देश में निजी क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों कर्मचारियों के लिए कर्मचारी भविष्य निधि यानी ईपीएफ केवल एक बचत योजना नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का आधार मानी जाती है। नौकरी के बाद जीवन, आपात परिस्थितियों और सेवानिवृत्ति के समय इसी निधि पर भरोसा किया जाता है। लेकिन लंबे समय से यह सवाल उठता रहा है कि क्या यह सुरक्षा वास्तव में सभी कर्मचारियों तक पहुंच पा रही है। अब इसी मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह ईपीएफ योजना की वेतन सीमा पर चार महीने के भीतर कोई ठोस निर्णय ले।

यह निर्देश ऐसे समय आया है जब महंगाई, न्यूनतम वेतन और जीवन यापन की लागत में लगातार बढ़ोतरी हो रही है, जबकि ईपीएफ की वेतन सीमा पिछले 11 वर्षों से जस की तस बनी हुई है। इस स्थिरता ने करोड़ों कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर कर दिया है।
ईपीएफ योजना और वेतन सीमा का महत्व
ईपीएफ योजना का मूल उद्देश्य कर्मचारियों को संगठित बचत की सुविधा देना और भविष्य के लिए आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके तहत कर्मचारी और नियोक्ता दोनों वेतन का एक निश्चित हिस्सा भविष्य निधि खाते में जमा करते हैं। लेकिन यह व्यवस्था तभी प्रभावी होती है, जब अधिकतम संख्या में कर्मचारी इसके अंतर्गत आते हों।
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ उन कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से योजना में शामिल करता है, जिनका मासिक वेतन 15,000 रुपये या उससे कम है। इससे अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों को इस दायरे से बाहर रखा जाता है या वे स्वैच्छिक रूप से ही शामिल हो सकते हैं। समस्या यह है कि देश के कई हिस्सों में न्यूनतम वेतन ही इस सीमा से ऊपर पहुंच चुका है, फिर भी वेतन सीमा में कोई संशोधन नहीं किया गया।
11 साल से नहीं बदली वेतन सीमा
ईपीएफ योजना की मौजूदा वेतन सीमा को आखिरी बार लगभग 11 साल पहले संशोधित किया गया था। उस समय देश की आर्थिक परिस्थितियां, महंगाई दर और वेतन संरचना आज से बिल्कुल अलग थीं। बीते एक दशक में निजी क्षेत्र में वेतन स्तर में बड़ा बदलाव आया है। इसके बावजूद वेतन सीमा स्थिर बनी रही, जिससे योजना का दायरा धीरे-धीरे सिमटता चला गया।
याचिका में यह तर्क प्रमुखता से उठाया गया कि इस असंगत नीति के कारण पहले की तुलना में आज बहुत कम कर्मचारी ईपीएफ योजना का लाभ ले पा रहे हैं। जो योजना कभी व्यापक सामाजिक सुरक्षा का प्रतीक थी, वह अब सीमित वर्ग तक सिमटती जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट में कैसे पहुंचा मामला
यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता नवीन प्रकाश नौटियाल द्वारा दायर एक याचिका के जरिए सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। याचिका में कहा गया कि ईपीएफ वेतन सीमा का लंबे समय तक पुनरीक्षण न होना न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि यह सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
याचिकाकर्ता के वकीलों प्रणव सचदेवा और नेहा राठी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि देश के कई राज्यों में न्यूनतम वेतन ही 15,000 रुपये से अधिक है। ऐसे में लाखों कर्मचारी तकनीकी रूप से ईपीएफ योजना से बाहर हो जाते हैं, जबकि उन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत होती है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और निर्देश
न्यायमूर्ति जे. के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए. एस. चंदुरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह विषय नीति से जुड़ा है, लेकिन इसका असर करोड़ों कर्मचारियों के जीवन पर पड़ता है। अदालत ने याचिका का निपटान करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इस मुद्दे पर चार महीने के भीतर कोई निर्णय ले।
साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता को भी निर्देश दिया कि वह दो सप्ताह के भीतर आदेश की प्रति के साथ केंद्र सरकार के समक्ष अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करे, ताकि सरकार को मामले की गंभीरता का औपचारिक संज्ञान मिल सके।
‘असंगत नीति’ पर अदालत की चिंता
याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि पिछले 70 वर्षों में ईपीएफ योजना की वेतन सीमा का पुनरीक्षण बेहद मनमाने ढंग से किया गया है। कभी यह संशोधन कुछ वर्षों में हुआ, तो कभी 13-14 साल का लंबा अंतराल रहा। इस दौरान महंगाई, प्रति व्यक्ति आय और न्यूनतम वेतन जैसे अहम आर्थिक संकेतकों को नजरअंदाज किया गया।
अदालत ने इस तर्क को गंभीरता से लिया कि ऐसी असंगत नीति के कारण योजना का समावेशी स्वरूप कमजोर होता गया है। शुरुआती दशकों में ईपीएफ योजना अधिक कर्मचारियों को जोड़ने का माध्यम थी, लेकिन पिछले तीन दशकों में यह धीरे-धीरे बाहर करने का जरिया बनती चली गई।
2022 की सिफारिशें और सरकार की चुप्पी
याचिका में एक अहम तथ्य यह भी सामने आया कि वर्ष 2022 में ईपीएफओ की एक उप-समिति ने वेतन सीमा बढ़ाने और अधिक कर्मचारियों को योजना में शामिल करने की सिफारिश की थी। इस सिफारिश को केंद्रीय बोर्ड ने भी मंजूरी दे दी थी।
इसके बावजूद केंद्र सरकार ने अब तक इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया। यही देरी इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक ले आई। अदालत ने अप्रत्यक्ष रूप से इस विलंब पर भी सवाल उठाए और सरकार से समयबद्ध निर्णय लेने को कहा।
निजी क्षेत्र के कर्मचारियों पर असर
निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ईपीएफ केवल एक बचत साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा की रीढ़ है। जिन कर्मचारियों की आय 15,000 रुपये से थोड़ी अधिक है, वे न तो ईपीएफ के अनिवार्य दायरे में आते हैं और न ही कई अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के पात्र होते हैं।
इस स्थिति में वे एक तरह से दो व्यवस्थाओं के बीच फंसे रहते हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश ऐसे ही कर्मचारियों के लिए उम्मीद की एक नई किरण माना जा रहा है।
आर्थिक बदलाव और नीति की जरूरत
पिछले एक दशक में देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार संरचना और वेतन स्तर में व्यापक बदलाव आए हैं। निजी क्षेत्र में कॉन्ट्रैक्ट और सेवा आधारित नौकरियों की संख्या बढ़ी है। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का दायरा बढ़ाना समय की मांग बन गया है।
ईपीएफ वेतन सीमा का पुनरीक्षण इसी दिशा में एक अहम कदम हो सकता है, जिससे योजना फिर से अपने मूल उद्देश्य की ओर लौट सके।
सरकार के सामने चुनौती और अवसर
अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। चार महीने की समयसीमा ने इस मुद्दे को प्राथमिकता सूची में ला दिया है। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह राजकोषीय प्रभाव और सामाजिक सुरक्षा के संतुलन को साधते हुए निर्णय ले।
वहीं यह एक अवसर भी है कि सरकार करोड़ों कर्मचारियों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए और ईपीएफ योजना को अधिक समावेशी बनाए।
क्या बदलेगा कर्मचारियों का भविष्य
यदि वेतन सीमा में वृद्धि होती है, तो इससे लाखों नए कर्मचारी ईपीएफ योजना के दायरे में आएंगे। इससे उनकी दीर्घकालिक बचत बढ़ेगी और सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक असुरक्षा का खतरा कम होगा।
साथ ही यह कदम सामाजिक सुरक्षा के व्यापक ढांचे को मजबूत करेगा, जो किसी भी विकसित अर्थव्यवस्था की पहचान होती है।
निष्कर्ष: न्यायालय की सख्ती, उम्मीद की नई राह
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकार से जुड़ा संदेश है। यह याद दिलाता है कि नीतियां स्थिर नहीं रह सकतीं, उन्हें समय और परिस्थितियों के अनुसार बदलना जरूरी है।
आने वाले चार महीने तय करेंगे कि सरकार इस अवसर को कैसे लेती है। यदि सही निर्णय लिया गया, तो यह करोड़ों कर्मचारियों के भविष्य में स्थायी बदलाव ला सकता है।
