साल 2026 की शुरुआत के साथ ही देशभर के नौकरीपेशा और मध्यम वर्ग के टैक्सपेयर्स की नजरें आने वाले केंद्रीय बजट पर टिकी हुई हैं। हर साल की तरह इस बार भी यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार आयकर स्लैब में कुछ राहत दे सकती है। हालांकि, बजट से पहले भी टैक्स बचाने के कई ऐसे कानूनी रास्ते मौजूद हैं, जिनके जरिए लाखों रुपये की सैलरी को भी पूरी तरह टैक्स फ्री बनाया जा सकता है।

अधिकांश लोगों को यह लगता है कि नई टैक्स व्यवस्था अपनाने के बाद टैक्स बचाने के विकल्प लगभग खत्म हो गए हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। वास्तव में, नई टैक्स व्यवस्था में भी कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जिनका सही तरीके से उपयोग करने पर 14 से 15 लाख रुपये तक की सालाना सैलरी पर भी इनकम टैक्स नहीं देना पड़ता।
नई टैक्स व्यवस्था को लेकर फैली सबसे बड़ी गलतफहमी
जब सरकार ने नई टैक्स व्यवस्था लागू की थी, तब इसका मुख्य उद्देश्य टैक्स सिस्टम को सरल बनाना था। इसमें कई छूट और डिडक्शन हटा दिए गए, लेकिन इसके बदले टैक्स स्लैब को अपेक्षाकृत आसान बनाया गया। इसी वजह से बहुत से लोग यह मान बैठे कि नई टैक्स व्यवस्था में टैक्स बचाने का कोई खास तरीका नहीं बचा है।
हकीकत यह है कि नई टैक्स व्यवस्था में भी कुछ सीमित लेकिन बेहद प्रभावी छूट दी जाती है। इनमें सबसे अहम है स्टैंडर्ड डिडक्शन, जो अब 75,000 रुपये कर दिया गया है। यह छूट इनकम टैक्स एक्ट, 1961 के सेक्शन 115BAC(1A)(iii) के तहत दी जाती है।
इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आपकी सालाना सैलरी 12 लाख रुपये है, तो आपको कोई टैक्स नहीं देना होगा। वहीं अगर आपकी सैलरी 12 लाख 75 हजार रुपये तक है, तब भी आप टैक्स के दायरे से बाहर रह सकते हैं।
12.75 लाख से ऊपर की सैलरी वालों के लिए क्या विकल्प हैं
अब सवाल उठता है कि अगर आपकी सैलरी 12.75 लाख रुपये से ज्यादा है, तो क्या आपको टैक्स देना ही पड़ेगा। जवाब है नहीं। अगर आप सही रणनीति अपनाते हैं और आपकी कंपनी कुछ खास सुविधाएं देती है, तो आप लगभग 14.66 लाख रुपये तक की सैलरी को भी टैक्स फ्री बना सकते हैं।
इस रणनीति की सबसे बड़ी ताकत है एम्प्लॉयर यानी कंपनी का योगदान। नई टैक्स व्यवस्था में कर्मचारी द्वारा किए गए निवेश पर ज्यादातर छूट नहीं मिलती, लेकिन एम्प्लॉयर के योगदान पर मिलने वाली टैक्स छूट अभी भी पूरी तरह लागू है।
EPF और NPS का रोल क्यों है सबसे अहम
नई टैक्स व्यवस्था में एम्प्लॉई प्रोविडेंट फंड और नेशनल पेंशन सिस्टम को लेकर एक अहम फर्क है। कर्मचारी द्वारा EPF या NPS में जमा की गई रकम पर नई टैक्स व्यवस्था में कोई अतिरिक्त छूट नहीं मिलती। यह सुविधा पुरानी टैक्स व्यवस्था में थी।
लेकिन एम्प्लॉयर का योगदान एक अलग श्रेणी में आता है। कानून के अनुसार, अगर आपकी कंपनी आपकी बेसिक सैलरी और महंगाई भत्ते का एक निश्चित प्रतिशत EPF और NPS में जमा करती है, तो वह रकम आपकी टैक्सेबल इनकम में नहीं जोड़ी जाती।
EPF में एम्प्लॉयर योगदान की टैक्स स्थिति
EPF के मामले में एम्प्लॉयर आपकी बेसिक सैलरी और डियरनेस अलाउंस का 12 प्रतिशत तक योगदान करता है। यह योगदान पुरानी और नई दोनों टैक्स व्यवस्थाओं में टैक्स फ्री रहता है, बशर्ते कुल एम्प्लॉयर योगदान की सीमा 7.5 लाख रुपये सालाना से ज्यादा न हो।
यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि बहुत अधिक सैलरी वाले लोग इस छूट का गलत इस्तेमाल न कर सकें। लेकिन मिडल क्लास और अपर मिडल क्लास कर्मचारियों के लिए यह एक बेहद फायदेमंद प्रावधान है।
NPS में एम्प्लॉयर योगदान से कैसे मिलती है बड़ी राहत
नेशनल पेंशन सिस्टम यानी NPS के मामले में एम्प्लॉयर का योगदान और भी ज्यादा फायदेमंद है। यहां एम्प्लॉयर आपकी बेसिक सैलरी और डियरनेस अलाउंस का 14 प्रतिशत तक योगदान कर सकता है। यह योगदान भी पुरानी और नई दोनों टैक्स व्यवस्थाओं में पूरी तरह टैक्स फ्री होता है।
इसका मतलब यह है कि अगर आपकी कंपनी NPS में योगदान की सुविधा देती है, तो आपकी टैक्सेबल इनकम काफी हद तक कम हो सकती है।
15 लाख की सैलरी को टैक्स फ्री बनाने का पूरा गणित
मान लीजिए आपकी कुल सालाना सैलरी 14.66 लाख रुपये है। आमतौर पर इतनी सैलरी पर टैक्स देना तय माना जाता है, लेकिन सही स्ट्रक्चर के साथ स्थिति पूरी तरह बदल सकती है।
अगर आपकी बेसिक सैलरी कुल सैलरी का लगभग 50 प्रतिशत यानी 7.33 लाख रुपये है, तो आपका एम्प्लॉयर EPF में इसका 12 प्रतिशत यानी लगभग 87,960 रुपये जमा करता है। यह पूरी रकम टैक्स फ्री होती है।
इसी तरह, आपका एम्प्लॉयर NPS में आपकी बेसिक सैलरी का 14 प्रतिशत यानी करीब 1,02,620 रुपये जमा करता है। यह रकम भी टैक्सेबल इनकम में नहीं जोड़ी जाती।
इसके अलावा, नई टैक्स व्यवस्था के तहत आपको 75,000 रुपये का स्टैंडर्ड डिडक्शन मिलता है।
इन तीनों को जोड़ें, तो आपकी कुल टैक्स छूट 2.65 लाख रुपये से ज्यादा हो जाती है। इस तरह आपकी प्रभावी टैक्सेबल इनकम इतनी कम रह जाती है कि आपकी पूरी सैलरी पर टैक्स नहीं लगता।
अगर कंपनी सिर्फ EPF देती है, तब क्या होगा
अगर आपकी कंपनी EPF की सुविधा तो देती है लेकिन NPS में योगदान नहीं करती, तब भी आप टैक्स बचा सकते हैं। ऐसी स्थिति में आप करीब 13.56 लाख रुपये तक की सैलरी को नई टैक्स व्यवस्था में टैक्स फ्री बना सकते हैं।
हालांकि, NPS की सुविधा होने पर टैक्स बचत और ज्यादा हो जाती है। इसलिए नौकरीपेशा लोगों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे अपनी कंपनी की सैलरी स्ट्रक्चर और रिटायरमेंट बेनिफिट्स को ध्यान से समझें।
टैक्स बचत के साथ रिटायरमेंट प्लानिंग का बड़ा फायदा
EPF और NPS सिर्फ टैक्स बचाने के साधन नहीं हैं। ये दोनों योजनाएं लंबे समय में एक मजबूत रिटायरमेंट फंड तैयार करती हैं।
अगर कोई 25 साल की उम्र में NPS में हर महीने 10,000 रुपये जमा करना शुरू करता है और हर साल इस राशि को 5 प्रतिशत बढ़ाता है, तो 60 साल की उम्र तक उसे करीब 12 प्रतिशत सालाना रिटर्न मानें तो उसका फंड 8.62 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
इसी तरह EPF में अगर कोई 25 साल की उम्र से हर महीने 10,000 रुपये जमा करता है, हर साल 5 प्रतिशत की बढ़ोतरी करता है और औसतन 8.25 प्रतिशत ब्याज मिलता है, तो उसका कुल फंड करीब 4 करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है।
नई टैक्स व्यवस्था किसके लिए ज्यादा फायदेमंद
नई टैक्स व्यवस्था उन लोगों के लिए खास तौर पर फायदेमंद है, जिनकी सैलरी स्ट्रक्चर सही तरीके से बनाई गई है और जिनकी कंपनियां EPF और NPS दोनों में योगदान करती हैं।
यह व्यवस्था उन कर्मचारियों के लिए भी बेहतर है, जो टैक्स प्लानिंग के साथ-साथ लंबी अवधि की वित्तीय सुरक्षा चाहते हैं। harigeet pravaah के अनुसार, आने वाले समय में अधिकतर सैलरीड क्लास इसी मॉडल को अपनाएगी।
निष्कर्ष
15 लाख रुपये की सैलरी पर टैक्स देना अब मजबूरी नहीं है। अगर आप नई टैक्स व्यवस्था के नियमों को समझते हैं और अपनी सैलरी स्ट्रक्चर को सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं, तो आप पूरी तरह कानूनी तरीके से टैक्स बचा सकते हैं।
EPF, NPS और स्टैंडर्ड डिडक्शन जैसे प्रावधान न केवल टैक्स बचाते हैं, बल्कि आपके भविष्य को भी सुरक्षित बनाते हैं। बजट का इंतजार करने से पहले ही ये रणनीति अपनाकर आप साल 2026 में अपनी टैक्स प्लानिंग को एक नई दिशा दे सकते हैं।
