सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 5 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अजमेर शरीफ दरगाह पर औपचारिक रूप से चादर चढ़ाने से रोकने की मांग वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने याचिका को अतार्किक और तर्कहीन बताते हुए इसे किसी तरह की कानूनी या संवैधानिक चुनौती के योग्य नहीं माना। इस मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने की।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह याचिका केवल प्रतीकात्मक मुद्दों पर आधारित है और इसे खारिज करने से किसी लंबित दीवानी मुकदमे या किसी अन्य कानूनी प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को सलाह दी कि वे अपने दीवानी मुकदमों के जरिए उचित राहत के लिए आगे बढ़ें।
याचिका का मूल आधार
याचिकाकर्ता, हिंदू संगठन के सदस्य जितेंद्र सिंह और विष्णु गुप्ता, ने दावा किया कि अजमेर शरीफ दरगाह पर प्रधानमंत्री द्वारा ‘चादर चढ़ाने की प्रथा’ राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान और प्रतीकात्मक मान्यता प्रदान करने के समान है। उन्होंने इसे चुनौती देते हुए कहा कि इस प्रथा का कोई संवैधानिक या कानूनी आधार नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने इतिहास का हवाला देते हुए यह भी दावा किया कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और उनके अनुयायियों ने विदेशी आक्रमणों में हिस्सा लिया और स्थानीय आबादी पर व्यापक दमन तथा धर्मांतरण किया, जो भारत की संप्रभुता, गरिमा और सभ्यतागत मूल्यों के बिल्कुल विपरीत था।
अधिवक्ता बरुन सिन्हा, जो याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए, ने कोर्ट को बताया कि यह प्रथा 1947 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा शुरू की गई थी और तब से यह जारी है। उन्होंने कहा कि यह प्रथा ऐतिहासिक संदर्भ और कानूनी मान्यता के बिना सिर्फ सरकारी हस्तक्षेप का प्रतीक बन गई है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के तर्कों को तर्कहीन बताते हुए कहा, “चूंकि यह मामला तर्कसंगत नहीं है, इसलिए न्यायालय इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका खारिज होने से लंबित दीवानी मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जिसमें दरगाह के निर्माण स्थल को लेकर विवाद लंबित है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सलाह दी कि वे दीवानी मुकदमे में उचित राहत पाने के लिए कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से आगे बढ़ें। न्यायालय ने इस फैसले में किसी भी धार्मिक संवेदनाओं या सांप्रदायिक दृष्टिकोण को प्रभावित करने वाली टिप्पणी से बचते हुए इसे केवल कानूनी दृष्टिकोण से खारिज किया।
केंद्र सरकार और दरगाह की भूमिका
केंद्र सरकार और अजमेर दरगाह के संस्थान नियमित रूप से ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को औपचारिक सम्मान और प्रतीकात्मक मान्यता देते आए हैं। प्रधानमंत्री द्वारा चादर चढ़ाने की यह प्रथा धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्व रखती है।
दरगाह प्रबंधन के अनुसार यह प्रथा 1947 के बाद से चली आ रही है और इसमें किसी भी तरह का राजनीतिक या संवैधानिक उल्लंघन शामिल नहीं है। इस औपचारिक सम्मान को धार्मिक मान्यता और सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ा गया है, जो देश की विविधता और सांप्रदायिक सहिष्णुता का प्रतीक है।
याचिकाकर्ताओं की चिंता
याचिकाकर्ताओं का मुख्य दावा था कि केंद्र सरकार द्वारा ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जाने वाले राज्य-प्रायोजित सम्मान से हिंदू सभ्यता और ऐतिहासिक सत्य की अनदेखी होती है। उनका मानना था कि यह प्रथा देश की सांस्कृतिक विरासत और भारतीय सभ्यता के मूल्यों के खिलाफ है।
वे यह भी कहते हैं कि ऐतिहासिक अभिलेख बताते हैं कि अजमेर और दिल्ली पर विजय प्राप्त करने वाले आक्रमणों में मोइनुद्दीन चिश्ती और उनके अनुयायियों की भूमिका रही है। इस आधार पर उन्होंने मांग की कि प्रधानमंत्री को चादर चढ़ाने से रोका जाए।
अदालत ने क्यों खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को अतार्किक बताते हुए खारिज किया। न्यायालय ने कहा कि यह मामला केवल प्रतीकात्मक और सांकेतिक मुद्दों पर आधारित है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि याचिका खारिज होने से किसी भी लंबित दीवानी मुकदमे या किसी अन्य कानूनी विवाद पर असर नहीं पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से दीवानी मुकदमे में अपनी शिकायत को उठा सकते हैं, लेकिन वर्तमान याचिका में दी गई दलीलों का कोई संवैधानिक आधार नहीं है।
सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का महत्व
अजमेर शरीफ दरगाह में चादर चढ़ाने की प्रथा सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रधानमंत्री द्वारा चादर चढ़ाना राज्य द्वारा धार्मिक प्रतीकात्मक सम्मान का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत और सामाजिक श्रद्धांजलि है।
धार्मिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रथा कई दशकों से चली आ रही है और इसमें किसी प्रकार की राजनीतिक या संवैधानिक बाध्यता नहीं है। इसके माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान किया जाता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि भारत में धार्मिक प्रथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं के मामलों में कोर्ट केवल कानूनी आधारों को ही देखेगा। प्रधानमंत्री के अजमेर शरीफ चादर चढ़ाने की प्रथा पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि याचिका खारिज होने से किसी भी लंबित दीवानी मुकदमे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह फैसला भारत में धार्मिक सहिष्णुता और कानूनी स्वतंत्रता को बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है।
