साल 2025 खत्म हो चुका है और 2026 ने दस्तक दे दी है, लेकिन देश का रियल एस्टेट सेक्टर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां चमचमाती इमारतों के पीछे गहरी चिंता छिपी हुई है। ऊंची-ऊंची इमारतें, आधुनिक सुविधाओं से लैस फ्लैट्स और आकर्षक विज्ञापनों के बावजूद लाखों घर ऐसे हैं, जिनमें आज भी ताले लटके हुए हैं। यह स्थिति केवल बिल्डर्स के लिए नहीं, बल्कि पूरे हाउसिंग मार्केट और मिडिल क्लास के लिए कई सवाल खड़े कर रही है।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश के टॉप सात महानगरों में बिना बिके फ्लैट्स की संख्या बढ़कर लगभग 5.77 लाख यूनिट तक पहुंच गई है। यह संख्या केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि उस असंतुलन का संकेत है, जो मांग और आपूर्ति के बीच लगातार बढ़ता जा रहा है।
बीता साल रियल एस्टेट सेक्टर के लिए मिला-जुला रहा। साल की शुरुआत में बाजार में तेजी दिखी, लेकिन जैसे-जैसे साल आगे बढ़ा, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, आईटी सेक्टर में छंटनी की खबरें और ऊंची ब्याज दरों ने खरीदारों की हिम्मत तोड़ दी। नतीजा यह हुआ कि घर तो बनते रहे, लेकिन उन्हें खरीदने वाले लोग पीछे हटते चले गए।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह इन्वेंट्री केवल निर्माणाधीन परियोजनाओं की नहीं है, बल्कि बड़ी संख्या में ऐसे फ्लैट्स भी शामिल हैं जो पूरी तरह बनकर तैयार हैं। इन घरों में बिजली-पानी की व्यवस्था है, कब्जा लेने की तारीख निकल चुकी है, लेकिन खरीदार अब भी नहीं मिल रहे।
घर खरीदने का सपना हर मिडिल क्लास परिवार के लिए जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रॉपर्टी की कीमतें जिस रफ्तार से बढ़ीं, उसने इस सपने को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया। साल 2025 में घरों की औसत कीमतें कई शहरों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं, जबकि आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी।
इसी दौरान आईटी सेक्टर में छंटनी की खबरों ने नौकरीपेशा वर्ग को सतर्क कर दिया। जिन शहरों में आईटी सेक्टर सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है, वहां घरों की बिक्री पर सीधा असर पड़ा। बेंगलुरु इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया, जहां बिना बिके फ्लैट्स की संख्या में 23 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
बेंगलुरु लंबे समय से देश का टेक हब माना जाता रहा है। यहां रियल एस्टेट डेवलपर्स ने बड़े पैमाने पर नए प्रोजेक्ट लॉन्च किए, यह मानकर कि आईटी प्रोफेशनल्स की मांग कभी कम नहीं होगी। लेकिन वैश्विक मंदी, टेक कंपनियों में लागत कटौती और जॉब सिक्योरिटी को लेकर बढ़ती चिंता ने इस धारणा को झटका दिया।
इसके उलट, हैदराबाद और मुंबई महानगर क्षेत्र ऐसे शहर रहे, जहां स्थिति अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई दी। इन दोनों शहरों में सीमित सप्लाई के कारण अनसोल्ड इन्वेंट्री में मामूली गिरावट दर्ज की गई। यह संकेत देता है कि जहां सप्लाई नियंत्रित रही, वहां बाजार में स्थिरता बनी रही।
दिल्ली एनसीआर, पुणे, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में भी तस्वीर एक जैसी नहीं रही। कहीं बिक्री में गिरावट आई तो कहीं मामूली सुधार देखने को मिला। चेन्नई एक ऐसा शहर रहा, जहां साल 2025 में घरों की बिक्री में बढ़ोतरी दर्ज की गई, लेकिन यह बढ़ोतरी भी कुल बाजार की सुस्ती को संतुलित नहीं कर पाई।
कुल मिलाकर, टॉप सात शहरों में साल 2025 में घरों की बिक्री में करीब 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। यह गिरावट उस समय आई, जब प्रॉपर्टी डेवलपर्स ने बड़े पैमाने पर नए प्रोजेक्ट लॉन्च किए थे। नतीजा यह हुआ कि सप्लाई बढ़ती चली गई और मांग पीछे छूट गई।
हालांकि एक दिलचस्प विरोधाभास भी सामने आया है। जहां एक ओर घरों की संख्या के लिहाज से बिक्री घटी, वहीं दूसरी ओर कुल सेल्स वैल्यू में करीब 6 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसका मुख्य कारण प्रीमियमाइजेशन रहा।
साल 2025 में लॉन्च हुए नए घरों में एक बड़ा हिस्सा ऐसे फ्लैट्स का था, जिनकी कीमत 2.5 करोड़ रुपये से अधिक थी। डेवलपर्स ने हाई-एंड सेगमेंट पर ज्यादा फोकस किया, क्योंकि वहां मार्जिन अधिक होता है। लेकिन इसका सीधा असर यह हुआ कि मिडिल क्लास खरीदार बाजार से बाहर होता चला गया।
आज स्थिति यह है कि सस्ते और मध्यम बजट वाले घरों की मांग बनी हुई है, लेकिन सप्लाई उस अनुपात में नहीं है। वहीं, महंगे घरों की सप्लाई ज्यादा है, लेकिन उनके खरीदार सीमित हैं। यह असंतुलन ही मौजूदा संकट की जड़ है।
बिल्डर्स के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती लेकर आई है। एक ओर उनके पास लाखों फ्लैट्स फंसे हुए हैं, जिनसे कैश फ्लो नहीं आ रहा, और दूसरी ओर कर्ज की लागत बढ़ती जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या साल 2026 में बिल्डर्स कीमतों में कटौती करने पर मजबूर होंगे।
विशेषज्ञों की मानें तो सीधी और बड़ी कीमत कटौती की संभावना कम है। भारत का रियल एस्टेट बाजार ऐतिहासिक रूप से कीमतों में तेज गिरावट से बचता रहा है। इसके बजाय, कीमतों को स्थिर रखने, डिस्काउंट ऑफर देने और फ्लेक्सिबल पेमेंट प्लान जैसी रणनीतियां अपनाई जा सकती हैं।
साल 2026 की दिशा काफी हद तक रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर निर्भर करेगी। यदि ब्याज दरों में कटौती होती है, तो होम लोन सस्ते हो सकते हैं और बाजार में नई जान आ सकती है। लेकिन यदि ब्याज दरें ऊंची बनी रहीं, तो खरीदारों की हिचक बनी रह सकती है।
मिडिल क्लास खरीदार के लिए यह समय सोच-विचार का है। एक ओर कीमतें ऊंची हैं, दूसरी ओर विकल्पों की कमी नहीं है। बिना बिके फ्लैट्स की बड़ी संख्या यह संकेत देती है कि खरीदार के पास अब पहले से ज्यादा मोलभाव करने की ताकत हो सकती है।
यह पूरा परिदृश्य बताता है कि रियल एस्टेट सेक्टर अब एक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। आने वाले समय में वही डेवलपर्स टिक पाएंगे, जो खरीदार की जरूरत, उसकी आय और उसकी वास्तविक क्षमता को समझकर प्रोजेक्ट्स तैयार करेंगे।
साल 2026 यह तय करेगा कि यह संकट अस्थायी था या फिर यह भारतीय हाउसिंग मार्केट में एक नए संतुलन की शुरुआत है। फिलहाल, 5.77 लाख खाली फ्लैट्स इस बात की गवाही दे रहे हैं कि केवल घर बनाना ही काफी नहीं, उन्हें खरीदने लायक बनाना भी उतना ही जरूरी है।
