हरियाणा के जींद जिले से सामने आई यह घटना केवल एक परिवार की निजी खुशी की कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज में गहराई तक जमी सोच, भावनाओं और परंपराओं की झलक भी दिखाती है। उचाना क्षेत्र में रहने वाले एक दंपती के जीवन में उस समय भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा, जब महिला ने अपनी 11वीं डिलीवरी में बेटे को जन्म दिया। इससे पहले उनके घर में दस बेटियां थीं। बेटे के जन्म की खबर मिलते ही परिवार की खुशी देखते ही बनती थी। अस्पताल का माहौल उत्सव जैसा हो गया, गुब्बारों से सजावट की गई और मिठाइयां बांटी गईं।

यह घटना जितनी अनोखी है, उतनी ही भावनात्मक भी। करीब 19 साल पहले शादी के बंधन में बंधे इस दंपती का परिवार धीरे-धीरे बड़ा होता गया। साल दर साल घर में बेटियों का जन्म होता रहा। हर बेटी अपने साथ खुशियां और जिम्मेदारियां लेकर आई। परिवार ने सभी बेटियों को अपनाया, पाला और आगे बढ़ाया। सबसे बड़ी बेटी आज 12वीं कक्षा में पढ़ाई कर रही है। इसके बावजूद, बेटे की चाहत कहीं न कहीं परिवार की सोच में बनी रही।
रविवार का दिन इस परिवार के लिए जिंदगी भर याद रहने वाला बन गया। जब महिला को डिलीवरी के लिए अस्पताल ले जाया गया, तो घर से लेकर अस्पताल तक हर किसी के दिल की धड़कनें तेज थीं। महिला की हालत सामान्य नहीं थी। डॉक्टरों के अनुसार, डिलीवरी नॉर्मल तरीके से हुई, लेकिन महिला में खून की मात्रा काफी कम थी। महज पांच ग्राम खून होने के कारण यह डिलीवरी जोखिम भरी मानी जा रही थी। इसके बावजूद डॉक्टरों की निगरानी और प्रयास से डिलीवरी सफल रही और एक स्वस्थ बेटे ने जन्म लिया।
जैसे ही बेटे के जन्म की खबर बाहर आई, पिता की आंखों में आंसू छलक पड़े। उन्होंने बताया कि उस पल उनकी भावनाओं पर काबू रखना मुश्किल हो गया था। इतने वर्षों की प्रतीक्षा, उम्मीद और डर एक साथ सामने आ गए थे। खुशी इतनी ज्यादा थी कि जब किसी ने उनसे उनकी दस बेटियों के नाम पूछे, तो वे कुछ नाम भूल गए। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए हैरानी और मुस्कान दोनों का कारण बना।
अस्पताल में मौजूद लोगों ने देखा कि परिवार ने पूरे वार्ड को गुब्बारों से सजाया। मिठाइयां बांटी गईं और हर कोई इस खुशी का हिस्सा बना। पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने भी फोन कर बधाइयां दीं। पिता ने बताया कि घर की बेटियों ने भी उनसे कहा था कि इस बार उनके लिए एक भाई लेकर आना। यह बात उनके दिल में गहरे उतर गई थी।
महिला ने भी अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि डिलीवरी से पहले उन्हें काफी घबराहट हो रही थी। इतने बच्चों के बाद एक और डिलीवरी का विचार ही उन्हें डरा रहा था। लेकिन परिवार ने उन पर कोई दबाव नहीं डाला। उन्होंने कहा कि जो हुआ, उसे उन्होंने ईश्वर की मर्जी मानकर स्वीकार किया है। बेटे के जन्म से उनकी चाहत पूरी हो गई है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उनकी बेटियां ही उनकी असली ताकत हैं और वे सभी बच्चों की बराबर परवरिश करेंगी।
इस कहानी में भावनाओं के कई रंग हैं। एक तरफ बेटे के जन्म की खुशी है, तो दूसरी तरफ यह सवाल भी खड़ा होता है कि समाज में बेटे की चाहत आज भी कितनी गहराई से मौजूद है। दस बेटियों के बाद 11वीं डिलीवरी तक पहुंचना सिर्फ एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि सामाजिक सोच का आईना भी है। ग्रामीण इलाकों में आज भी कई परिवार बेटियों के जन्म को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते, भले ही समय बदल रहा हो।
हालांकि, इस परिवार के मामले में एक अलग तस्वीर भी नजर आती है। पिता ने बताया कि वे अपनी दसों बेटियों को पाल रहे हैं और उनकी पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। उन्होंने कभी बेटियों को बोझ नहीं माना। इसके बावजूद, बेटे की चाहत बनी रही। यह विरोधाभास भारतीय समाज की जटिलता को दिखाता है, जहां बेटियों को प्यार भी मिलता है और बेटे की कामना भी बनी रहती है।
डिलीवरी कराने वाली महिला डॉक्टर ने बताया कि यह नॉर्मल डिलीवरी थी, लेकिन जोखिम कम नहीं था। महिला की स्थिति को देखते हुए पूरी टीम सतर्क थी। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में महिला के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है, क्योंकि बार-बार गर्भधारण से शरीर पर असर पड़ता है। सौभाग्य से, इस केस में मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं।
पिता ने बताया कि वे भूना क्षेत्र से अस्पताल आए थे। जब पत्नी को लेबर रूम में ले जाया गया, तो उनका दिल तेजी से धड़क रहा था। उन्होंने कहा कि उस वक्त उन्हें सिर्फ पत्नी और बच्चे की सलामती की चिंता थी। बेटे के जन्म की खबर मिलने के बाद वह खुद को संभाल नहीं पाए और रो पड़े।
इस घटना का एक और पहलू सोशल मीडिया से जुड़ा है। अस्पताल में मौजूद एक महिला पत्रकार ने परिवार से बातचीत की और उसका वीडियो साझा किया। वीडियो में पिता की भावुकता और नाम भूलने का दृश्य तेजी से चर्चा में आ गया। लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रहीं। कुछ ने इसे पारिवारिक खुशी का पल बताया, तो कुछ ने बेटे की चाहत पर सवाल उठाए।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस तरह की घटनाएं हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। भारत में बेटियों की स्थिति को लेकर लंबे समय से अभियान चल रहे हैं। शिक्षा, जागरूकता और कानूनों के बावजूद, बेटे की चाहत पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कई बार यह चाहत खुले तौर पर सामने आती है, तो कई बार छिपी रहती है।
इस परिवार की कहानी में यह भी दिखता है कि बेटियां खुद भी भाई की उम्मीद कर रही थीं। यह दर्शाता है कि सामाजिक सोच सिर्फ माता-पिता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बच्चों पर भी उसका असर पड़ता है। परिवार और समाज मिलकर एक ऐसी मानसिकता बनाते हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है।
फिर भी, इस कहानी को केवल नकारात्मक नजरिए से देखना भी सही नहीं होगा। मां और पिता दोनों ने यह स्पष्ट किया कि वे अपनी बेटियों से उतना ही प्यार करते हैं और उनकी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। बेटे के जन्म की खुशी के बीच भी उन्होंने बेटियों को नजरअंदाज नहीं किया।
अस्पताल में मौजूद लोगों ने बताया कि ऐसा दृश्य रोज देखने को नहीं मिलता। एक ही महिला की 11वीं डिलीवरी और वह भी नॉर्मल तरीके से होना अपने आप में दुर्लभ है। मेडिकल दृष्टि से भी यह केस चर्चा का विषय रहा।
यह घटना हमें यह भी याद दिलाती है कि महिलाओं के स्वास्थ्य और अधिकारों पर ध्यान देना कितना जरूरी है। बार-बार गर्भधारण से महिला के शरीर पर गंभीर असर पड़ सकता है। ऐसे मामलों में परिवार और समाज की जिम्मेदारी बनती है कि महिला के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए।
अंत में, यह कहानी खुशी, भावुकता, परंपरा और सवालों का मिश्रण है। बेटे के जन्म से एक परिवार की चाहत पूरी हुई, लेकिन इसके साथ ही यह समाज के सामने कई सवाल भी छोड़ गई। क्या हम बेटियों और बेटों को बराबरी से देखने की सोच को पूरी तरह अपना पाए हैं या अभी भी रास्ता लंबा है। जींद की यह घटना इसी बहस को एक बार फिर सामने ले आई है।
