भारत जैसे बहुलतावादी समाज में इतिहास केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की राजनीति, विचारधारा और सामाजिक चेतना से गहराई से जुड़ा विषय है। जब भी इतिहास के किसी विवादास्पद पात्र या कालखंड पर नई दृष्टि से चर्चा करने का प्रयास होता है, तो वह केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित नहीं रहता। भोपाल में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में ऐसा ही एक प्रसंग सामने आया, जहां मुगल शासक बाबर पर लिखी गई एक नई पुस्तक पर होने वाली परिचर्चा विवादों और धमकियों के चलते रद्द करनी पड़ी।

यह घटना केवल एक कार्यक्रम के रद्द होने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ऐतिहासिक शोध की सीमाएं, सांस्कृतिक असहिष्णुता और राज्य की भूमिका जैसे कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए। पुस्तक के लेखक आभास मलदहियार ने इस पूरे घटनाक्रम के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है, जिससे यह मामला अब स्थानीय विवाद से आगे बढ़कर राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गया है।
भोपाल में उठा बाबर पर नया विवाद
प्रदेश की राजधानी भोपाल में जनवरी के दूसरे सप्ताह एक प्रतिष्ठित साहित्यिक आयोजन के दौरान बाबर पर लिखी पुस्तक “बाबर: द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान” चर्चा के केंद्र में आ गई। इस पुस्तक पर प्रस्तावित परिचर्चा का उद्देश्य बाबर के इतिहास को नए संदर्भों में देखने और उससे जुड़े कुछ विवादित दस्तावेज़ों की आलोचनात्मक जांच करना था।
हालांकि कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही कुछ हिंदू संगठनों ने इस परिचर्चा का विरोध शुरू कर दिया। उनका आरोप था कि पुस्तक में मुगल आक्रांता बाबर का महिमामंडन किया गया है। विरोध केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आयोजकों और लेखक को धमकियां मिलने लगीं। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि अंततः सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए परिचर्चा को रद्द करने का निर्णय लेना पड़ा।
संस्कृति मंत्री की आपत्ति और बढ़ता दबाव
इस पूरे विवाद में प्रदेश के संस्कृति मंत्री की आपत्ति ने स्थिति को और जटिल बना दिया। संस्कृति विभाग इस साहित्यिक आयोजन के आयोजकों में शामिल था, ऐसे में मंत्री की आपत्ति को गंभीर संकेत के रूप में देखा गया। आयोजकों पर राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ता चला गया।
हिंदू संगठनों की ओर से न केवल परिचर्चा के विरोध में प्रदर्शन किया गया, बल्कि आयोजकों और लेखक के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग करते हुए तहरीर भी सौंपी गई। इससे यह स्पष्ट हो गया कि मामला केवल वैचारिक असहमति का नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था और सुरक्षा से भी जुड़ गया है।
परिचर्चा रद्द होने का निर्णय
कार्यक्रम के आयोजकों के अनुसार, उनकी प्राथमिक चिंता अतिथि वक्ताओं और लेखक की सुरक्षा थी। पुलिस की ओर से यह सूचना दी गई थी कि आयोजन स्थल पर तोड़फोड़ या लेखक पर शारीरिक हमले की आशंका है। ऐसे हालात में आयोजकों ने आभास मलदहियार के पूर्व निर्धारित सत्र को रद्द करने का निर्णय लिया।
यह निर्णय आयोजकों के लिए आसान नहीं था, क्योंकि भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल एक गैर-राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर का साहित्यिक मंच माना जाता है। यहां आमतौर पर विविध विचारधाराओं के लेखक और वक्ता बिना किसी भय के अपने विचार रखते हैं। लेकिन इस बार हालात सामान्य नहीं थे।
लेखक आभास मलदहियार की प्रतिक्रिया
परिचर्चा रद्द होने के बाद पुस्तक के लेखक आभास मलदहियार ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी पुस्तक का उद्देश्य बाबर का महिमामंडन करना नहीं है। उनका कहना है कि यह पुस्तक इतिहास की एक बड़ी जालसाजी को उजागर करने का प्रयास करती है, जिसे लंबे समय तक तथ्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।
आभास मलदहियार के अनुसार, जिस मुद्दे पर परिचर्चा प्रस्तावित थी, वह तथाकथित “भोपाल वसीयतनामा” था। यह उन्नीसवीं शताब्दी की एक ऐसी ऐतिहासिक जालसाजी है, जिसे बाबर की वसीयत बताकर प्रस्तुत किया गया और उसके माध्यम से बाबर को हिंदुओं के प्रति सहिष्णु शासक के रूप में दिखाने की कोशिश की गई।
क्या है ‘भोपाल वसीयतनामा’ विवाद
भोपाल वसीयतनामा को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। बीसवीं सदी के मध्य, विशेषकर 1960 के दशक में, वाराणसी के प्रोफेसर रामगोपाल पांडेय ने अपने कुछ लेखों में दावा किया था कि भोपाल रियासत के अभिलेखों में बाबर का एक फरमान मौजूद है। इस फरमान में कथित तौर पर बाबर ने अपने पुत्र हुमायूं को निर्देश दिया था कि वह अयोध्या, काशी और ग्वालियर के कुछ मंदिरों को दान दे।
इन दावों का उपयोग बाद में बाबर को धार्मिक रूप से सहिष्णु और उदार शासक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया गया। हालांकि, यह फरमान कभी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया। न तो बाबर की आत्मकथा में इसका कोई उल्लेख मिलता है और न ही उसके समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों में।
इसी कारण इतिहास की मुख्यधारा में इस तथाकथित वसीयतनामे को कभी मान्यता नहीं मिली। कई इतिहासकारों ने इसे एक जालसाजी बताया, लेकिन इसके बावजूद यह दावा लंबे समय तक कुछ वैचारिक हलकों में प्रचारित होता रहा।
लेखक का दावा: जालसाजी को उजागर करने का प्रयास
आभास मलदहियार का कहना है कि उनकी पुस्तक इसी ऐतिहासिक जालसाजी की पड़ताल करती है। उनके अनुसार, बाबर को सहिष्णु साबित करने के लिए जिस दस्तावेज़ का सहारा लिया गया, वह प्रमाणिक नहीं है और उसे बिना ठोस सबूतों के इतिहास का हिस्सा बनाने की कोशिश की गई।
लेखक का यह भी कहना है कि परिचर्चा रद्द कर उन लोगों ने एक महत्वपूर्ण बौद्धिक अवसर को नष्ट कर दिया, जिसमें भोपाल में जन्मी इस कथित ऐतिहासिक जालसाजी पर गंभीर चर्चा हो सकती थी। उनका आरोप है कि विरोध करने वाले कई लोग बिना पुस्तक का एक पन्ना पढ़े ही निष्कर्ष पर पहुंच गए।
प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
इस पूरे घटनाक्रम के बाद आभास मलदहियार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने न केवल अपने पक्ष को रखा, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ऐतिहासिक शोध के अधिकार पर भी सवाल उठाए।
पत्र में उन्होंने लिखा कि जो लोग बाबर का विरोध करने का दावा करते हैं, वे शायद यह भी नहीं समझते कि उन्हें इस वैचारिक संघर्ष के औजार कौन उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि प्रधानमंत्री इस मामले का संज्ञान लेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि इतिहास और सभ्यता पर वर्षों तक शोध करने वाले लोगों के मार्ग में केवल शोर मचाने वाले तत्व बाधा न बनें।
हिंदू संगठनों के आरोप
विवाद का दूसरा पक्ष हिंदू संगठनों का है, जिनका आरोप है कि यह पुस्तक बाबर जैसे मुगल आक्रांता का महिमामंडन करती है। उनका कहना है कि ऐसे साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से इतिहास को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे समाज में भ्रम फैलता है।
इन संगठनों का यह भी दावा है कि संस्कृति विभाग जैसे सरकारी संस्थानों को ऐसे आयोजनों से दूरी बनानी चाहिए। हालांकि लेखक और आयोजक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं।
आयोजकों की दुविधा और जिम्मेदारी
भोपाल लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों के सामने इस पूरे विवाद के दौरान एक कठिन स्थिति थी। एक ओर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्यिक विमर्श की प्रतिबद्धता थी, तो दूसरी ओर प्रतिभागियों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की चिंता।
आयोजकों के अनुसार, पुलिस की ओर से संभावित हिंसा की चेतावनी मिलने के बाद उनके पास सत्र रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय वैचारिक दबाव में नहीं, बल्कि सुरक्षा कारणों से लिया गया।
कौन हैं आभास मलदहियार
आभास मलदहियार पेशे से वास्तुकार हैं और इंडियन हिस्टोरिकल एंड कल्चरल रिसर्च से जुड़े संस्थापक सदस्यों में शामिल हैं। वे इतिहास को नए दृष्टिकोण से देखने के लिए जाने जाते हैं।
“बाबर: द क्वेस्ट फॉर हिंदुस्तान” के अलावा उन्होंने “मोदी अगेन”, “बाबर: द चेसबोर्ड किंग” और “हिटलर: द प्रोक्लेम्ड मसीहा ऑफ पेलेस्टेनियन कॉज” जैसी चर्चित पुस्तकें भी लिखी हैं। इन पुस्तकों में वे ऐतिहासिक और राजनीतिक विषयों को पारंपरिक धारणाओं से अलग नजरिए से प्रस्तुत करते हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल
भोपाल की यह घटना एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि क्या भारत में इतिहास पर खुली और आलोचनात्मक चर्चा के लिए पर्याप्त स्थान बचा है। जब किसी पुस्तक पर चर्चा केवल आशंकाओं और आरोपों के आधार पर रद्द कर दी जाती है, तो यह अकादमिक स्वतंत्रता के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
यह मामला यह भी दर्शाता है कि साहित्यिक और बौद्धिक मंचों पर बढ़ता दबाव किस तरह विचारों के आदान-प्रदान को सीमित कर सकता है।
निष्कर्ष: इतिहास, भय और भविष्य
भोपाल में बाबर पर लिखी पुस्तक की परिचर्चा का रद्द होना केवल एक कार्यक्रम का अंत नहीं है। यह उस बड़े सवाल का प्रतीक है, जहां इतिहास, राजनीति और सामाजिक भावनाएं आपस में टकरा रही हैं। लेखक की प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप की मांग इस उम्मीद को दर्शाती है कि शायद इस विवाद से कोई सकारात्मक संवाद जन्म ले सके।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या ऐसे विवाद इतिहास पर गंभीर और तथ्यात्मक चर्चा को और कठिन बनाएंगे या समाज को अधिक परिपक्व संवाद की दिशा में ले जाएंगे।
