साल 2025 भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में एक ऐसे वर्ष के रूप में दर्ज हो गया, जब विदेशी निवेशकों के रुख ने बाजार की दिशा और दशा दोनों को गहराई से प्रभावित किया। यह साल घरेलू निवेशकों के लिए जहां कई मायनों में अवसरों से भरा रहा, वहीं विदेशी संस्थागत निवेशकों के लिए अनिश्चितताओं, आशंकाओं और रणनीतिक बदलावों का विदेशी रहा।

नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि 2025 में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय बाजार से शुद्ध रूप से करीब 1.66 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए। यह आंकड़ा न सिर्फ अपने आप में बड़ा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा किस हद तक डगमगाया।
ऊंचा वैल्यूएशन और कमजोर कमाई बना बड़ी वजह
भारतीय शेयर बाजार लंबे समय से ऊंचे वैल्यूएशन पर ट्रेड कर रहा था। कई सेक्टरों में शेयरों की कीमतें कंपनियों की वास्तविक कमाई से काफी आगे निकल चुकी थीं। विदेशी निवेशक, जो आमतौर पर जोखिम और रिटर्न के संतुलन को लेकर ज्यादा सतर्क रहते हैं, इस स्थिति को लेकर असहज महसूस करने लगे।
इसके साथ ही कॉरपोरेट अर्निंग्स में अपेक्षित तेजी नहीं आ सकी। जिन कंपनियों से मजबूत ग्रोथ की उम्मीद थी, उनके नतीजे औसत या उम्मीद से कमजोर रहे। इससे विदेशी निवेशकों को यह संकेत मिला कि बाजार में आगे की तेजी सीमित हो सकती है।
भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता का असर
2025 में वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव भी कम नहीं रहे। अलग-अलग देशों के बीच व्यापारिक टकराव, टैरिफ वॉर और वैश्विक मंदी की आशंकाओं ने उभरते बाजारों के प्रति निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया।
भारतीय निर्यात पर लगाए गए भारी टैरिफ और पश्चिमी देशों में आर्थिक सुस्ती ने विदेशी निवेशकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि आने वाले समय में भारतीय कंपनियों की आय पर दबाव बढ़ सकता है। इसी कारण उन्होंने ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति छोड़कर मुनाफा सुरक्षित करने को प्राथमिकता दी।
आईटी सेक्टर पर सबसे बड़ा प्रहार
साल 2025 में विदेशी निवेशकों की सबसे बड़ी मार सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी सेक्टर पर पड़ी। कुल आउटफ्लो का 45 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इसी सेक्टर से बाहर निकला। विदेशी निवेशकों ने आईटी शेयरों से करीब 74,700 करोड़ रुपये की भारी बिकवाली की।
आईटी सेक्टर लंबे समय तक विदेशी निवेशकों का पसंदीदा रहा है, लेकिन 2025 में तस्वीर बदलती नजर आई। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का तेजी से बढ़ता प्रभाव माना जा रहा है।
एआई से बदला आईटी कंपनियों का भविष्य
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने वैश्विक तकनीकी उद्योग में क्रांति ला दी है। हालांकि यह तकनीक कई नए अवसर भी पैदा कर रही है, लेकिन निवेशकों को यह डर सताने लगा है कि भारतीय आईटी कंपनियों के पारंपरिक सर्विस-आधारित बिजनेस मॉडल पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
पश्चिमी देशों में तकनीकी खर्च में आई सुस्ती को भी एआई अपनाने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा गया। कंपनियां बड़े आईटी प्रोजेक्ट्स पर खर्च करने के बजाय ऑटोमेशन और एआई समाधानों की ओर बढ़ रही हैं। इससे भारतीय आईटी कंपनियों की आय वृद्धि पर दबाव की आशंका गहराई।
एफएमसीजी सेक्टर से भी घटा भरोसा
आईटी के बाद विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दूसरा सबसे बड़ा शिकार एफएमसीजी सेक्टर बना। इस सेक्टर से करीब 36,800 करोड़ रुपये निकाले गए, जो कुल बिकवाली का लगभग 22 प्रतिशत रहा।
महंगाई ने आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति को प्रभावित किया। ग्रामीण इलाकों में मांग कमजोर रही और शहरी बाजारों में भी खर्च को लेकर सतर्कता दिखाई दी। इसके अलावा क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और स्थानीय ब्रांड्स की बढ़ती मौजूदगी ने बड़ी एफएमसीजी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बनाया।
पावर और हेल्थकेयर सेक्टर में भी बिकवाली
पावर सेक्टर में विदेशी निवेशकों का भरोसा नियामकीय जोखिमों और ऊंचे कर्ज के कारण कमजोर हुआ। इस सेक्टर से करीब 26,500 करोड़ रुपये की निकासी हुई।
हेल्थकेयर सेक्टर, जिसे आमतौर पर रक्षात्मक माना जाता है, वहां भी करीब 25,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली देखने को मिली। वैल्यूएशन में सुधार और मुनाफावसूली को इसका प्रमुख कारण माना गया।
कंज्यूमर और फाइनेंशियल सेक्टर का हाल
कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर से 21,370 करोड़ रुपये और कंज्यूमर सर्विसेज से 16,500 करोड़ रुपये की निकासी हुई। ब्याज दरों का दबाव और सुस्त खपत ने इन सेक्टरों की चमक फीकी कर दी।
बैंकिंग और एनबीएफसी जैसे फाइनेंशियल सेक्टर से भी करीब 14,900 करोड़ रुपये निकाले गए। ऊंचे वैल्यूएशन और मार्जिन पर दबाव विदेशी निवेशकों के लिए चिंता का विषय बने।
बाजार की गिरावट के बावजूद एसेट वैल्यू में बढ़ोतरी
दिलचस्प बात यह रही कि इतनी भारी बिकवाली के बावजूद विदेशी निवेशकों की एसेट अंडर कस्टडी में गिरावट नहीं आई। दिसंबर 2025 तक यह आंकड़ा 4.3 प्रतिशत बढ़कर 74.27 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।
इसका कारण बाजार की समग्र तेजी और कई शेयरों की कीमतों में आई वृद्धि रही। यानी भले ही विदेशी निवेशकों ने शेयर बेचे, लेकिन बचे हुए निवेश का मूल्य बढ़ता रहा।
सेक्टर-स्पेसिफिक रणनीति की ओर झुकाव
2025 में एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि विदेशी निवेशकों ने व्यापक बाजार में निवेश करने के बजाय सेक्टर-स्पेसिफिक रणनीति अपनाई। वे केवल उन्हीं क्षेत्रों में पैसा लगाने लगे, जहां आय की स्पष्ट दृश्यता और भविष्य की स्थिरता नजर आई।
टेलीकॉम सेक्टर बना विदेशी निवेशकों का पसंदीदा
बिकवाली के इस दौर में टेलीकॉम सेक्टर एक उजले अपवाद के रूप में सामने आया। यह एकमात्र बड़ा सेक्टर रहा, जहां विदेशी निवेशकों ने जमकर निवेश किया।
साल 2025 में एफआईआई ने टेलीकॉम शेयरों में 48,222 करोड़ रुपये से अधिक का शुद्ध निवेश किया। मजबूत कैश फ्लो, टैरिफ दरों में सुधार और भविष्य में स्थायी लाभप्रदता की उम्मीदों ने इस सेक्टर को आकर्षक बनाया।
डेटा खपत में निरंतर बढ़ोतरी और 5G रोलआउट के बाद औसत राजस्व में सुधार ने निवेशकों का भरोसा और मजबूत किया।
आगे की राह क्या संकेत देती है
2025 की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि विदेशी निवेशक अब केवल ग्रोथ स्टोरी के भरोसे निवेश नहीं करेंगे। वे स्पष्ट कमाई, मजबूत बैलेंस शीट और स्थायी बिजनेस मॉडल पर ज्यादा ध्यान देंगे।
भारतीय बाजार के लिए यह समय आत्ममंथन का है। मजबूत घरेलू मांग और संरचनात्मक सुधार लंबे समय में विदेशी निवेशकों का भरोसा फिर से जीत सकते हैं, लेकिन इसके लिए स्थिर नीतियां और पारदर्शिता जरूरी होगी।
