भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में एक और अहम उपलब्धि दर्ज की गई है। स्वदेशी रक्षा तकनीक के क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने एक ऐसी मिसाइल का सफल परीक्षण किया है, जो भविष्य के युद्धों में दुश्मन के बख्तरबंद टैंकों के लिए काल साबित हो सकती है। यह मैन पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल न केवल अत्याधुनिक तकनीकों से लैस है, बल्कि इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के टैंक को उसके सबसे कमजोर हिस्से पर ऊपर से निशाना बनाकर नष्ट कर सकती है।

यह सफलता सिर्फ एक मिसाइल परीक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की बढ़ती सैन्य आत्मनिर्भरता और तकनीकी आत्मविश्वास का भी प्रतीक है।
कंधे पर रखकर दागी जाने वाली घातक ताकत
इस नई मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे एक सैनिक अकेले अपने कंधे पर रखकर ऑपरेट कर सकता है। आधुनिक युद्धों में जहां तेज गति और मोबाइल फायरपावर की जरूरत होती है, वहां ऐसी मैन पोर्टेबल मिसाइलें बेहद अहम भूमिका निभाती हैं। यह मिसाइल चलते हुए टैंक को भी सटीकता के साथ निशाना बनाने में सक्षम है, जिससे युद्धक्षेत्र में दुश्मन को संभलने का मौका तक नहीं मिलता।
मिसाइल का डिजाइन इस बात को ध्यान में रखकर किया गया है कि टैंक का ऊपरी हिस्सा अपेक्षाकृत कमजोर होता है। पारंपरिक हथियार अक्सर सामने या साइड से हमला करते हैं, लेकिन यह मिसाइल ऊपर से वार कर टैंक के मजबूत कवच को भी बेअसर कर देती है।
सफल परीक्षण और उसका महत्व
यह परीक्षण महाराष्ट्र के अहिल्या नगर स्थित केके रेंज में किया गया, जहां एक चलते-फिरते लक्ष्य पर इस मिसाइल ने पूरी सटीकता के साथ हमला किया। यह तीसरी पीढ़ी की एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है, जो आधुनिक युद्ध की जरूरतों के अनुसार विकसित की गई है। परीक्षण के दौरान मिसाइल ने अपने सभी मानकों को सफलतापूर्वक पूरा किया, जिससे वैज्ञानिकों और रक्षा विशेषज्ञों में उत्साह का माहौल है।
यह सफलता यह भी दिखाती है कि भारत अब केवल आयातित रक्षा प्रणालियों पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी जरूरतों के अनुसार स्वदेशी हथियार विकसित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
ऊपर से हमला करने की रणनीति
इस मिसाइल की सबसे घातक विशेषता इसकी टॉप अटैक क्षमता है। युद्ध विशेषज्ञों के अनुसार, टैंक का ऊपरी हिस्सा उसका सबसे कमजोर बिंदु होता है। इसी कमजोरी को ध्यान में रखते हुए इस मिसाइल को डिजाइन किया गया है। जैसे ही यह मिसाइल अपने लक्ष्य के पास पहुंचती है, यह ऊपर से हमला करती है और टैंक के कवच को भेद देती है।
यह रणनीति आधुनिक युद्ध में बेहद कारगर मानी जाती है, क्योंकि इससे भारी और महंगे टैंकों को भी अपेक्षाकृत कम संसाधनों से नष्ट किया जा सकता है।
अत्याधुनिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल
इस मिसाइल में इमेजिंग इन्फ्रारेड होमिंग सीकर लगाया गया है, जो लक्ष्य को पहचानने और उस पर लॉक करने में अहम भूमिका निभाता है। यह सीकर लक्ष्य की गर्मी और उसकी आकृति के आधार पर उसे पहचानता है, जिससे गलत निशाने की संभावना बेहद कम हो जाती है।
इस तकनीक की मदद से मिसाइल दिन और रात दोनों समय समान प्रभावी रहती है। खराब मौसम या धुएं की स्थिति में भी यह लक्ष्य को पहचानने में सक्षम होती है, जो इसे युद्ध के हर हालात में उपयोगी बनाती है।
इलेक्ट्रिक कंट्रोल सिस्टम से सटीक नियंत्रण
इस मिसाइल में पूरी तरह से इलेक्ट्रिक कंट्रोल एक्चुएशन सिस्टम लगाया गया है, जो इसकी दिशा और गति को नियंत्रित करता है। यह सिस्टम मिसाइल को उड़ान के दौरान स्थिरता प्रदान करता है और लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करता है।
इलेक्ट्रिक कंट्रोल सिस्टम के कारण मिसाइल की प्रतिक्रिया तेज होती है और ऑपरेटर को ज्यादा सटीक नियंत्रण मिलता है। इससे युद्धक्षेत्र में सैनिकों का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।
फायर कंट्रोल सिस्टम और लक्ष्य लॉक करने की क्षमता
मिसाइल में मौजूद फायर कंट्रोल सिस्टम लॉन्च से पहले लक्ष्य को लॉक करने में मदद करता है। इसका मतलब यह है कि एक बार लक्ष्य लॉक हो जाने के बाद मिसाइल स्वतः ही उसे ट्रैक करती रहती है और ऑपरेटर को बीच में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं पड़ती।
यह सुविधा सैनिकों को तेजी से स्थिति बदलने और अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने का मौका देती है, जो युद्ध के दौरान बेहद अहम होती है।
टैंडम वारहेड की घातक शक्ति
इस एंटी-टैंक मिसाइल में टैंडम वारहेड का इस्तेमाल किया गया है, जो आधुनिक टैंकों के मल्टी-लेयर कवच को भेदने में सक्षम है। पहले विस्फोट से टैंक की बाहरी सुरक्षा प्रणाली निष्क्रिय होती है और दूसरे विस्फोट से मुख्य कवच को भेद दिया जाता है।
इस तकनीक के कारण यह मिसाइल दुश्मन के सबसे उन्नत टैंकों के लिए भी गंभीर खतरा बन जाती है।
प्रोपल्शन सिस्टम और उड़ान क्षमता
मिसाइल का प्रोपल्शन सिस्टम उसे आवश्यक शक्ति प्रदान करता है, जिससे वह तेजी से लक्ष्य तक पहुंच सके। यह सिस्टम मिसाइल की रेंज और गति को संतुलित करता है, ताकि वह अधिकतम प्रभाव के साथ हमला कर सके।
इसकी उड़ान प्रोफाइल को इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह दुश्मन के डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सके।
सैनिकों के लिए हाई-परफॉर्मेंस साइटिंग सिस्टम
इस मिसाइल में एक उच्च प्रदर्शन वाला साइटिंग सिस्टम भी शामिल है, जो सैनिकों को लक्ष्य को जल्दी पहचानने और निशाना लगाने में मदद करता है। यह सिस्टम ऑपरेटर के प्रशिक्षण समय को कम करता है और युद्ध के दौरान तेजी से प्रतिक्रिया देने में सहायक होता है।
कई प्रयोगशालाओं का संयुक्त प्रयास
इस मिसाइल के विकास में केवल एक प्रयोगशाला ही नहीं, बल्कि देश की कई प्रमुख रक्षा अनुसंधान इकाइयों का योगदान रहा है। हैदराबाद स्थित रिसर्च सेंटर इमेरेट, चंडीगढ़ की टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी, पुणे की हाई एनर्जी मैटेरियल्स रिसर्च लेबोरेटरी और देहरादून की इंस्ट्रूमेंट्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट ने मिलकर इस परियोजना को सफल बनाया है।
यह सहयोग भारत की वैज्ञानिक क्षमता और टीमवर्क की मिसाल पेश करता है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
यह मिसाइल परीक्षण आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। स्वदेशी हथियार प्रणालियों के विकास से न केवल विदेशी निर्भरता कम होती है, बल्कि देश की रणनीतिक स्वतंत्रता भी बढ़ती है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी मिसाइलें भविष्य में भारतीय सेना की ताकत को कई गुना बढ़ा सकती हैं।
भविष्य के युद्धों में भूमिका
आधुनिक युद्ध अब केवल संख्या का खेल नहीं रह गया है, बल्कि तकनीक और सटीकता की लड़ाई बन चुका है। इस तरह की मिसाइलें सीमित संसाधनों के साथ भी बड़े सैन्य प्रभाव डालने में सक्षम होती हैं।
harigeet pravaah के अनुसार, यह परीक्षण भारत की रक्षा रणनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है, जहां स्वदेशी तकनीक और नवाचार को प्राथमिकता दी जा रही है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अहम उपलब्धि
इस मिसाइल का सफल परीक्षण यह साबित करता है कि भारत अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए लगातार मजबूत हो रहा है। यह न केवल सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इससे देश के नागरिकों में भी सुरक्षा और विश्वास की भावना मजबूत होती है।
आने वाले समय में जब यह मिसाइल सेना में शामिल होगी, तब यह दुश्मन के टैंकों के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरेगी।
