देश की कृषि व्यवस्था एक बार फिर बड़े नीतिगत फैसलों के कारण चर्चा में है। रबी 2025–26 सीजन के लिए केंद्र सरकार ने उर्वरक सब्सिडी और बीज विकास के मोर्चे पर ऐसे निर्णय लिए हैं, जो आने वाले महीनों में खेती की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित करने वाले हैं। एक ओर डीएपी खाद पर सब्सिडी में करीब 36 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है, वहीं दूसरी ओर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा 25 प्रमुख फील्ड फसलों की 184 नई और उन्नत किस्में जारी की गई हैं। इन दोनों फैसलों का संयुक्त प्रभाव किसानों की लागत कम करने, उत्पादन बढ़ाने और खेती को जलवायु परिवर्तन के जोखिमों से बचाने में अहम भूमिका निभाने वाला है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि जब उर्वरक और बीज दोनों स्तरों पर सुधार होता है, तब खेती का संपूर्ण इकोसिस्टम मजबूत बनता है। सरकार ने इस बार केवल अल्पकालिक राहत नहीं दी है, बल्कि दीर्घकालीन कृषि आत्मनिर्भरता को भी ध्यान में रखा है। उर्वरक सब्सिडी की नई दरें और बीजों की नई किस्में मिलकर रबी फसलों की बेहतर पैदावार, स्थिर आय और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक ठोस कदम मानी जा रही हैं।
एनबीएस योजना और उर्वरक सब्सिडी का नया ढांचा
पोषक-तत्व आधारित सब्सिडी योजना, जिसे एनबीएस योजना के नाम से जाना जाता है, पिछले कुछ वर्षों से देश की उर्वरक नीति का प्रमुख आधार रही है। इस योजना की खास बात यह है कि इसमें सब्सिडी उर्वरक की बोरी के आधार पर नहीं, बल्कि उसमें मौजूद वास्तविक पोषक तत्वों के वजन के अनुसार तय की जाती है। नाइट्रोजन, फॉस्फेट, पोटाश और सल्फर जैसे तत्वों के लिए प्रति किलोग्राम सब्सिडी निर्धारित होती है, जिससे बाजार में उर्वरकों की कीमतों को संतुलित रखा जा सके।
रबी 2025–26 के लिए सरकार ने इस योजना के तहत नई दरों को मंजूरी दी है, जो 1 अक्टूबर 2025 से 31 मार्च 2026 तक प्रभावी रहेंगी। इस अवधि को ध्यान में रखते हुए नीति इस तरह तैयार की गई है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर किसानों पर न पड़े। सरकार का स्पष्ट उद्देश्य है कि किसान उचित और किफायती दामों पर उर्वरक प्राप्त कर सकें, ताकि खेती की लागत नियंत्रण में रहे।
डीएपी खाद पर 36 प्रतिशत अधिक सब्सिडी
नई नीति की सबसे बड़ी और चर्चित घोषणा डीएपी खाद से जुड़ी है। डीएपी यानी डाय-अमोनियम फॉस्फेट देश के सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों में से एक है, खासकर रबी फसलों के लिए। इस बार डीएपी पर सब्सिडी बढ़ाकर 29,805 रुपये प्रति मीट्रिक टन कर दी गई है, जो पिछले रबी सीजन में 21,911 रुपये प्रति मीट्रिक टन थी। इस तरह डीएपी पर करीब 36 प्रतिशत अधिक सब्सिडी दी जा रही है।
एनबीएस योजना के तहत रबी 2025–26 के लिए नाइट्रोजन पर 43.02 रुपये प्रति किलोग्राम और फॉस्फेट पर 47.96 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी तय की गई है। इन्हीं दरों के कारण डीएपी पर सब्सिडी में यह बड़ा इजाफा देखने को मिला है। इसका सीधा लाभ किसानों को मिलेगा, क्योंकि डीएपी की खुदरा कीमतों को स्थिर रखने में यह सब्सिडी मददगार साबित होगी।
उर्वरक सब्सिडी बजट में वृद्धि का संकेत
रबी 2025–26 सीजन के लिए उर्वरक सब्सिडी की अनुमानित बजटीय आवश्यकता 37,952.29 करोड़ रुपये तय की गई है। यह राशि पिछले खरीफ सीजन की तुलना में करीब 736 करोड़ रुपये अधिक है। आंकड़े बताते हैं कि सरकार कृषि क्षेत्र में निवेश बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत है।
यदि पिछले तीन वर्षों की बात करें, तो 2022–23 से 2024–25 के दौरान केंद्र सरकार ने उर्वरक सब्सिडी पर कुल मिलाकर 2.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन किया है। यह बढ़ा हुआ खर्च इस बात का संकेत है कि खेती को आर्थिक रूप से मजबूत करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए सरकार दीर्घकालीन रणनीति पर काम कर रही है।
रबी सीजन के लिए प्रमुख उर्वरकों पर नई दरें
देश की जलवायु विविधता और विभिन्न फसलों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए एनबीएस योजना में कुल 28 प्रकार के उर्वरक ग्रेड शामिल किए गए हैं। इनमें डीएपी के अलावा एमओपी, एनपीके और एसएसपी जैसे प्रमुख उर्वरक भी शामिल हैं।
रबी 2025–26 के लिए डीएपी (18-46-0-0) पर 29,805 रुपये प्रति मीट्रिक टन की सब्सिडी तय की गई है। एमओपी (0-0-60-0) पर 1,428 रुपये प्रति मीट्रिक टन, एनपीके (19-19-19) पर 17,738 रुपये प्रति मीट्रिक टन और एनपीके (12-32-16) पर 20,890 रुपये प्रति मीट्रिक टन की सब्सिडी मिलेगी। वहीं एसएसपी (0-16-0-11) पर 7,408 रुपये प्रति मीट्रिक टन और यूरिया-एसएसपी कॉम्प्लेक्स पर 9,088 रुपये प्रति मीट्रिक टन की सब्सिडी तय की गई है।
इन दरों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उर्वरक बाजार में कीमतें स्थिर रहें और किसानों को खेती के लिए आवश्यक पोषक तत्व समय पर उपलब्ध हों।
सूक्ष्म पोषक तत्वों और फोर्टिफिकेशन पर जोर
नई नीति में केवल मुख्य पोषक तत्वों तक ही बात सीमित नहीं रखी गई है। सरकार ने सूक्ष्म पोषक तत्वों की अहमियत को समझते हुए फोर्टिफिकेशन को भी बढ़ावा दिया है। यदि कोई उर्वरक बोरॉन या जिंक से लेपित है, तो कंपनियों को अतिरिक्त सब्सिडी दी जाएगी। बोरॉन लेपित खाद पर 300 रुपये प्रति मीट्रिक टन और जिंक लेपित खाद पर 500 रुपये प्रति मीट्रिक टन की अतिरिक्त सहायता दी जाएगी।
इस पहल का उद्देश्य मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करना और दीर्घकाल में फसलों की उत्पादकता बढ़ाना है। विशेषज्ञों का मानना है कि सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के कारण कई बार फसलों की पूरी क्षमता सामने नहीं आ पाती, ऐसे में यह कदम खेती के लिए बेहद लाभकारी साबित हो सकता है।
घरेलू उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा
एनबीएस योजना का एक अहम लक्ष्य देश को उर्वरक उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना भी है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014 में घरेलू उर्वरक उत्पादन 112.19 लाख मीट्रिक टन था। लगातार नीतिगत समर्थन और निवेश के चलते 2025 के अंत तक इसके 168.55 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है। यह लगभग 50 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी को दर्शाता है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हुई है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत के साथ-साथ आपूर्ति श्रृंखला भी अधिक स्थिर बनी है। इसका सीधा लाभ किसानों तक पहुंचता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार की अनिश्चितता का असर घरेलू कीमतों पर कम पड़ता है।
सब्सिडी के साथ सख्त निगरानी व्यवस्था
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि सब्सिडी का लाभ सही हाथों तक पहुंचे, इसके लिए सख्त निगरानी व्यवस्था लागू की गई है। उर्वरक कंपनियों को अपनी लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य की जानकारी अनिवार्य रूप से सरकार को देनी होगी। उर्वरक विभाग नियमित जांच करेगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सब्सिडी का पूरा लाभ किसानों को मिले।
यदि कोई कंपनी नियमों का उल्लंघन करती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। इससे बाजार में पारदर्शिता बढ़ेगी और कालाबाजारी जैसी समस्याओं पर अंकुश लगेगा।
बीज क्षेत्र में बड़ा कदम: 184 नई किस्में जारी
उर्वरक सब्सिडी के साथ-साथ बीज क्षेत्र में भी एक बड़ा ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने 25 प्रमुख फील्ड फसलों की 184 नई और उन्नत किस्में जारी की हैं। इन किस्मों का अनावरण नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में किया गया, जिसमें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, वैज्ञानिक, कृषि विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि और बीज क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हुए।
इन नई किस्मों का उद्देश्य किसानों की आमदनी बढ़ाना, कृषि उत्पादन को जलवायु के अनुरूप मजबूत बनाना और खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करना है।
विपरीत मौसम में भी बेहतर उत्पादन
नई किस्मों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये बदलते मौसम, सूखा, बाढ़ और मिट्टी की विविध परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं। कृषि मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि उच्च उत्पादक, जलवायु सहनशील और रोग-कीट प्रतिरोधी बीज किसानों के लिए भविष्य की सुरक्षा कवच की तरह हैं।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में खेती सबसे अधिक जोखिम में है। ऐसे में ये किस्में किसानों को मौसम की मार से बचाने और स्थिर उत्पादन सुनिश्चित करने में मदद करेंगी।
बीज अनुसंधान में भारत की उपलब्धि
भारत में बीज अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। वर्ष 1969 में गजट अधिसूचना की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से अब तक देश में 7,205 फसल किस्में अधिसूचित की जा चुकी हैं। इनमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, बाजरा, दलहन, तिलहन, रेशेदार और अन्य फसलें शामिल हैं।
पिछले 11–12 वर्षों में नई किस्मों के विकास की रफ्तार और तेज हुई है। इस अवधि में 3,236 उच्च उत्पादक किस्मों को मंजूरी दी गई, जबकि 1969 से 2014 के बीच 3,969 किस्में अधिसूचित की गई थीं। हाल ही में जारी की गई 184 किस्में इसी निरंतर प्रयास का परिणाम हैं।
विभिन्न फसलों के लिए नई किस्मों का विवरण
इन 184 नई किस्मों में अनाज फसलों की संख्या सबसे अधिक है। धान और मक्का की कई उन्नत किस्में इसमें शामिल हैं। इसके अलावा दलहन, तिलहन, चारा फसलें, गन्ना, कपास, जूट और तंबाकू जैसी फसलों की नई किस्में भी जारी की गई हैं।
इनमें ज्वार, बाजरा, रागी, लघु मिलेट्स और प्रोसो मिलेट जैसी मोटे अनाज की किस्में भी शामिल हैं, जो पोषण सुरक्षा को मजबूत करेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि मोटे अनाजों को बढ़ावा देना स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद है।
कृषि विश्वविद्यालयों और निजी क्षेत्र की भागीदारी
इन नई किस्मों के विकास में ICAR की संस्थाओं के साथ-साथ राज्य और केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों तथा निजी बीज कंपनियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फसल आधारित अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजनाओं के तहत वैज्ञानिकों ने वर्षों के शोध, परीक्षण और मूल्यांकन के बाद इन किस्मों को विकसित किया है।
यह साझेदारी इस बात का उदाहरण है कि जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र मिलकर काम करते हैं, तो खेती के लिए बेहतर समाधान सामने आते हैं।
किसानों की आय और बाजार संभावनाएं
नई किस्मों में केवल अधिक उपज ही नहीं, बल्कि बेहतर गुणवत्ता, पोषण-समृद्धि और प्रसंस्करण के अनुकूल गुण भी मौजूद हैं। इससे किसानों को बाजार में बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ेगी। उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों की मांग घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार दोनों में बढ़ रही है, ऐसे में ये किस्में किसानों के लिए नए अवसर खोल सकती हैं।
कृषि मंत्री ने इसे “लैब से लैंड” की सफल यात्रा बताया और कहा कि लक्ष्य है कि तीन वर्षों के भीतर ये किस्में किसानों तक व्यापक स्तर पर पहुंचें।
उर्वरक और बीज नीति का संयुक्त प्रभाव
यदि उर्वरक सब्सिडी और बीज विकास की इन दोनों पहलों को एक साथ देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सरकार खेती के हर पहलू को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही है। उर्वरक सब्सिडी से जहां खेती की लागत कम होगी, वहीं नई किस्मों से उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार आएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, रबी 2025–26 में इन नीतियों का असर गेहूं, सरसों, चना और अन्य रबी फसलों की पैदावार पर साफ दिखाई देगा। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा भी मजबूत होगी।
दीर्घकालीन कृषि आत्मनिर्भरता की ओर
देश को कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए उर्वरक उत्पादन, बीज विकास और किसानों तक सही तकनीक पहुंचाना तीनों आवश्यक हैं। हालिया फैसले इसी दिशा में उठाए गए ठोस कदम हैं। घरेलू उर्वरक उत्पादन में वृद्धि, नई किस्मों का विकास और सख्त निगरानी व्यवस्था मिलकर एक मजबूत कृषि ढांचा तैयार कर रहे हैं।
आने वाले वर्षों में यदि इन नीतियों को निरंतरता मिलती है, तो भारत न केवल अपनी खाद्य जरूरतें पूरी करेगा, बल्कि वैश्विक कृषि बाजार में भी मजबूत स्थिति बना सकेगा।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर डीएपी खाद पर 36 प्रतिशत अधिक सब्सिडी और 184 नई फसल किस्मों का जारी होना किसानों के लिए दोहरी राहत लेकर आया है। यह पहल रबी 2025–26 में खेती की लागत घटाने, उत्पादन बढ़ाने और आय में सुधार करने में अहम भूमिका निभाएगी। उर्वरक और बीज दोनों स्तरों पर किए गए ये सुधार इस बात का संकेत हैं कि देश की कृषि नीति अब अधिक समग्र और भविष्य केंद्रित हो रही है।
