जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक बहस के केंद्र में आ गया है। राजधानी दिल्ली स्थित इस प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान में मंगलवार को छात्र राजनीति का ताप उस वक्त तेज हो गया, जब छात्र संघ और वामपंथी विचारधारा से जुड़े संगठनों ने उमर खालिद और शरजील इमाम के समर्थन में जोरदार प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन हाल ही में उनकी जमानत याचिकाओं को खारिज किए जाने के फैसले के विरोध में किया गया, जिसने कैंपस में पहले से मौजूद वैचारिक तनाव को और गहरा कर दिया।

यह विरोध प्रदर्शन सिर्फ किसी एक फैसले के खिलाफ प्रतिक्रिया भर नहीं था, बल्कि इसके साथ कई पुराने मुद्दे, सवाल और नाराजगियां भी सामने आईं। साबरमती हॉस्टल के बाहर देर रात तक चले इस प्रदर्शन में छात्रों की भीड़ जुटी रही। नारों की गूंज से पूरा इलाका राजनीतिक विमर्श का अखाड़ा बन गया। “न्याय दो” और “रिहाई दो” जैसे नारे लगातार सुनाई देते रहे, जिनके जरिए छात्र अपनी असहमति और मांगों को मुखर कर रहे थे।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि वे कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, न कि किसी हिंसा या अव्यवस्था को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। उनका तर्क था कि लंबे समय से जेल में बंद लोगों के मामलों में सुनवाई और राहत की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। छात्रों ने इस मुद्दे को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति के अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़कर देखा।
इस प्रदर्शन का समय भी संयोग नहीं था। ठीक इसी दौरान 2020 में हुए जेएनयू परिसर की हिंसा की बरसी भी थी। उस घटना को याद करते हुए छात्रों ने एक बार फिर यह सवाल उठाया कि इतने साल बीत जाने के बाद भी हमलावरों की पहचान और जवाबदेही तय क्यों नहीं हो पाई। प्रदर्शन के दौरान कई छात्रों ने कहा कि उस हिंसा ने विश्वविद्यालय के माहौल को गहरे स्तर पर प्रभावित किया था और आज भी उसके जवाब अधूरे हैं।
छात्रों का आरोप था कि उस समय हुई हिंसा के मामलों में निष्पक्ष जांच नहीं हुई और आज भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने मौजूदा प्रदर्शन को सिर्फ एक व्यक्ति या केस से जोड़ने के बजाय, व्यापक न्याय और जवाबदेही की मांग के रूप में पेश किया।
प्रदर्शन के दौरान राजनीतिक नारों का स्वर भी तीखा होता गया। केंद्र सरकार और शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को लेकर भी नारे लगाए गए, जिनमें मौजूदा नीतियों और फैसलों की आलोचना की गई। इन नारों ने यह साफ कर दिया कि यह आंदोलन केवल कानूनी फैसले के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें व्यापक राजनीतिक असंतोष भी शामिल है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर जेएनयू की उस छवि को सामने ला दिया, जिसके लिए यह विश्वविद्यालय लंबे समय से जाना जाता रहा है। यहां छात्र केवल अकादमिक मुद्दों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति, सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों पर खुलकर बहस करते हैं। समर्थकों के लिए यह लोकतांत्रिक चेतना का प्रतीक है, जबकि आलोचकों के लिए यह अक्सर विवाद और टकराव का कारण बनता है।
प्रदर्शन के दौरान एक और अहम मुद्दा उठा, जिसने कैंपस में नई बहस छेड़ दी। विश्वविद्यालय परिसर में प्रस्तावित फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम को लेकर छात्रों ने गहरी नाराजगी जाहिर की। उनका कहना था कि इस तरह की तकनीक निजता के अधिकार पर सीधा हमला है और इससे छात्रों की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। छात्रों ने इसे निगरानी संस्कृति को बढ़ावा देने वाला कदम बताया और कहा कि शैक्षणिक संस्थानों में भरोसे का माहौल होना चाहिए, न कि निगरानी का।
छात्रों का तर्क था कि विश्वविद्यालय विचारों के आदान-प्रदान की जगह होते हैं, जहां असहमति को दबाने के बजाय सुना जाना चाहिए। उनके अनुसार, फेशियल रिकॉग्निशन जैसी प्रणालियां डर का माहौल बना सकती हैं और छात्रों को अपनी बात खुलकर रखने से रोक सकती हैं।
प्रदर्शन देर रात तक चलता रहा और परिसर में पुलिस और प्रशासन की नजरें बनी रहीं। हालांकि, किसी बड़ी हिंसक घटना की सूचना नहीं मिली, लेकिन माहौल काफी तनावपूर्ण रहा। छात्रों की भीड़, नारों की गूंज और लगातार चलती बहसों ने यह साफ कर दिया कि मुद्दा गहराई से जुड़ा हुआ है।
इस प्रदर्शन पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। सत्तारूढ़ दल की ओर से इस नारेबाजी और विरोध को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई। उनका कहना था कि कानून अपना काम कर रहा है और न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस तरह के प्रदर्शन देशविरोधी मानसिकता को बढ़ावा देते हैं और विश्वविद्यालयों को राजनीति का अखाड़ा बना देते हैं।
वहीं, प्रदर्शन का समर्थन करने वालों का कहना था कि सवाल उठाना और विरोध दर्ज कराना लोकतंत्र का हिस्सा है। उनका तर्क था कि अगर छात्र अपने ही विश्वविद्यालय में अपनी आवाज नहीं उठा सकते, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का क्या मतलब रह जाएगा।
जेएनयू का इतिहास ऐसे आंदोलनों और बहसों से भरा रहा है। यहां समय-समय पर छात्र फीस, आरक्षण, शिक्षा नीति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय राजनीति जैसे मुद्दों पर मुखर रहे हैं। यही वजह है कि यहां होने वाली हर घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन जाती है।
इस बार का प्रदर्शन भी उसी परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है। फर्क बस इतना है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में ऐसे आंदोलनों को लेकर ध्रुवीकरण कहीं ज्यादा तेज हो गया है। एक पक्ष इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा मानता है, तो दूसरा इसे कानून और व्यवस्था के लिए चुनौती के रूप में देखता है।
छात्रों के बीच भी इस मुद्दे पर एकराय नहीं है। कुछ छात्र प्रदर्शन का समर्थन करते दिखे, जबकि कुछ ने कहा कि विश्वविद्यालय को पढ़ाई और शोध पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। उनका मानना था कि लगातार राजनीतिक तनाव से अकादमिक माहौल प्रभावित होता है।
हालांकि, प्रदर्शनकारियों का कहना था कि शिक्षा और समाज को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने की जगह नहीं हैं, बल्कि यहां से समाज के लिए सोच और दिशा भी निकलती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि विश्वविद्यालयों की भूमिका क्या होनी चाहिए। क्या वे केवल अकादमिक संस्थान रहें या फिर सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र भी बनें। जेएनयू में हुआ यह प्रदर्शन इसी बहस को एक बार फिर सामने ले आया है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन, छात्र संगठन और राजनीतिक दल इस स्थिति को कैसे संभालते हैं। क्या संवाद का रास्ता खुलेगा या टकराव और गहराएगा। फिलहाल इतना तय है कि जेएनयू एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ चुका है और यहां की हर गतिविधि पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं।
