भारतीय रेलवे लगातार तकनीकी और पर्यावरणीय क्षेत्रों में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। हाल ही में वंदेभारत और वंदेभारत स्लीपर ट्रेन का उद्घाटन हो चुका है, जो विश्व की टॉप ट्रेनें में शामिल है। इसके तुरंत बाद भारतीय रेलवे ने एक और बड़ा कदम उठाया है। इस कदम के तहत दुनिया की पहली ब्रॉड गेज हाइड्रोजन ट्रेन तैयार की जा रही है, जो न तो डीजल से चलेगी और न ही बिजली से। इसे चलाने के लिए केवल पानी और हाइड्रोजन का इस्तेमाल होगा।

हाइड्रोजन ट्रेन के इस अभिनव प्रोजेक्ट की तैयारी हरियाणा के जींद में स्थित हाइड्रोजन प्लांट में पूरी तरह से शुरू हो चुकी है। यहाँ पर ट्रेन के टैंकरों में हाइड्रोजन भरने और रिफिलिंग का सफल ट्रायल किया गया। अधिकारियों के अनुसार, सभी परीक्षण पूरी तरह सुरक्षित और तकनीकी रूप से सफल रहे हैं। अब ट्रेन का ट्रैक पर ट्रायल जल्द ही शुरू किया जाएगा।
जींद हाइड्रोजन प्लांट और ट्रेन की तकनीक
रेल मंत्रालय के अनुसार जींद हाइड्रोजन प्लांट को विशेष तकनीक के साथ डिजाइन किया गया है, जिससे हाइड्रोजन का उत्पादन, स्टोरेज और रिफिलिंग आसान और सुरक्षित हो सके। ट्रेन में कुल 27 सिलेंडर लगाए गए हैं, जिनमें प्रत्येक की क्षमता 8.4 किलोग्राम है। इस तरह, एक बार में कुल 226.8 किलोग्राम हाइड्रोजन भरा जा सकता है। इसके माध्यम से ट्रेन लगभग 180 किमी की दूरी तय कर सकती है।
प्रारंभिक पायलट प्रोजेक्ट हरियाणा के जींद-सोनीपत रूट (लगभग 90 किमी) पर किया जाएगा। ट्रायल के दौरान रिफिलिंग की प्रक्रिया, प्रेशर, तापमान और लीकेज जैसी सभी तकनीकी जांचें विशेषज्ञों की निगरानी में पूरी की जाएंगी।
हाइड्रोजन ट्रेन का महत्व और उद्देश्य
हाइड्रोजन ट्रेन का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को संरक्षित करना और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। इस ट्रेन के माध्यम से भविष्य में पहाड़ी और हेरिटेज रूट्स, जैसे कालका-शिमला मार्ग, पर्यावरण के अनुकूल तरीके से संचालित किए जा सकेंगे।
रेलवे मंत्रालय का लक्ष्य 2030 तक देशभर की सभी रेल लाइनों को इलेक्ट्रिफिकेशन करना और शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में काम करना है। हाइड्रोजन का उपयोग फ्यूल के रूप में इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
तकनीकी जानकारी और ट्रायल
ट्रेन में लगी हाइड्रोजन सिलेंडरों की कुल क्षमता 226.8 किलोग्राम है। प्रत्येक सिलेंडर 8.4 किलोग्राम हाइड्रोजन गैस रख सकता है। ट्रेन 360 किलोग्राम हाइड्रोजन में 180 किमी की दूरी तय कर सकती है। इसकी अधिकतम गति 110 से 150 किमी प्रति घंटा होगी। जींद से सोनीपत की 90 किमी की दूरी ट्रेन लगभग 1 घंटे में पूरी करेगी।
ट्रायल के दौरान तकनीकी पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। रिफिलिंग, प्रेशर टेस्ट, तापमान और लीकेज चेक जैसी प्रक्रियाएं विशेषज्ञ निगरानी में पूरी की जाएंगी। इन सभी प्रक्रियाओं के सफल होने के बाद हाइड्रोजन ट्रेन का नियमित ट्रायल ट्रैक पर शुरू किया जाएगा।
अंतरराष्ट्रीय तुलना और तकनीकी श्रेष्ठता
भारतीय हाइड्रोजन ट्रेन तकनीकी दृष्टि से जर्मनी, फ्रांस और स्वीडन जैसी देशों की ट्रेनों से अलग और बेहतर मानी जा रही है। भारत में इन देशों की तकनीक का अध्ययन किया गया और उसे आत्मनिर्भर तरीके से विकसित किया गया। इस ट्रेन का उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि देश में ऊर्जा आयात पर निर्भरता को कम करना और डीजल ट्रेनों की जगह लेना भी है।
हाइड्रोजन और पर्यावरण
हाइड्रोजन ट्रेन में उपयोग होने वाली तकनीक फ्यूल सेल आधारित है, जिसमें हाइड्रोजन गैस और ऑक्सीजन के संयोजन से ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह प्रक्रिया पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित है और कोई प्रदूषण नहीं उत्पन्न करती। भारत में इस ट्रेन के प्रयोग से एयर पॉल्यूशन में कमी आएगी और ऊर्जा की खपत अधिक कुशल होगी।
भविष्य की योजनाएं
भारतीय रेलवे का लक्ष्य 2030 तक देशभर में 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाना है, विशेष रूप से हेरिटेज रूट्स और पहाड़ी मार्गों पर। इसके साथ ही हाइड्रोजन कारों के प्रोजेक्ट भी चल रहे हैं। भारत इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।
भारतीय रेलवे के इस प्रयास से देश में हाइड्रोजन आधारित परिवहन क्रांति की शुरुआत होने जा रही है। यह ट्रेन वंदेभारत स्लीपर से भी अधिक आधुनिक और पर्यावरण अनुकूल मानी जा रही है।
निष्कर्ष
हाइड्रोजन ट्रेन भारत के रेलवे इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने जा रही है। यह न केवल पर्यावरण को सुरक्षित रखेगी, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करेगी। 2028 तक कमर्शियल ऑपरेशन की संभावना के साथ यह ट्रेन भारत की रेलवे तकनीक को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करेगी।
