भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में मतदाता सूची की शुद्धता को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यही वह आधार है जिस पर नागरिकों के मतदान के अधिकार की रक्षा टिकी होती है। इसी संवेदनशील मुद्दे को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखकर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। यह पत्र कोई पहला प्रयास नहीं है, बल्कि इससे पहले भी वह चार बार इस विषय पर चुनाव आयोग का ध्यान आकृष्ट करा चुकी हैं। ताजा पत्र में उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन प्रक्रिया और 2002 की पुरानी मतदाता सूची के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए डिजिटलीकरण को लेकर कई बुनियादी सवाल उठाए हैं।

मुख्यमंत्री का कहना है कि तकनीक के इस्तेमाल का उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए, न कि योग्य और वास्तविक मतदाताओं को संदेह के घेरे में खड़ा करना। उनके अनुसार, AI के जरिए पुरानी मतदाता सूची को स्कैन और डिजिटल रूप में परिवर्तित करने की प्रक्रिया में व्यापक स्तर पर त्रुटियां हुई हैं, जिनका सीधा असर आज के मतदाताओं पर पड़ रहा है। इससे न केवल प्रशासनिक भ्रम पैदा हो रहा है, बल्कि आम नागरिक मानसिक तनाव और अनावश्यक परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
2002 की मतदाता सूची और AI डिजिटलीकरण का विवाद
ममता बनर्जी ने अपने पत्र में विशेष रूप से 2002 की मतदाता सूची का जिक्र किया है, जिसे अब AI टूल्स के माध्यम से स्कैन कर अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया गया। उनके अनुसार, यह प्रक्रिया बेहद लापरवाही से की गई, जिसमें नामों की वर्तनी, उम्र, लिंग, रिश्तों के विवरण और अभिभावकों के नाम तक में गंभीर गलतियां दर्ज हो गईं। कई मामलों में क्षेत्रीय भाषाओं और स्थानीय नामों को सही ढंग से समझे बिना उनका अंग्रेजी अनुवाद किया गया, जिससे मूल पहचान ही बदलती नजर आई।
इन तकनीकी त्रुटियों के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं को तथाकथित ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ की श्रेणी में डाल दिया गया। इसका अर्थ यह हुआ कि ऐसे मतदाताओं को संदिग्ध मानते हुए उनसे दोबारा अपनी पहचान और पात्रता साबित करने को कहा गया, जबकि वे वर्षों से वैध रूप से मतदाता सूची में दर्ज हैं और कई चुनावों में मतदान कर चुके हैं। मुख्यमंत्री का तर्क है कि यदि किसी मतदाता का नाम पहले से मान्य सूची में शामिल रहा है और उसने निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने विवरण भी सही कराए हैं, तो उसे अचानक संदेहास्पद कैसे ठहराया जा सकता है।
SIR प्रक्रिया और सुनवाई नोटिस का मुद्दा
पत्र में एक और अहम बिंदु उठाया गया है, जो SIR के दौरान भेजे जा रहे सुनवाई नोटिस से जुड़ा है। ममता बनर्जी ने लिखा कि जिन मतदाताओं को नोटिस भेजे जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश पहले ही 2002 की मतदाता सूची से स्वयं या अपने परिजनों के माध्यम से मैप किए जा चुके हैं। ऐसे मामलों में दोबारा सुनवाई नोटिस जारी करने का कोई औचित्य नहीं बनता।
उनका कहना है कि इन नोटिसों के कारण मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि वर्षों से वैध मतदाता होने के बावजूद उन्हें अब क्यों बुलाया जा रहा है। इससे न केवल आम नागरिकों को मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है, बल्कि फील्ड में काम कर रही सरकारी टीमों को भी जनता के विरोध और नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। कई स्थानों पर मतदाता इसे बिना किसी गलती के उत्पीड़न के रूप में देख रहे हैं, जिससे प्रशासनिक कार्यवाही और अधिक जटिल हो गई है।
दस्तावेजों की रसीद न मिलना और प्रशासनिक लापरवाही
मुख्यमंत्री ने SIR प्रक्रिया के दौरान सामने आई दो बड़ी खामियों का विस्तार से उल्लेख किया है। पहली खामी दस्तावेजों की पावती से जुड़ी है। उनके अनुसार, सुनवाई के दौरान मतदाता अपनी पात्रता से संबंधित सभी जरूरी दस्तावेज जमा कर रहे हैं, लेकिन कई मामलों में उन्हें इन दस्तावेजों की कोई रसीद या लिखित पावती नहीं दी जा रही। इसके बाद जब सत्यापन या अगली सुनवाई होती है, तो यही दस्तावेज ‘रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं’ बताए जाते हैं।
इस स्थिति का परिणाम यह होता है कि दस्तावेजों के अभाव का हवाला देकर मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए जाते हैं, जबकि गलती मतदाता की नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की होती है। ममता बनर्जी ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह से गलत और अस्वीकार्य बताया है। उनके अनुसार, रसीद न देना मतदाताओं को असहाय बना देता है और उन्हें ऐसी प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होना पड़ता है, जिसका खामियाजा उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को भुगतना पड़ता है।
तकनीकी औपचारिकता बनाम विवेकपूर्ण निर्णय
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि पूरी SIR प्रक्रिया अत्यधिक तकनीकी और यांत्रिक हो गई है। इसमें विवेकपूर्ण निर्णय की जगह औपचारिकताओं ने ले ली है। अधिकारियों द्वारा मामलों को मानवीय दृष्टिकोण से देखने के बजाय केवल तकनीकी त्रुटियों के आधार पर निपटाया जा रहा है। इससे SIR का मूल उद्देश्य ही विफल होता नजर आ रहा है।
उनका स्पष्ट कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण का मकसद मतदाता सूची को शुद्ध और मजबूत बनाना होना चाहिए, न कि वास्तविक और पात्र मतदाताओं को बाहर करना। यदि प्रक्रिया के दौरान ही लोगों का भरोसा टूटने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
पिछले 23 वर्षों में हुए संशोधनों पर सवाल
पत्र में ममता बनर्जी ने एक बेहद अहम और संवैधानिक सवाल भी उठाया है। उन्होंने कहा कि पिछले 23 वर्षों में लाखों मतदाताओं ने फॉर्म-8 के जरिए अपने नाम, उम्र या अन्य विवरणों में सुधार कराया है। ये सभी सुधार विधिसम्मत सुनवाई के बाद चुनाव अधिकारियों द्वारा स्वीकृत किए गए और इसके आधार पर वे 2025 की मतदाता सूची में शामिल हैं।
इसके बावजूद, अब उन्हीं मतदाताओं से दोबारा पहचान और पात्रता साबित करने को कहा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने इसे पूरी तरह मनमाना और असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि पूरी प्रक्रिया को फिर से 2002 की स्थिति पर ले जाया जा रहा है, तो क्या इसका मतलब यह है कि पिछले दो दशकों में किए गए सभी संशोधन अवैध थे। यदि ऐसा है, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है, बल्कि मतदाता प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
नाम और पहचान से जुड़ी छोटी गलतियां, बड़ा असर
ममता बनर्जी ने यह भी रेखांकित किया कि कई मामलों में नाम या उम्र में बेहद मामूली अंतर को भी बड़ा मुद्दा बना दिया गया है। उदाहरण के तौर पर ‘केआर’ और ‘कुमार’ या ‘शेख’ और ‘एसके’ जैसे अंतर, जो सामान्यतः स्थानीय उपयोग और संक्षिप्त नामों के कारण होते हैं, उन्हें गंभीर विसंगति मान लिया गया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि ऐसी छोटी-मोटी त्रुटियों को बिना सुनवाई के, टेबल-टॉप स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि इन मामलों में सामान्य बुद्धि और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, ताकि आम नागरिकों को अनावश्यक भागदौड़ और तनाव से बचाया जा सके। आखिरकार, मतदाता सूची कोई दंडात्मक उपकरण नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी को सुनिश्चित करने का माध्यम है।
नागरिकों की पीड़ा और प्रशासनिक दबाव
पत्र के अंत में ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग से अपील की कि वह इन सभी मुद्दों पर तत्काल और गंभीरता से ध्यान दे। उन्होंने कहा कि वर्तमान स्थिति में नागरिकों की पीड़ा बढ़ती जा रही है और प्रशासनिक तंत्र पर भी अनावश्यक दबाव पड़ रहा है। फील्ड स्टाफ को जनता के गुस्से और अविश्वास का सामना करना पड़ रहा है, जिससे पूरी प्रक्रिया और अधिक तनावपूर्ण बनती जा रही है।
मुख्यमंत्री का मानना है कि यदि समय रहते इन खामियों को दूर नहीं किया गया, तो इसका सीधा असर लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा पर पड़ेगा। उन्होंने आग्रह किया कि ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें तकनीक का उपयोग सहायक के रूप में हो, न कि नागरिकों के अधिकारों को सीमित करने वाले उपकरण के रूप में।
दो दिन पहले लगाए गए गंभीर आरोप
इस पत्र से दो दिन पहले भी ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया था कि SIR अभियान के कारण पहले ही 77 लोगों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा चार आत्महत्या के प्रयास हुए हैं और 17 लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ गए, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उनके अनुसार, यह स्थिति बेहद चिंताजनक है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अपने पिछले पत्र में उन्होंने लिखा था कि बिना पर्याप्त योजना के इस तरह की व्यापक प्रक्रिया शुरू करने से डर और तनाव का माहौल बना। फील्ड स्टाफ पर अत्यधिक काम का बोझ पड़ा और लोगों में यह भावना पैदा हुई कि उन्हें धमकाया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने इसे पूरी तरह से अव्यवस्थित और असंवेदनशील प्रशासनिक अभ्यास बताया, जिसके दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं।
लोकतंत्र, तकनीक और जवाबदेही का सवाल
पूरे घटनाक्रम को देखें तो यह विवाद केवल तकनीकी खामियों तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र, तकनीक और प्रशासनिक जवाबदेही के आपसी संबंधों पर भी सवाल खड़ा करता है। ममता बनर्जी का तर्क है कि तकनीक का उपयोग पारदर्शिता और सुविधा बढ़ाने के लिए होना चाहिए, न कि नागरिकों को संदेह के घेरे में डालने के लिए।
उनके अनुसार, यदि एक मतदाता वर्षों से वैध रूप से सूची में शामिल है और उसने सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया है, तो उससे बार-बार पहचान साबित करने को कहना न केवल अपमानजनक है, बल्कि संविधान की भावना के भी खिलाफ है। यह मुद्दा आने वाले समय में और भी व्यापक बहस का विषय बन सकता है, क्योंकि इसका सीधा संबंध नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से है।
