अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 13 जनवरी 2026 को एक ऐतिहासिक और प्रभावशाली कदम उठाते हुए मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। यह निर्णय वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य में व्यापक प्रभाव डालने वाला है। मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसे अरबी में जमात अल-इखवान अल-मुस्लिमीन कहा जाता है, अरब देशों में फैला एक कट्टर सुन्नी इस्लामी आंदोलन है। इस संगठन की स्थापना 1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने की थी। हसन अल-बन्ना, जो एक स्कूल टीचर से मजहबी नेता बने, का मानना था कि इस्लामी विचारधारा ही शासन का आधार होनी चाहिए और पूरी दुनिया में शरिया कानून स्थापित होना चाहिए।

मुस्लिम ब्रदरहुड का इतिहास और उद्भव
मुस्लिम ब्रदरहुड का इतिहास राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों से शुरू हुआ। शुरुआती दिनों में यह संगठन सामाजिक सुधार और शिक्षा पर केंद्रित था, लेकिन धीरे-धीरे इसका प्रभाव राजनीतिक और हिंसक गतिविधियों तक फैल गया। संगठन ने ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और इजरायल के खिलाफ कई हथियारबंद लड़ाइयाँ लड़ीं। 1948 में मिस्र के प्रधानमंत्री महमूद फहमी अल-नोकराशी की हत्या के पीछे भी इस संगठन का हाथ माना जाता है। अल-बन्ना की काहिरा में हत्या कर दी गई, लेकिन संगठन ने लगातार अपनी गतिविधियाँ जारी रखीं।
विचारधारा और वैश्विक विस्तार
मुस्लिम ब्रदरहुड का प्रमुख सिद्धांत यह है कि इस्लाम ही शासन का समाधान है। इस विचारधारा ने अरब और मुस्लिम दुनिया में व्यापक प्रभाव डाला। संगठन ने चुनाव और राजनीतिक मंचों के माध्यम से भी इस्लामी शासन स्थापित करने की कोशिश की। 2011 के अरब स्प्रिंग के दौरान इसकी राजनीतिक शाखा, फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी, मिस्र में सत्ता में आई और 2012 में मोहम्मद मुर्सी राष्ट्रपति बने। लेकिन 2013 में मिस्र की सेना ने उनका सत्ता से पतन किया और संगठन के कई नेताओं को जेल में डाल दिया गया।
मिस्र में अब्देल-फतह अल-सिसी ने मुस्लिम ब्रदरहुड को गैर कानूनी कर आतंकवादी संगठन घोषित किया। आज भी संगठन के कई वरिष्ठ नेता जेल में हैं या विदेशों में रह रहे हैं। इस संगठन के कई सदस्य हिंसक गतिविधियों में शामिल रहे हैं, जबकि कुछ नेता अब शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से अपने लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं।
अमेरिकी बैन और इसके मायने
डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले का प्रभाव तत्काल और व्यापक है। अमेरिकी बैन के तहत मुस्लिम ब्रदरहुड की लेबनानी, जॉर्डनियन और मिस्र की शाखाओं को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया है। इसका उद्देश्य संगठन की वैश्विक गतिविधियों पर अंकुश लगाना और उसकी वित्तीय तथा राजनीतिक सहयोग प्रणाली को प्रभावित करना है। यह निर्णय ट्रांसनेशनल सुन्नी इस्लामी समूहों के लिए चेतावनी है कि हिंसा और आतंकवाद को सहन नहीं किया जाएगा।
UAE और सऊदी अरब की प्रतिक्रिया
संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने अमेरिकी बैन का स्वागत किया। लंबे समय से ये दोनों देश मुस्लिम ब्रदरहुड के कट्टर विरोधी रहे हैं। इन देशों के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड का अस्तित्व आंतरिक स्थिरता और सुरक्षा के लिए खतरा था। अमेरिका के इस कदम से UAE और सऊदी अरब के लिए संगठन का प्रभाव घटने की उम्मीद है और उनकी आंतरिक सुरक्षा मजबूत होगी।
तुर्की के लिए राजनीतिक झटका
तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थक माने जाते हैं। अमेरिका का यह बैन तुर्की के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका है। यह उनके क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नई चुनौतियाँ पैदा कर सकता है। मुस्लिम ब्रदरहुड का राजनीतिक प्रभाव तुर्की और अन्य देशों में इसके समर्थकों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकता है।
मुस्लिम ब्रदरहुड का वैश्विक विस्तार
मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखाएँ मिस्र, जॉर्डन, लीबिया, लेबनान और अन्य अरब देशों में फैली हुई हैं। इसके अलावा दुनिया के कई हिस्सों में इसके समर्थक मौजूद हैं, लेकिन अधिकांश कानूनी कार्रवाई या सुरक्षा कारणों से छिपकर कार्य करते हैं। लेबनान में इसकी शाखा को विदेशी आतंकवादी संगठन (FTO) घोषित किया गया है। मिस्र और जॉर्डन में इसकी शाखाएँ हमास के समर्थन और सहयोग के लिए वैश्विक आतंकवादी (SDGT) घोषित हैं।
संगठन के पतन और पुनः उदय
मिस्र में होस्नी मुबारक के शासनकाल के दौरान मुस्लिम ब्रदरहुड पर सख्त नियंत्रण और प्रतिबंध लगे रहे। इसके बावजूद 2005 तक यह संगठन सबसे मजबूत विपक्षी दल बन गया। 2011 के अरब स्प्रिंग के बाद यह सत्ता में आया, लेकिन ज्यादा दिन नहीं चला। सेना ने 2013 में इसे सत्ता से हटाया और कड़ी कार्रवाई की। आज भी मुस्लिम ब्रदरहुड का अधिकांश नेतृत्व जेल में है या देश से बाहर है।
भविष्य की चुनौतियाँ
अमेरिकी बैन के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड को वैश्विक स्तर पर अपनी गतिविधियों को सीमित करना पड़ेगा। इसके समर्थक देशों और क्षेत्रीय शक्तियों को अब संगठन के साथ सीधे संबंध बनाने में राजनीतिक जोखिम का सामना करना होगा। UAE और सऊदी अरब के लिए यह निर्णय उनके आंतरिक स्थिरता और सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। वहीं तुर्की और इसके समर्थकों के लिए यह निर्णय राजनीतिक और कूटनीतिक चुनौती पेश करता है।
