सरकारी अस्पताल आमतौर पर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए जीवन की आखिरी उम्मीद होते हैं। यहां आने वाला हर मरीज यह भरोसा लेकर आता है कि कम संसाधनों के बावजूद उसे सुरक्षित इलाज मिलेगा। लेकिन जब उसी अस्पताल से मिलने वाली दवाएं बीमारी कम करने के बजाय नए खतरे का कारण बन जाएं, तो यह स्थिति बेहद चिंताजनक हो जाती है। भोपाल के जेपी अस्पताल में सामने आए हालिया मामलों ने इसी भरोसे को गहरी चोट पहुंचाई है।

इस अस्पताल में पहले एक मरीज को दी गई डिक्लोफेनेक टैबलेट में फफूंद मिलने की पुष्टि हुई और अब सीलबंद माउथवॉश की बोतल में कीड़े जैसी आकृति पाए जाने का मामला सामने आया है। इन घटनाओं ने न केवल अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
एक के बाद एक सामने आती चौंकाने वाली घटनाएं
यह मामला तीन जनवरी को तब सामने आया, जब एक मरीज ने अस्पताल से दी गई डिक्लोफेनेक टैबलेट को देखकर आपत्ति दर्ज कराई। मरीज का आरोप था कि टैबलेट के भीतर फफूंद साफ दिखाई दे रही थी। यह शिकायत सामने आने के बाद अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मच गया। शुरुआती स्तर पर इसे भंडारण से जुड़ी समस्या बताकर टालने की कोशिश की गई, लेकिन मामला पूरी तरह शांत भी नहीं हुआ था कि दूसरी और भी ज्यादा चौंकाने वाली घटना सामने आ गई।
छह जनवरी को अस्पताल से मरीज को दिया गया एक सील पैक माउथवॉश जब खोला गया, तो उसके अंदर कीड़े जैसी आकृति दिखाई दी। यह माउथवॉश पूरी तरह बंद पैक में था, जिससे यह सवाल और भी गंभीर हो गया कि आखिर दवाओं की सप्लाई और स्टोरेज में कैसी लापरवाही बरती जा रही है।
मरीजों के मन में डर और असुरक्षा
इन दोनों घटनाओं के बाद अस्पताल में इलाज कराने आए मरीजों और उनके परिजनों के मन में डर साफ नजर आने लगा। लोग यह सोचने को मजबूर हो गए कि अगर साधारण दर्द निवारक टैबलेट और माउथवॉश जैसी दवाएं भी सुरक्षित नहीं हैं, तो गंभीर बीमारियों की दवाओं की स्थिति क्या होगी।
अस्पताल में भर्ती कई मरीजों ने यह कहना शुरू कर दिया कि अब वे बिना जांचे कोई दवा लेने से डर रहे हैं। कुछ मरीजों ने तो बाहर से दवाएं खरीदने का मन बना लिया, भले ही इसके लिए उन्हें अतिरिक्त खर्च क्यों न करना पड़े।
सीलबंद दवा में खामी ने बढ़ाई चिंता
डिक्लोफेनेक टैबलेट में फफूंद मिलना अपने आप में गंभीर मामला था, लेकिन माउथवॉश का सील पैक होना इस पूरे प्रकरण को और भी संवेदनशील बना देता है। आमतौर पर सीलबंद दवाओं को सबसे सुरक्षित माना जाता है। जब ऐसी दवा में कीड़े जैसी आकृति दिखाई दे, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि गड़बड़ी कहां हुई।
क्या यह समस्या निर्माण के समय हुई, या फिर सप्लाई चेन के दौरान, या अस्पताल के ड्रग स्टोर में रखरखाव के समय। इन सभी सवालों का जवाब अब जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।
ड्रग स्टोर की नमी बनी बड़ी वजह
अस्पताल के ड्रग स्टोर को लेकर पहले भी शिकायतें सामने आती रही हैं। बताया जा रहा है कि स्टोर में अत्यधिक नमी रहती है, जिससे दवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। नमी दवाओं के खराब होने का एक बड़ा कारण मानी जाती है, खासकर टैबलेट और तरल दवाओं के मामले में।
डिक्लोफेनेक टैबलेट में फफूंद मिलने के पीछे भी यही कारण बताया जा रहा है। यदि दवाओं को सही तापमान और सूखे वातावरण में न रखा जाए, तो उनमें फंगस पनपने की आशंका बढ़ जाती है। यह स्थिति सीधे तौर पर मरीजों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
पहले भी हो चुकी हैं शिकायतें
यह पहला मौका नहीं है जब जेपी अस्पताल के ड्रग स्टोर को लेकर सवाल उठे हों। पहले भी नमी, अव्यवस्था और दवाओं के सही रखरखाव न होने की शिकायतें की जा चुकी हैं। इसके बावजूद यदि हालात नहीं सुधरे, तो यह प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है।
अस्पताल जैसे संवेदनशील संस्थान में ऐसी समस्याओं को नजरअंदाज करना गंभीर परिणाम ला सकता है। दवाओं की गुणवत्ता से कोई भी समझौता मरीज की जान के लिए खतरा बन सकता है।
जांच के लिए गठित हुई समिति
मामले की गंभीरता को देखते हुए सीएमएचओ स्तर पर जांच के आदेश दिए गए हैं। इसके लिए पांच सदस्यीय जांच टीम का गठन किया गया है, जो पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच करेगी। यह टीम यह पता लगाएगी कि दवाओं में खामी कहां हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
जांच टीम ड्रग स्टोर की स्थिति, भंडारण व्यवस्था, सप्लाई चेन और दवाओं की खरीद प्रक्रिया की भी समीक्षा करेगी। उम्मीद की जा रही है कि जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद दोषियों पर कार्रवाई की जाएगी।
सवालों के घेरे में स्वास्थ्य व्यवस्था
इन घटनाओं ने सिर्फ एक अस्पताल की छवि को नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि पूरी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहने वाले लाखों लोग यह उम्मीद करते हैं कि उन्हें सुरक्षित और मानक दवाएं मिलेंगी।
जब इस भरोसे को ठेस पहुंचती है, तो लोगों का सिस्टम से विश्वास उठने लगता है। यह स्थिति समाज के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है, क्योंकि हर व्यक्ति निजी अस्पताल का खर्च वहन नहीं कर सकता।
दवाओं की गुणवत्ता और मरीजों का अधिकार
मरीज को यह अधिकार है कि उसे जो दवा दी जा रही है, वह पूरी तरह सुरक्षित और मानक के अनुरूप हो। दवा में किसी भी तरह की गड़बड़ी सीधे तौर पर मरीज के स्वास्थ्य और जीवन को खतरे में डाल सकती है।
डिक्लोफेनेक जैसी दवा आमतौर पर दर्द और सूजन के लिए दी जाती है, जबकि माउथवॉश का उपयोग मुंह की सफाई और संक्रमण से बचाव के लिए किया जाता है। यदि इन्हीं दवाओं में संक्रमण या कीड़े जैसी स्थिति हो, तो उनका प्रभाव उल्टा पड़ सकता है।
जिम्मेदारी तय करना क्यों जरूरी
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदारी का है। क्या यह केवल स्टोरेज की गलती है, या फिर सप्लायर की लापरवाही, या फिर जांच प्रक्रिया में कमी। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होती, तब तक ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति का खतरा बना रहेगा।
स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है। मरीजों की जान से जुड़ा कोई भी मामला हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
सुधार की जरूरत और आगे का रास्ता
जेपी अस्पताल में सामने आए इन मामलों को चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए। दवाओं के भंडारण, सप्लाई और वितरण की पूरी प्रक्रिया की समीक्षा जरूरी है। ड्रग स्टोर में नमी की समस्या को तुरंत दूर किया जाना चाहिए और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत की जानी चाहिए।
साथ ही, मरीजों को भी जागरूक किया जाना चाहिए कि यदि उन्हें किसी दवा में कोई भी गड़बड़ी नजर आए, तो वे तुरंत इसकी शिकायत दर्ज कराएं।
भरोसे की बहाली की चुनौती
अब सबसे बड़ी चुनौती अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के सामने यह है कि मरीजों का टूटा हुआ भरोसा कैसे वापस लाया जाए। केवल जांच के आदेश देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठोस कार्रवाई और सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।
यदि समय रहते इस दिशा में सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला आने वाले समय में और भी गंभीर रूप ले सकता है।
