इंदौर शहर में ऑटो रिक्शा चालकों की लंबे समय से चली आ रही एक अहम मांग एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। शहर से 60 किलोमीटर की परिधि तक ऑटो रिक्शा संचालन की अनुमति देने की प्रक्रिया बीते कई महीनों से अटकी हुई है। प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर सहमति बनने के दावों के बावजूद जब ज़मीनी स्तर पर कोई ठोस निर्णय लागू नहीं हुआ, तो ऑटो चालक संगठनों ने एक बार फिर आवाज़ बुलंद की है।

बुधवार को बड़ी संख्या में ऑटो रिक्शा चालक ट्रैफिक डीसीपी कार्यालय, पलासिया पहुंचे। यहां उन्होंने डीसीपी ट्रैफिक से मुलाकात कर अपनी समस्याओं और मांगों को विस्तार से रखा। चालकों का कहना था कि वे किसी टकराव या अव्यवस्था की स्थिति नहीं चाहते, बल्कि केवल वही अधिकार मांग रहे हैं, जिस पर पहले ही प्रशासनिक स्तर पर सहमति बन चुकी है।
ऑटो चालकों के प्रतिनिधियों ने बताया कि इंदौर एक तेजी से फैलता हुआ महानगर है। शहर की सीमाएं लगातार बढ़ रही हैं और आसपास के कई कस्बे और गांव अब शहरी जीवन से सीधे तौर पर जुड़ चुके हैं। इसके बावजूद ऑटो रिक्शा संचालन की अनुमति अभी भी सीमित दायरे में सिमटी हुई है। इससे न केवल ऑटो चालकों की रोज़ी-रोटी प्रभावित हो रही है, बल्कि आम यात्रियों को भी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
ऑटो चालकों का तर्क है कि वर्तमान में शहर की सीमा से बाहर जाने पर उन्हें चालान, जुर्माना और कई बार वाहन जब्ती जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। जबकि हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में यात्री रोज़ाना शहर से 40 से 60 किलोमीटर दूर स्थित इलाकों में आना-जाना करते हैं। ऐसे में यदि ऑटो रिक्शा को 60 किलोमीटर की परिधि में संचालन की अनुमति मिल जाती है, तो यह व्यवस्था यात्रियों और चालकों दोनों के लिए राहतकारी साबित होगी।
चालकों ने यह भी कहा कि इस मांग को लेकर पहले कई बार ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं। परिवहन विभाग, ट्रैफिक पुलिस और जनप्रतिनिधियों के साथ बैठकों में भी इस पर चर्चा हो चुकी है। कई मौकों पर आश्वासन दिया गया कि प्रक्रिया जल्द पूरी की जाएगी। यहां तक कि राजनीतिक स्तर पर भी सहमति बनने की बात सामने आई थी, लेकिन इसके बावजूद फाइलें आगे नहीं बढ़ीं।
डीसीपी ट्रैफिक कार्यालय में हुई मुलाकात के दौरान ऑटो चालकों ने शांति पूर्ण तरीके से अपनी बात रखी। उनका कहना था कि वे कानून का सम्मान करते हैं और किसी भी तरह की अव्यवस्था नहीं चाहते। लेकिन जब महीनों तक मांगों पर कोई कार्रवाई नहीं होती, तो उन्हें मजबूर होकर एकजुट होना पड़ता है।
ऑटो चालक संगठनों के अनुसार, इंदौर में हजारों परिवार ऑटो रिक्शा संचालन पर निर्भर हैं। बढ़ती महंगाई, ईंधन के दाम और मेंटेनेंस खर्च पहले ही उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर कर चुके हैं। सीमित दायरे में संचालन की वजह से उनकी आमदनी और भी घट गई है। कई चालकों ने बताया कि पहले वे दिनभर में जितनी सवारी कर लेते थे, अब उतनी नहीं मिल पाती।
उन्होंने यह भी बताया कि निजी टैक्सी और ऐप आधारित कैब सेवाएं शहर से बाहर तक बेरोकटोक चल रही हैं, जबकि ऑटो चालकों को नियमों का हवाला देकर रोका जाता है। इससे उनके मन में भेदभाव की भावना पैदा हो रही है। उनका कहना है कि यदि सभी परिवहन सेवाओं के लिए समान नियम लागू हों, तो किसी को आपत्ति नहीं होगी।
डीसीपी ट्रैफिक ने चालकों की बात ध्यानपूर्वक सुनी और उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी मांगों को उच्च अधिकारियों तक पहुंचाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल ट्रैफिक पुलिस का नहीं, बल्कि परिवहन विभाग और प्रशासन के संयुक्त निर्णय से जुड़ा है। फिर भी, चालकों की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाएगा और समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर शहरी परिवहन व्यवस्था की जटिलताओं को उजागर किया है। इंदौर जैसे शहर में जनसंख्या और क्षेत्रफल दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में पुराने नियमों के तहत नई चुनौतियों से निपटना मुश्किल होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि परिवहन नीतियों में समय के साथ बदलाव जरूरी है, ताकि वे शहर की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप हों।
ऑटो चालकों की यह मांग केवल उनके हितों तक सीमित नहीं है। यदि 60 किलोमीटर की परिधि में ऑटो संचालन की अनुमति मिलती है, तो इससे सार्वजनिक परिवहन की पहुंच भी बढ़ेगी। छोटे कस्बों और बाहरी इलाकों में रहने वाले लोगों को किफायती और सहज परिवहन का विकल्प मिलेगा।
फिलहाल ऑटो चालक इस इंतजार में हैं कि प्रशासन कब उनकी मांगों पर ठोस कदम उठाता है। उनका कहना है कि यदि जल्द कोई निर्णय नहीं लिया गया, तो वे आगे की रणनीति पर विचार करने को मजबूर होंगे। हालांकि उन्होंने साफ किया कि उनका उद्देश्य टकराव नहीं, बल्कि संवाद के जरिए समाधान निकालना है।
यह पूरा मामला दिखाता है कि शहर के विकास के साथ-साथ नीतियों में भी लचीलापन और संवेदनशीलता जरूरी है। ऑटो चालक केवल सड़कों पर दौड़ने वाले वाहन नहीं, बल्कि शहरी जीवन की रीढ़ हैं। उनकी समस्याओं को नजरअंदाज करना लंबे समय में शहर के परिवहन तंत्र को कमजोर कर सकता है।
