इंदौर को देश का सबसे साफ़ शहर कहा जाता रहा है। लगातार आठ बार स्वच्छता रैंकिंग में शीर्ष स्थान हासिल करने वाला यह शहर पूरे भारत के लिए एक मॉडल के रूप में पेश किया जाता है। साफ सड़कें, व्यवस्थित कचरा प्रबंधन, रात में सफाई और घर-घर कचरा अलग-अलग संग्रह करने की व्यवस्था ने इंदौर को स्वच्छता की मिसाल बना दिया। लेकिन जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में भागीरथपुरा इलाके से आई खबरों ने इस चमकदार छवि पर गहरे सवाल खड़े कर दिए।

दूषित पानी पीने से अब तक 17 लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के बीमार पड़ने की घटना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या स्वच्छता की रैंकिंग वास्तव में लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा की गारंटी देती है। जब एक शहर को देश का सबसे साफ़ कहा जाता है, तो वहां पीने का पानी जानलेवा कैसे हो सकता है, यही सवाल अब हर तरफ गूंज रहा है।
भागीरथपुरा की त्रासदी और भयावह आंकड़े
मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का भागीरथपुरा इलाका इन दिनों भय, शोक और गुस्से का केंद्र बन गया है। दूषित पानी पीने से फैली बीमारी ने कुछ ही दिनों में विकराल रूप ले लिया। करीब 400 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जिनमें से 150 से अधिक लोग अभी भी इलाजरत हैं। उल्टी, दस्त और गंभीर संक्रमण के मामले लगातार सामने आए, जिनका सबसे ज्यादा असर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों पर पड़ा।
इन मौतों ने सिर्फ परिवारों को ही नहीं तोड़ा, बल्कि शहर की उस पहचान को भी झकझोर दिया, जिस पर इंदौर को वर्षों से गर्व था। जिन गलियों में सफाई के उदाहरण दिए जाते थे, वहीं अब पानी की हर बूंद पर शक किया जाने लगा।
प्रशासन की शुरुआती जांच और चौंकाने वाला खुलासा
जैसे-जैसे मामले बढ़े, प्रशासन हरकत में आया। कलेक्टर शिवम वर्मा ने जानकारी दी कि मौतों के कारणों की जांच के लिए एक समिति गठित की गई है। शुरुआती जांच में जो तथ्य सामने आए, वे बेहद चिंताजनक थे। भागीरथपुरा में जिस नर्मदा जल की टंकी से पानी की आपूर्ति होती थी, उसके पास ही बनी एक पुलिस चौकी के टॉयलेट का आउटफॉल पाइप था। इसी पाइप से निकलने वाला दूषित पानी सप्लाई की पाइपलाइन में मिल गया।
यानी जिस पानी को पीने के लिए सुरक्षित माना जा रहा था, उसमें शौचालय का गंदा पानी मिल रहा था। यह सुनकर लोग सन्न रह गए। प्रशासन ने दावा किया कि इस तकनीकी खामी को ठीक कर दिया गया है, लेकिन सवाल यह है कि यह चूक इतनी बड़ी त्रासदी से पहले कैसे नजरअंदाज होती रही।
कार्रवाई और आश्वासन, लेकिन भरोसे की कमी
कलेक्टर शिवम वर्मा ने कहा कि नगर निगम के संबंधित ज़ोनल अधिकारियों पर कार्रवाई की गई है और आगे ऐसी घटना न हो, इसके लिए सतर्कता बढ़ाई जाएगी। प्रशासन ने यह भी आश्वासन दिया कि सभी बीमार लोगों का इलाज कराया जा रहा है और साफ पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है।
हालांकि, इन बयानों के बावजूद स्थानीय लोगों का भरोसा डगमगाया हुआ है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनके लिए यह सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि व्यवस्था की असफलता है।
स्वच्छता रैंकिंग और पानी की अनदेखी
इंदौर की सफाई व्यवस्था की चर्चा देश ही नहीं, दुनिया भर में होती रही है। शहर की सड़कों की रात में सफाई, गीले और सूखे कचरे का अलग-अलग संग्रह और बेहतर कचरा प्रबंधन ने इसे बार-बार नंबर वन बनाया। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पीने के पानी की गुणवत्ता को कितनी अहमियत दी गई, यह सवाल अब सामने आया है।
पेयजल सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि स्वच्छता रैंकिंग में पानी की गुणवत्ता का वजन बेहद कम है। साफ सड़कें और चमकदार शहर का मतलब यह नहीं कि पानी भी उतना ही सुरक्षित हो।
विशेषज्ञों की चेतावनी और अनसुनी सच्चाई
पेयजल सुरक्षा के क्षेत्र में लंबे समय तक काम कर चुके सुधींद्र मोहन शर्मा इस घटना को व्यवस्था की गंभीर चूक मानते हैं। उनका कहना है कि इंदौर की सफाई बाहर से दिखती है, लेकिन अंदर की निगरानी कमजोर है। सफाई कितनी बार होती है, कचरा कैसे ढंका जाता है, इन सबके आंकड़े तो होते हैं, लेकिन पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच और रिकॉर्डिंग पर ध्यान नहीं दिया जाता।
उनका मानना है कि वॉटर क्वालिटी सर्विलांस सिर्फ पानी का सैंपल लेने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसका लगातार विश्लेषण भी जरूरी है। सरकारी मानकों के अनुसार, इंदौर जैसे बड़े शहर में रोज़ कम से कम दस सैंपल लिए जाने चाहिए, ताकि अलग-अलग इलाकों में पानी की गुणवत्ता पर नजर रखी जा सके। पूरे शहर को कवर करने के लिए हर महीने सैकड़ों सैंपल लेने की जरूरत होती है।
अगर समय पर जांच होती तो क्या बच सकती थीं जानें
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि अगर समय पर पानी की जांच और निगरानी होती, तो यह त्रासदी टाली जा सकती थी। दूषित पानी धीरे-धीरे लोगों की सेहत बिगाड़ता है और जब तक लक्षण गंभीर होते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
भागीरथपुरा की घटना इस बात का उदाहरण है कि एक छोटी सी लापरवाही कैसे जानलेवा बन सकती है। यह सिर्फ एक इलाके की समस्या नहीं, बल्कि पूरे शहर के लिए चेतावनी है।
पीड़ित परिवारों की दर्दनाक कहानियां
इस संकट का सबसे बड़ा बोझ आम लोगों ने उठाया है। भागीरथपुरा में रहने वाली प्रियांशी बागोरिया की कहानी इस त्रासदी की भयावहता को बयां करती है। छह महीने की गर्भवती प्रियांशी को अचानक उल्टी-दस्त की शिकायत हुई। हालत बिगड़ने पर उन्हें अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े।
उनके पति अभिनव बागोरिया बताते हैं कि पहले निजी अस्पताल में इलाज के नाम पर भारी खर्च बताया गया, जिसे वे वहन नहीं कर सकते थे। सरकारी अस्पतालों में भी उन्हें बार-बार एक जगह से दूसरी जगह भेजा गया। आखिरकार एमटीएच अस्पताल में इलाज मिला, लेकिन तब तक परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ बढ़ चुका था।
इलाज के दौरान आर्थिक मार
अभिनव बताते हैं कि जांच और इलाज में हजारों रुपये खर्च हो गए। उनके पिता पहले से अस्पताल में भर्ती थे और ई-रिक्शा चलाकर परिवार का गुजारा करते हैं। ऐसे परिवारों के लिए दूषित पानी सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि गरीबी और कर्ज का कारण भी बन गया।
यह कहानी अकेली नहीं है। कई परिवारों ने अपने बच्चों, माता-पिता और बुजुर्गों को खोया है। उनके लिए इंदौर की स्वच्छता रैंकिंग अब किसी मायने की नहीं रह गई।
दूसरे इलाकों से भी सामने आ रही शिकायतें
भागीरथपुरा के अलावा इंदौर के अन्य इलाकों से भी पानी खराब होने की शिकायतें सामने आई हैं। खंडवा नाका, भावना नगर और लिंबोदी जैसे क्षेत्रों में ड्रेनेज पाइपलाइन के काम के दौरान बोरिंग के पानी में गंदगी मिलने की बात कही जा रही है।
कुछ इलाकों में हैंडपंप से निकलने वाला पानी मिट्टी जैसा गंदा है। स्थानीय लोगों ने कई बार शिकायत दर्ज कराई, लेकिन उनका कहना है कि अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला।
टैंकरों पर निर्भरता और अस्थायी राहत
भागीरथपुरा में फिलहाल टैंकरों से पानी की आपूर्ति की जा रही है। यह एक अस्थायी समाधान है, जो लंबे समय तक कारगर नहीं हो सकता। टैंकर का पानी सीमित मात्रा में मिलता है और हर घर तक पर्याप्त पानी पहुंच पाना मुश्किल होता है।
लोगों का कहना है कि जब तक स्थायी रूप से पाइपलाइन और जलस्रोतों की जांच नहीं होती, तब तक डर बना रहेगा। हर गिलास पानी पीते समय उन्हें यह आशंका सताती है कि कहीं वही पानी फिर बीमार न कर दे।
स्वच्छता बनाम स्वास्थ्य की बहस
इंदौर की घटना ने एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। क्या स्वच्छता का मतलब सिर्फ साफ सड़कें और कचरा प्रबंधन है, या इसमें सुरक्षित पानी और स्वास्थ्य भी शामिल होना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पीने के पानी की गुणवत्ता को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक किसी भी शहर को वास्तव में स्वच्छ नहीं कहा जा सकता।
स्वच्छता और स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अगर पानी दूषित है, तो साफ सड़कें भी किसी काम की नहीं।
प्रशासन के लिए सबक और आगे की राह
यह त्रासदी प्रशासन के लिए एक बड़ा सबक है। सिर्फ रैंकिंग और पुरस्कारों पर ध्यान देने के बजाय बुनियादी सेवाओं की गुणवत्ता पर फोकस करना जरूरी है। पानी की नियमित जांच, पाइपलाइन और ड्रेनेज सिस्टम का ऑडिट और पारदर्शी रिपोर्टिंग जैसी व्यवस्थाएं मजबूत करनी होंगी।
इंदौर जैसे शहर से उम्मीद की जाती है कि वह सिर्फ उदाहरण न बने, बल्कि सीख भी दे। इस घटना से सीख लेकर अगर व्यवस्था में सुधार होता है, तो शायद यह दर्दनाक अनुभव भविष्य में जानें बचाने का कारण बन सके।
निष्कर्ष: चमक से परे सच्चाई
इंदौर की स्वच्छता की कहानी अब एक नए मोड़ पर है। यह घटना बताती है कि चमकदार आंकड़ों और रैंकिंग के पीछे भी सच्चाई छिपी हो सकती है। स्वच्छता का असली मतलब तभी पूरा होगा, जब हर नागरिक को सुरक्षित पानी और स्वस्थ जीवन मिलेगा।
भागीरथपुरा की त्रासदी सिर्फ एक इलाके की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए चेतावनी है कि स्वच्छता को केवल दिखावे से नहीं, बल्कि गहराई से समझने और लागू करने की जरूरत है।
