मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। यह चर्चा किसी नई योजना या शैक्षणिक सुधार की नहीं, बल्कि उन हजारों युवाओं की पीड़ा की है, जो वर्षों से शिक्षक बनने का सपना देख रहे हैं। राजधानी भोपाल में मंगलवार को ऐसा ही दृश्य देखने को मिला, जब प्रदेशभर से आए करीब दो हजार भावी शिक्षकों ने एकजुट होकर अपनी आवाज बुलंद की।

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की लगातार बनी हुई कमी और हालिया शिक्षक चयन परीक्षाओं में बेहद सीमित पद घोषित किए जाने से नाराज इन युवाओं ने लोक शिक्षण संचालनालय यानी डीपीआई का घेराव करने का फैसला किया। सुबह से ही राजधानी के प्रमुख इलाकों में भावी शिक्षकों की भीड़ जुटने लगी और देखते ही देखते यह प्रदर्शन एक बड़े आंदोलन का रूप लेता नजर आया।
शिक्षक बनने का सपना और हकीकत का टकराव
प्रदर्शन कर रहे अधिकांश युवा ऐसे हैं, जिन्होंने बीएड, डीएलएड, एमएड जैसी शिक्षक प्रशिक्षण की डिग्रियां हासिल की हैं। कई अभ्यर्थी ऐसे भी हैं, जो पिछले पांच से दस वर्षों से शिक्षक भर्ती परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। उनके लिए शिक्षक बनना सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान, स्थिरता और समाज सेवा का माध्यम है।
लेकिन जब वर्षों की मेहनत के बाद भी उन्हें यह महसूस होता है कि सरकार की ओर से घोषित पद उनकी संख्या और जरूरतों की तुलना में बेहद कम हैं, तो असंतोष स्वाभाविक है। यही असंतोष भोपाल की सड़कों पर दिखाई दिया।
राजधानी भोपाल में जुटे प्रदेशभर के युवा
मंगलवार सुबह से ही अलग-अलग जिलों से बसों, ट्रेनों और निजी साधनों से भावी शिक्षक भोपाल पहुंचने लगे थे। किसी के हाथ में प्रमाण पत्र थे, तो किसी के पास अपनी मांगों से जुड़े ज्ञापन। सभी की जुबान पर एक ही सवाल था कि जब सरकारी स्कूलों में हजारों पद खाली हैं, तो फिर भर्ती में इतने कम पद क्यों घोषित किए जा रहे हैं।
लोक शिक्षण संचालनालय के आसपास का इलाका कुछ ही समय में नारों से गूंज उठा। युवाओं का कहना था कि यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक एजेंडे के तहत नहीं, बल्कि अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था को बचाने की लड़ाई है।
सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी एक गंभीर समस्या
मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी कोई नई बात नहीं है। कई ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के स्कूल ऐसे हैं, जहां एक या दो शिक्षक ही पूरी कक्षाओं का भार संभाल रहे हैं। कहीं गणित के शिक्षक नहीं हैं, तो कहीं विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषयों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।
भावी शिक्षकों का तर्क है कि जब जमीनी हकीकत यह है कि स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं, तब भर्ती प्रक्रिया में पदों की संख्या कम रखना समझ से परे है। इससे न सिर्फ शिक्षित युवाओं का भविष्य अंधकारमय होता है, बल्कि बच्चों की शिक्षा भी प्रभावित होती है।
चयन परीक्षा में कम पदों से बढ़ी नाराजगी
हाल ही में घोषित शिक्षक चयन परीक्षाओं में पदों की संख्या को लेकर अभ्यर्थियों में खासा रोष है। उनका कहना है कि परीक्षाओं की तैयारी में सालों खर्च करने के बाद जब केवल कुछ हजार पदों की घोषणा होती है, तो लाखों अभ्यर्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा असंतुलित हो जाती है।
कई भावी शिक्षकों ने बताया कि उन्होंने उम्र की सीमा पार करने के डर के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी, लेकिन अब हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि भविष्य अधर में लटकता नजर आ रहा है।
डीपीआई का घेराव और प्रशासन की चुनौती
लोक शिक्षण संचालनालय का घेराव प्रशासन के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गया। भारी संख्या में प्रदर्शनकारियों के पहुंचने से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी करनी पड़ी। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर मौजूद रहे, ताकि स्थिति शांतिपूर्ण बनी रहे।
भावी शिक्षकों का कहना था कि वे किसी प्रकार की अव्यवस्था नहीं चाहते, बल्कि केवल अपनी मांगों को जिम्मेदार अधिकारियों तक पहुंचाना चाहते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य था कि सरकार उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुने और ठोस निर्णय ले।
क्या हैं भावी शिक्षकों की प्रमुख अपेक्षाएं
प्रदर्शन कर रहे युवाओं की अपेक्षाएं स्पष्ट हैं। वे चाहते हैं कि शिक्षक भर्ती में पदों की संख्या को वास्तविक जरूरतों के अनुसार बढ़ाया जाए। इसके साथ ही भर्ती प्रक्रिया को नियमित और पारदर्शी बनाया जाए, ताकि हर साल अभ्यर्थियों को अवसर मिल सके।
उनका यह भी कहना है कि बार-बार भर्ती प्रक्रिया में देरी होने से अभ्यर्थियों का मनोबल टूटता है और वे वैकल्पिक रोजगार की तलाश में मजबूर हो जाते हैं।
शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता व्यापक असर
शिक्षक भर्ती से जुड़ा यह असंतोष केवल रोजगार का मुद्दा नहीं है। इसका सीधा असर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता है। जब स्कूलों में योग्य शिक्षक नहीं होते, तो बच्चों की शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित होती है।
भावी शिक्षकों का मानना है कि सरकार यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं करती, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।
आंदोलन की शांति और अनुशासन
हालांकि प्रदर्शन बड़ा था, लेकिन अधिकतर समय यह शांतिपूर्ण रहा। भावी शिक्षकों ने अनुशासन बनाए रखने की कोशिश की और अपनी बात तर्कसंगत ढंग से रखी। कई युवाओं ने कहा कि वे शिक्षा से जुड़े लोग हैं और किसी भी तरह की अराजकता उनके उद्देश्य के खिलाफ है।
सरकार से संवाद की उम्मीद
प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों की सबसे बड़ी उम्मीद सरकार से संवाद की है। वे चाहते हैं कि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाए और उन्हें केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई दिखाई दे।
उनका कहना है कि यदि पद बढ़ाए जाते हैं, तो न सिर्फ बेरोजगारी कम होगी, बल्कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता भी सुधरेगी।
भविष्य की दिशा तय करता आंदोलन
भोपाल में हुआ यह प्रदर्शन केवल एक दिन की घटना नहीं, बल्कि उस लंबे संघर्ष का प्रतीक है, जो भावी शिक्षक वर्षों से झेल रहे हैं। यह आंदोलन सरकार के लिए भी एक संकेत है कि शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
अब देखना यह है कि सरकार इस आवाज को कितनी गंभीरता से लेती है और आने वाले समय में शिक्षक भर्ती को लेकर क्या निर्णय सामने आते हैं।
