चीन की तकनीकी रणनीतियाँ एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। हाल ही में ब्रिटेन, नॉर्वे और डेनमार्क में चल रही चीनी इलेक्ट्रिक बसों के नियंत्रण सिस्टम को लेकर गंभीर खुलासे सामने आए हैं। इन देशों को शक है कि चीन की कंपनियाँ बसों के सॉफ्टवेयर सिस्टम के जरिए दूर से नियंत्रण (Remote Access) हासिल कर सकती हैं। यानी, बीजिंग बैठे किसी व्यक्ति के पास यह क्षमता हो सकती है कि वह इन बसों को जब चाहे चालू या बंद कर दे।

नॉर्वे और डेनमार्क की जांचों के बाद अब ब्रिटेन ने भी अपनी सड़कों पर दौड़ रही सैकड़ों यूटॉन्ग (Yutong) बसों की तकनीकी जांच शुरू कर दी है। यह खबर सामने आने के बाद वैश्विक स्तर पर साइबर सुरक्षा और डेटा प्राइवेसी को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
नॉर्वे और डेनमार्क में क्या मिला?
फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नॉर्वे की जांच एजेंसियों ने पाया कि यूटॉन्ग कंपनी द्वारा सप्लाई की गई इलेक्ट्रिक बसों में एक विशेष ‘कंट्रोल मॉड्यूल’ लगा हुआ है। इस मॉड्यूल के जरिए कंपनी रिमोट सर्वर से बसों के संचालन को प्रभावित कर सकती है। डेनमार्क की जांच में इससे भी बड़ा खुलासा हुआ—बसों में एक ‘सीक्रेट सिम कार्ड’ लगाया गया है जो चीन के सर्वर से जुड़ा हुआ है।
जब इस सिम को निकाल दिया गया, तो बसें दूरस्थ नियंत्रण से तो मुक्त हो गईं, लेकिन उनके कुछ जरूरी सिस्टम (जैसे ऑटो डायग्नोसिस और नेविगेशन अपडेट) बंद हो गए। इसका मतलब था कि बिना इस सिम के बसें पूरी तरह कार्यक्षम नहीं रह सकतीं। यह बात यूरोपीय साइबर सुरक्षा संस्थानों के लिए एक बड़ा खतरे का संकेत बनी।
ब्रिटेन की प्रतिक्रिया
ब्रिटिश परिवहन विभाग (Department for Transport) ने इस खुलासे के बाद त्वरित कार्रवाई की है। नेशनल साइबर सिक्योरिटी सेंटर (NCSC) के साथ मिलकर एक संयुक्त जांच शुरू की गई है। इन संस्थाओं का लक्ष्य है यह समझना कि क्या चीन की यूटॉन्ग कंपनी के पास वास्तव में बसों के नियंत्रण तक पहुंच है या नहीं।
ब्रिटेन में फिलहाल करीब 700 यूटॉन्ग इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं। इनमें से कई लंदन की सड़कों पर “Transport for London” नेटवर्क के तहत काम कर रही हैं। अगर इन बसों में रिमोट एक्सेस की संभावना पाई गई, तो यह न केवल ब्रिटेन की सार्वजनिक सुरक्षा बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए भी खतरा बन सकता है।
सरकारी प्रवक्ता ने मीडिया से कहा —
“हम इस मामले की गंभीरता को समझते हैं। नॉर्वे और डेनमार्क की जांच रिपोर्टों का अध्ययन किया जा रहा है। हमारी प्राथमिकता है कि किसी भी बाहरी देश या कंपनी को हमारे महत्वपूर्ण परिवहन तंत्र पर नियंत्रण न मिल पाए।”
यूटॉन्ग कंपनी का बचाव
चीन की प्रमुख इलेक्ट्रिक बस निर्माता Yutong ने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया है। कंपनी ने ब्रिटेन के Sunday Times को दिए बयान में कहा:
“हम पूरी तरह से स्थानीय कानूनों और इंडस्ट्री मानकों का पालन करते हैं। हमारे द्वारा एकत्रित डेटा केवल बसों की मेंटेनेंस, परफॉर्मेंस और सुरक्षा सुधार के लिए उपयोग होता है। सभी डेटा एन्क्रिप्टेड और नियंत्रित वातावरण में रखा जाता है। ग्राहक की अनुमति के बिना कोई भी डेटा एक्सेस नहीं किया जा सकता।”
कंपनी ने आगे कहा कि वह GDPR (General Data Protection Regulation) जैसे यूरोपीय डेटा सुरक्षा कानूनों का पूरी तरह पालन करती है और यह सब “राजनीतिक शोर” मात्र है।
क्या यह साइबर स्पाईंग का नया चेहरा है?
तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह रणनीति “टेक डिप्लोमेसी” का हिस्सा हो सकती है — यानी तकनीकी उत्पादों के जरिए कूटनीतिक प्रभाव बनाना। जब कोई देश अपने बुनियादी ढांचे (जैसे बस, ट्रेन, कैमरे, नेटवर्क उपकरण आदि) में किसी दूसरे देश की तकनीक अपनाता है, तो वह अनजाने में उस देश की साइबर पहुंच के लिए रास्ता खोल देता है।
इसी तरह के आरोप पहले भी लगाए जा चुके हैं। अमेरिका ने पहले Huawei और ZTE जैसी चीनी कंपनियों पर भी ऐसा ही आरोप लगाया था कि उनके नेटवर्क डिवाइसों के जरिए चीन सरकार डेटा निगरानी कर सकती है।
क्यों डर रहे हैं यूरोपीय देश?
यूरोपीय देशों में डिजिटल बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। कई रिपोर्टें बताती हैं कि रूस और चीन जैसे देशों ने पिछले वर्षों में यूरोप की ऊर्जा ग्रिड, ट्रांसपोर्ट सिस्टम और बैंकिंग नेटवर्क पर साइबर हमले किए हैं।
अब जब पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे क्षेत्र में भी “स्मार्ट कंट्रोल सिस्टम” शामिल हैं, तो इसका दुरुपयोग किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
नॉर्वे और डेनमार्क के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि —
“यह केवल बसों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर में छिपे ‘टेक्नोलॉजिकल ट्रोजन हॉर्स’ की चेतावनी है।”
चीन का टेक्नोलॉजिकल विस्तार और चिंता का भविष्य
चीन ने पिछले एक दशक में दुनिया के इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बाजार पर कब्जा करने की दिशा में बड़ी छलांग लगाई है। आज यूटॉन्ग, BYD, और NIO जैसी कंपनियाँ यूरोप, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में बड़ी संख्या में वाहन सप्लाई कर रही हैं।
अगर इन वाहनों में रिमोट कंट्रोल की क्षमता है, तो यह भविष्य में किसी देश की सार्वजनिक सेवाओं को ‘डिजिटल बंधक’ बनाने जैसा हो सकता है। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि अगर ऐसी तकनीक का इस्तेमाल रणनीतिक रूप से किया गया, तो यह युद्ध के बिना ही “साइबर कब्जा” कहलाएगा।
तकनीकी जांच के परिणाम का इंतजार
ब्रिटेन, नॉर्वे और डेनमार्क की जांचें अभी प्रारंभिक चरण में हैं। लेकिन इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भविष्य के लिए देशों को अपनी तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) का ‘डिजिटल ऑडिट’ करना चाहिए?
कई देशों ने पहले ही विदेशी तकनीकी कंपनियों के उत्पादों को अपने ‘क्रिटिकल सेक्टर’ से हटाना शुरू कर दिया है। भारत ने भी हाल ही में चीनी कैमरा और सर्विलांस उपकरणों पर प्रतिबंध लगाए हैं।
