भारतीय सिनेमा के इतिहास में दिलीप कुमार का नाम केवल एक महान अभिनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक के रूप में भी दर्ज है। उन्होंने पर्दे पर जितनी गहराई से किरदार निभाए, असल ज़िंदगी में भी उतनी ही गहराई से सामाजिक और मानवीय मुद्दों को महसूस किया। लेकिन उनके जीवन का एक ऐसा अध्याय भी रहा, जिसने उन्हें अभिनय से ज़्यादा राजनीति, राष्ट्रवाद और पहचान की बहस के केंद्र में ला खड़ा किया। यह वही दौर था जब कारगिल युद्ध के बाद देश में भावनाएं उफान पर थीं और उसी समय दिलीप कुमार का नाम पाकिस्तान, नवाज शरीफ और बाल ठाकरे से जुड़कर विवादों में आ गया।

यह कहानी केवल एक अभिनेता की नहीं है, बल्कि भारत-पाक संबंधों, युद्ध के माहौल, देश के भीतर अल्पसंख्यकों की असुरक्षा और राजनीति की कठोर भाषा को भी उजागर करती है। दिलीप कुमार उस समय ऐसी स्थिति में फंस गए थे, जहां उनके हर कदम को देशभक्ति और गद्दारी के तराजू पर तौला जा रहा था।
दिलीप कुमार का जीवन और भारत से रिश्ता
दिलीप कुमार का जन्म अविभाजित भारत के पेशावर में हुआ था, लेकिन उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत को समर्पित कर दिया। विभाजन के बाद जब लाखों लोग अपनी पहचान तलाश रहे थे, दिलीप कुमार ने भारत को ही अपना कर्मभूमि बनाया। उन्होंने न केवल हिंदी सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि अपनी छवि एक जिम्मेदार, गंभीर और संवेदनशील कलाकार की बनाई। भारत में उन्होंने लगभग 65 वर्षों तक न केवल काम किया, बल्कि यहां की संस्कृति, भाषा और समाज से गहराई से जुड़े रहे।
उनके लिए भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक भावनात्मक घर था। यही कारण था कि जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बढ़ा, दिलीप कुमार उसे केवल राजनीतिक घटना नहीं मानते थे, बल्कि इंसानी नजरिए से देखते थे।
कारगिल युद्ध और दिलीप कुमार की बेचैनी
1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो पूरा देश गुस्से, दर्द और आक्रोश से भरा हुआ था। सीमाओं पर जवान शहीद हो रहे थे और देश के भीतर राष्ट्रवाद अपने उग्र रूप में सामने आ रहा था। इसी माहौल में दिलीप कुमार बेहद चिंतित थे। उनका मानना था कि युद्ध का असर केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के भीतर रहने वाले आम लोगों पर भी पड़ता है।
दिलीप कुमार ने महसूस किया कि भारत-पाक तनाव के दौरान भारतीय मुसलमानों को अक्सर शक की निगाह से देखा जाने लगता है। उन्हें डर था कि युद्ध की आग कहीं सामाजिक सौहार्द को न जला दे। यही सोच उन्हें शांति की कोशिशों की ओर ले गई।
नवाज शरीफ से बातचीत की पृष्ठभूमि
कारगिल युद्ध के दौरान एक ऐसा क्षण आया जब तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच बातचीत हुई। बाद में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी ने इस घटना का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि इस फोन कॉल के दौरान वाजपेयी ने नवाज शरीफ से कारगिल की स्थिति को लेकर नाराजगी जताई थी।
इस बातचीत के दौरान दिलीप कुमार भी फोन पर आए। यह कोई औपचारिक कूटनीतिक बातचीत नहीं थी, बल्कि एक कलाकार की मानवीय चिंता से उपजी पहल थी। दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से बेहद साफ शब्दों में कहा कि उनसे ऐसी उम्मीद नहीं थी। उन्होंने याद दिलाया कि नवाज शरीफ हमेशा भारत-पाक शांति की बात करते रहे हैं और कारगिल जैसी घटना ने उस भरोसे को तोड़ा है।
भारतीय मुसलमानों की पीड़ा पर दिलीप कुमार की चिंता
दिलीप कुमार ने बातचीत में यह भी कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का सबसे बड़ा मानसिक दबाव भारत में रहने वाले मुसलमानों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में भारतीय मुसलमान खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं और सामान्य जीवन जीना तक मुश्किल हो जाता है।
यह बयान किसी राजनीतिक एजेंडे से नहीं, बल्कि एक भारतीय नागरिक की चिंता से उपजा था। दिलीप कुमार खुद को पहले भारतीय मानते थे और फिर मुसलमान। लेकिन उस दौर में उनके इस बयान को कई लोगों ने गलत नजरिए से देखा।
फोन कॉल के बाद क्या बदला
बताया जाता है कि इस बातचीत के बाद कुछ समय के लिए हालात थोड़े शांत हुए, लेकिन यह स्थिरता ज्यादा दिन नहीं चली। कारगिल युद्ध आगे बढ़ा और लगभग तीन महीने तक संघर्ष चलता रहा। हालांकि दिलीप कुमार की इस कोशिश को आधिकारिक स्तर पर कभी सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया, लेकिन बाद में सामने आई जानकारी ने इस अध्याय को इतिहास का हिस्सा बना दिया।
पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार और विवाद
कारगिल युद्ध से पहले, 1998 में पाकिस्तान सरकार ने दिलीप कुमार को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज से सम्मानित करने की घोषणा की थी। यह पुरस्कार उनकी कला और सिनेमा में योगदान के लिए दिया गया था। दिलीप कुमार ने यह पुरस्कार स्वीकार किया और पाकिस्तान भी गए।
यहीं से विवाद ने जोर पकड़ा। भारत में कई लोगों को यह कदम पसंद नहीं आया। उनका मानना था कि एक भारतीय नागरिक और खासकर इतने बड़े कलाकार को पाकिस्तान से सम्मान नहीं लेना चाहिए।
बाल ठाकरे का तीखा विरोध
इस पूरे मामले में सबसे तीखी प्रतिक्रिया शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे की रही। बाल ठाकरे उस समय पाकिस्तान विरोधी रुख के लिए जाने जाते थे। उन्होंने दिलीप कुमार के फैसले पर खुलकर नाराजगी जताई और कहा कि अगर दिलीप कुमार पाकिस्तान से इतना लगाव रखते हैं, तो उन्हें वहीं जाकर रहना चाहिए।
बाल ठाकरे के बयान केवल राजनीतिक आलोचना नहीं थे, बल्कि व्यक्तिगत हमले की तरह सामने आए। उन्होंने यहां तक कह दिया कि दिलीप कुमार को भारत छोड़ देना चाहिए। यह बयान दिलीप कुमार को गहरे तक आहत कर गया।
दिलीप कुमार की भावनात्मक प्रतिक्रिया
दिलीप कुमार ने बाद में दिए गए इंटरव्यू में कहा कि 65 साल भारत में रहने के बाद उन्हें अपनी वफादारी साबित करने की जरूरत बताई जा रही है, यह बेहद दुखद है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि ऐसे बयान आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाते हैं और किसी जिम्मेदार व्यक्ति को ऐसी भाषा शोभा नहीं देती।
उन्होंने यह भी कहा कि पुरस्कार लेना कला का सम्मान था, न कि किसी देश विशेष की राजनीति का समर्थन। दिलीप कुमार के लिए यह मुद्दा देशभक्ति बनाम गद्दारी का नहीं, बल्कि इंसानियत और सम्मान का था।
विवाद का सामाजिक असर
यह विवाद केवल दिलीप कुमार और बाल ठाकरे तक सीमित नहीं रहा। इसने देश में पहचान, राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों की स्थिति पर एक नई बहस छेड़ दी। सवाल उठने लगे कि क्या किसी कलाकार की कला को उसकी नागरिकता और राजनीति से जोड़कर देखा जाना चाहिए।
इस पूरे प्रकरण ने यह भी दिखाया कि युद्ध के समय भावनाएं किस तरह तर्क पर हावी हो जाती हैं। दिलीप कुमार जैसे कलाकार भी इस भावनात्मक तूफान से अछूते नहीं रह सके।
इतिहास में दर्ज एक संवेदनशील अध्याय
आज जब पीछे मुड़कर देखा जाता है, तो यह स्पष्ट होता है कि दिलीप कुमार की कोशिश किसी देश के पक्ष में नहीं, बल्कि शांति के पक्ष में थी। उन्होंने जो कहा, वह एक ऐसे इंसान की आवाज थी जो युद्ध की कीमत जानता था। लेकिन उस दौर में उनकी मंशा को समझने के बजाय उन्हें कठघरे में खड़ा कर दिया गया।
यह कहानी भारतीय लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सहिष्णुता के लिए भी एक सबक है। दिलीप कुमार ने अपने जीवन में जितनी लोकप्रियता देखी, उतना ही विरोध भी सहा। लेकिन उन्होंने कभी अपने मूल्यों से समझौता नहीं किया।
