जा सकती और न्यायिक जांच आरोपी-विशिष्ट होती है। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अनिल कुमार सिंह ने इस मामले में बचाव पक्ष की दलीलों को प्रस्तुत किया, लेकिन कोर्ट ने UAPA की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि मृत्य या विनाश के इरादे, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को खतरे में डालने वाले कार्य भी हिंसा की श्रेणी में आते हैं। इससे यह स्पष्ट हुआ कि कानून का दायरा अब केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि आर्थिक और सामाजिक विनाश के प्रयासों को भी कानूनी दृष्टि से गंभीर अपराध माना गया।
यह फैसला भारतीय न्यायिक प्रणाली में UAPA के दायरे के दृष्टिकोण से मील का पत्थर साबित हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि केवल आरोप लगाने से मामले की जाँच नहीं रुकती, और न्यायालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी आरोपी को प्राथमिकता में लाने के बजाय पूरे कानूनी प्रक्रिया का पालन हो।
दिल्ली दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून की रक्षा के लिए कठोर कदम आवश्यक हैं। अदालत ने कहा कि आर्थिक और सामाजिक प्रणाली को प्रभावित करने वाले कार्य भी हिंसा के दायरे में आते हैं, और ऐसे मामलों में कानून का दायरा व्यापक रूप से लागू किया जाएगा।
इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हुआ कि भारत में कानून की व्याख्या समय और परिस्थिति के अनुसार विकसित होती रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी व्याख्या में यह बताया कि UAPA के तहत आरोपों के गंभीरता और आरोपी की भूमिका को देखकर जमानत का निर्णय किया जाएगा। इसके अलावा, अदालत ने यह संकेत दिया कि भविष्य में भी ऐसे मामलों में UAPA का व्यापक दायरा लागू किया जा सकता है।
इस मामले ने भारतीय न्यायिक प्रणाली और UAPA की भूमिका पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय कानून और व्यवस्था के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है और यह संकेत देता है कि गंभीर गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल लोगों को कानून की नजर में गंभीरता से देखा जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल दिल्ली दंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में UAPA के दायरे और उसकी व्याख्या के लिए एक नए मुकाम को स्थापित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी के खिलाफ प्रथम दृष्टया प्रमाण मिलने पर जमानत की स्वीकृति स्वतः नहीं दी जा सकती।
