उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में उस समय बड़ा भूचाल आ गया, जब फर्जी डिग्री प्रकरण में फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद स्थित जेएस विश्वविद्यालय की मान्यता रद्द करने का फैसला लिया गया। यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि शिक्षा में पारदर्शिता और गुणवत्ता को बनाए रखने की दिशा में एक मजबूत संदेश माना जा रहा है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि डिग्रियों की पवित्रता से खिलवाड़ करने वाले संस्थानों के लिए कोई स्थान नहीं है, चाहे वे निजी हों या किसी भी स्तर पर मान्यता प्राप्त क्यों न हों।

यह फैसला मंगलवार को हुई कैबिनेट बैठक में लिया गया, जहां उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने इसकी औपचारिक घोषणा की। उनके अनुसार, विस्तृत जांच और ठोस सबूतों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया कि जेएस विश्वविद्यालय से जुड़ा फर्जी डिग्री घोटाला गंभीर प्रकृति का है और इससे शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को ठेस पहुंची है।
छात्रों के भविष्य को लेकर सरकार का आश्वासन
मान्यता रद्द होने की खबर से सबसे पहले छात्रों और उनके अभिभावकों में चिंता का माहौल बना। हालांकि सरकार ने तुरंत यह स्पष्ट कर दिया कि इस निर्णय का खामियाजा छात्रों को नहीं भुगतना पड़ेगा। जेएस विश्वविद्यालय में वर्तमान में अध्ययनरत छात्रों को अब आगरा स्थित डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय से संबद्ध किया जाएगा। इससे उनकी पढ़ाई, परीक्षाएं, डिग्रियां और प्रमाणपत्र पूरी तरह वैध और मान्य रहेंगे।
सरकार का कहना है कि छात्रों का भविष्य सर्वोपरि है और किसी संस्थान की गलती की सजा उन्हें नहीं दी जा सकती। इसलिए यह व्यवस्था की गई है कि शैक्षणिक सत्र, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन की प्रक्रिया बिना किसी रुकावट के आगे बढ़े।
कैसे सामने आया फर्जी डिग्री घोटाला
जेएस विश्वविद्यालय का नाम पहली बार तब सुर्खियों में आया, जब राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा आयोजित पीटीआई थर्ड ग्रेड भर्ती प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं सामने आईं। 16 जून 2022 को इस भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया था। परीक्षा 25 सितंबर 2022 को हुई और अक्टूबर 2022 में परिणाम घोषित किए गए।
ऑनलाइन फॉर्म और दस्तावेजों के सत्यापन के दौरान कई अभ्यर्थियों के शैक्षणिक प्रमाणपत्रों में विसंगतियां पाई गईं। जांच में सामने आया कि कुल 5390 अभ्यर्थियों ने अपने दस्तावेज जमा किए थे, जिनमें से 254 अभ्यर्थियों ने जेएस विश्वविद्यालय से प्राप्त डिग्रियां प्रस्तुत की थीं। जब इन दस्तावेजों का गहन सत्यापन किया गया, तो 108 अभ्यर्थियों की डिग्रियां फर्जी पाई गईं।
भर्ती घोटाले से शिक्षा व्यवस्था तक
यह मामला केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने विश्वविद्यालय की आंतरिक कार्यप्रणाली और प्रशासन पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए। राजस्थान के जिला शिक्षा अधिकारी आरडी बंसल ने फर्जी डिग्री के आधार पर नौकरी पाने वाले चार अभ्यर्थियों को नोटिस जारी कर उनकी सेवाएं समाप्त कर दीं। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया और मामला सीधे विश्वविद्यालय तक पहुंच गया।
यह स्पष्ट होने लगा कि डिग्रियों के निर्गमन में बड़े स्तर पर अनियमितताएं हुई हैं और यह केवल कुछ व्यक्तियों की गलती नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र का हिस्सा हो सकता है।
राजस्थान पुलिस और एजेंसियों की जांच
फर्जी डिग्री मामले की जांच राजस्थान पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक एटीएस एवं एसओजी विजय कुमार की निगरानी में की गई। जांच एजेंसियों ने तकनीकी साक्ष्यों, दस्तावेजों और बैंक लेन-देन की पड़ताल की। मार्च 2025 में राजस्थान पुलिस ने जेएस विश्वविद्यालय परिसर में दबिश दी और विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार नंदलाल मिश्रा को गिरफ्तार किया।
इसके बाद जांच आगे बढ़ी तो विश्वविद्यालय के कुलपति सुकेश यादव और उनकी पत्नी की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई। दोनों को दिल्ली हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया गया। जांच में एक दलाल की संलिप्तता भी सामने आई, जो फर्जी डिग्रियों के लेन-देन में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था।
सरकार का स्पष्ट संदेश
कैबिनेट बैठक के बाद उच्च शिक्षा मंत्री ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि डिग्री केवल एक कागज नहीं होती, बल्कि वह वर्षों की मेहनत, ज्ञान और भरोसे का प्रतीक होती है। यदि किसी संस्थान द्वारा इस भरोसे को तोड़ा जाता है, तो सरकार को सख्त कदम उठाने ही होंगे।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला जल्दबाजी में नहीं लिया गया, बल्कि सभी तथ्यों और जांच रिपोर्ट्स का अध्ययन करने के बाद लिया गया है।
जेएस विश्वविद्यालय की मान्यता रद्द होने का अर्थ
किसी विश्वविद्यालय की मान्यता रद्द होना एक अत्यंत गंभीर कदम माना जाता है। इसका अर्थ है कि वह संस्थान अब स्वतंत्र रूप से डिग्रियां जारी नहीं कर सकता और उसकी शैक्षणिक स्वायत्तता समाप्त हो जाती है। जेएस विश्वविद्यालय के मामले में यह कदम इसलिए जरूरी माना गया क्योंकि फर्जी डिग्रियों का मामला सीधे तौर पर छात्रों, भर्ती प्रक्रियाओं और सार्वजनिक भरोसे से जुड़ा था।
मान्यता रद्द होने के बाद विश्वविद्यालय का शैक्षणिक और प्रशासनिक संचालन सरकार द्वारा तय नई व्यवस्था के तहत होगा।
आगरा विश्वविद्यालय की भूमिका
डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह जेएस विश्वविद्यालय के छात्रों के शैक्षणिक रिकॉर्ड का सत्यापन करे और आगे की पढ़ाई का संचालन सुनिश्चित करे। आगरा विश्वविद्यालय की यह भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि भरोसे की बहाली से भी जुड़ी है।
सरकार को उम्मीद है कि आगरा विश्वविद्यालय के माध्यम से छात्रों को उनकी डिग्रियों की वैधता और भविष्य को लेकर कोई संदेह नहीं रहेगा।
छात्रों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया
इस फैसले के बाद छात्रों में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली। एक ओर जहां विश्वविद्यालय की मान्यता रद्द होने से चिंता हुई, वहीं आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध किए जाने की घोषणा से राहत भी मिली। कई छात्रों ने कहा कि वे केवल अपनी पढ़ाई और डिग्री की वैधता को लेकर चिंतित थे, जो अब सरकार के फैसले से काफी हद तक दूर हो गई है।
अभिभावकों का कहना है कि सरकार ने सही समय पर सही निर्णय लिया है और इससे शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जगी है।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा
यह पूरा मामला शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही की आवश्यकता को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि निजी विश्वविद्यालयों की नियमित ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड और केंद्रीय सत्यापन प्रणाली से ऐसे मामलों को रोका जा सकता है।
सरकार भी अब इस दिशा में कदम उठाने की बात कर रही है, ताकि भविष्य में किसी भी स्तर पर फर्जी डिग्रियों का कारोबार पनप न सके।
निष्कर्ष
जेएस विश्वविद्यालय की मान्यता रद्द किया जाना उत्तर प्रदेश की शिक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ माना जा सकता है। यह फैसला न केवल फर्जी डिग्री घोटाले पर लगाम लगाएगा, बल्कि अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए भी एक चेतावनी है। साथ ही, छात्रों को आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध करने का निर्णय यह दिखाता है कि सरकार सख्ती और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए हुए है। शिक्षा में गुणवत्ता और भरोसे की बहाली के लिए यह कदम लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
