हर नया साल अर्थव्यवस्था और निवेश जगत के लिए नई उम्मीदें लेकर आता है। 2026 की शुरुआत भी कुछ ऐसी ही उम्मीदों के साथ हुई थी। वैश्विक स्तर पर यह संकेत मिल रहे थे कि निवेशक अमेरिका और ताइवान जैसे विकसित बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निवेश के बाद अब उभरते बाजारों की ओर रुख कर सकते हैं। लेकिन इन सभी अनुमानों के उलट भारत ऐसा बाज़ार बनकर उभरा, जहां से विदेशी निवेशक लगातार दूरी बना रहे हैं।

बीते एक साल के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार में शुद्ध रूप से बिकवाली कर रहे हैं। वर्ष 2025 के अंत तक लगभग 1.6 लाख करोड़ रुपये की पूंजी भारतीय बाजार से बाहर निकल चुकी है। यह निकासी केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई गहरे आर्थिक, वैश्विक और सेक्टोरल कारण छिपे हुए हैं।
क्यों भारत फिलहाल विदेशी निवेशकों की पहली पसंद नहीं रहा
पिछले कुछ वर्षों में भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में गिना गया है। मजबूत मैक्रो-इकोनॉमिक संकेतक, स्थिर सरकार, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और खपत आधारित ग्रोथ भारत की पहचान रही है। इसके बावजूद मौजूदा समय में विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से दूरी बनाए हुए हैं।
इसका एक बड़ा कारण भारतीय बाजार का महंगा मूल्यांकन है। यदि वैल्यूएशन के आंकड़ों पर नजर डालें तो MSCI इंडिया डॉलर इंडेक्स का प्राइस-अर्निंग मल्टीपल लगभग 26 गुना है। इसकी तुलना में MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स का P/E करीब 17 गुना और MSCI ऑल कंट्री वर्ल्ड इंडेक्स का P/E लगभग 23 गुना है। यह अंतर साफ दर्शाता है कि भारत अन्य उभरते बाजारों की तुलना में कहीं अधिक महंगा दिखाई देता है।
विदेशी निवेशक जब किसी बाजार में प्रवेश करते हैं तो वे सिर्फ ग्रोथ की कहानी नहीं देखते, बल्कि वैल्यूएशन और भविष्य की कमाई की संभावनाओं को भी समान महत्व देते हैं। भारत के मामले में यही संतुलन फिलहाल बिगड़ा हुआ नजर आ रहा है।
कमाई की रफ्तार और ग्रोथ की वास्तविकता
भारतीय कंपनियों की कमाई में वह तेजी नहीं दिख रही है, जिसकी उम्मीद बाजार के ऊंचे मूल्यांकन के आधार पर की जा रही थी। कई सेक्टर्स में मांग कमजोर बनी हुई है और निजी निवेश यानी कैपेक्स में भी अपेक्षित तेजी नहीं आई है। इसका असर कॉरपोरेट अर्निंग्स पर साफ दिखाई देता है।
पिछले एक साल में MSCI इंडिया इंडेक्स ने लगभग 4.3 प्रतिशत का रिटर्न दिया है, जबकि इसी अवधि में MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स ने करीब 34 प्रतिशत की शानदार बढ़त दर्ज की है। यह अंतर विदेशी निवेशकों के निर्णयों को प्रभावित करने वाला एक बड़ा फैक्टर बन गया है।
वैश्विक स्तर पर बदलते निवेश ट्रेंड
भारत से पूंजी निकलने की कहानी केवल घरेलू कारणों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे वैश्विक आर्थिक परिदृश्य की भी बड़ी भूमिका है। अमेरिका में ब्याज दरें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं, जिससे डॉलर मजबूत हुआ है और उभरते बाजारों से पूंजी बाहर जाने का दबाव बढ़ा है।
इसके अलावा अमेरिकी टैरिफ नीति को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी निवेशकों को सतर्क कर दिया है। निवेशक फिलहाल उन सेक्टर्स की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं, जहां ग्रोथ की संभावना स्पष्ट और तात्कालिक दिखाई देती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग ऐसे ही क्षेत्र हैं।
एआई की लहर और अमेरिका-ताइवान की बढ़त
वर्तमान समय में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वैश्विक निवेश का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। अनुमान है कि एआई से जुड़ा कैपिटल एक्सपेंडिचर 2025 में 400 अरब डॉलर से बढ़कर 2026 में 527 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इस निवेश का बड़ा हिस्सा अमेरिका और ताइवान जैसे बाजारों में जा रहा है।
ताइवान की सेमीकंडक्टर कंपनियां, अमेरिकी टेक दिग्गज और वैश्विक ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स इस एआई बूम के सबसे बड़े लाभार्थी हैं। इसके मुकाबले भारत अभी इस वैश्विक एआई निवेश चक्र का प्रमुख हिस्सा नहीं बन पाया है, जिससे विदेशी निवेशक फिलहाल भारतीय बाजार को नजरअंदाज कर रहे हैं।
ईटीएफ और उभरते बाजारों की नई तस्वीर
हालांकि भारत से पैसा निकल रहा है, लेकिन उभरते बाजारों में निवेश पूरी तरह रुका नहीं है। पिछले एक साल में उभरते बाजारों के ईटीएफ में लगभग 38.9 अरब डॉलर का निवेश हुआ है। इस निवेश का बड़ा हिस्सा चीन, ताइवान और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में गया है।
MSCI इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में चीन का वजन लगभग 28 प्रतिशत, ताइवान का 21 प्रतिशत और भारत का केवल 15 प्रतिशत है। इस इंडेक्स की शीर्ष कंपनियां मुख्य रूप से एआई, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी से जुड़ी हुई हैं। भारत की बड़ी कंपनियों का वजन इस इंडेक्स में अपेक्षाकृत कम है, जिससे विदेशी फंड फ्लो पर असर पड़ रहा है।
क्या भारत के लिए उम्मीद खत्म हो गई है
इन तमाम नकारात्मक संकेतों के बावजूद भारत को लेकर पूरी तरह निराशा की तस्वीर नहीं है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह विदेशी निवेशकों के लिए एक अस्थायी ठहराव का दौर है। आने वाली तिमाहियों में कॉरपोरेट अर्निंग्स में सुधार और व्यापक सेक्टरल रिकवरी के संकेत मिल सकते हैं।
अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में कंपनियों की कमाई पिछले कई तिमाहियों की तुलना में बेहतर रह सकती है। बैंकिंग, टेक्नोलॉजी और कंजम्पशन से जुड़े क्षेत्रों में धीरे-धीरे मांग लौटने के संकेत दिख रहे हैं। यदि वैश्विक ब्याज दरों में नरमी आती है और भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में स्पष्टता बढ़ती है, तो विदेशी निवेशकों की वापसी संभव है।
आगे का रास्ता क्या हो सकता है
भारतीय बाजार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी ग्रोथ स्टोरी को वास्तविक कमाई और संतुलित वैल्यूएशन के साथ पेश करे। जब तक बाजार महंगा बना रहेगा और कमाई में तेज़ सुधार नहीं दिखेगा, तब तक विदेशी निवेशक सतर्क रहेंगे।
हालांकि भारत की दीर्घकालिक विकास संभावनाएं अब भी मजबूत हैं। जनसांख्यिकीय लाभ, डिजिटल अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और घरेलू खपत भारत को आने वाले वर्षों में फिर से विदेशी पूंजी के लिए आकर्षक बना सकते हैं। फिलहाल यह दौर धैर्य और संतुलन का है, जहां निवेशक सही समय का इंतजार कर रहे हैं।
