दुनिया की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों से लगातार अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। कोविड के बाद सप्लाई चेन संकट, यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, महंगाई और ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव ने वैश्विक वित्तीय संतुलन को प्रभावित किया है। ऐसे माहौल में एक बार फिर सोना सुरक्षित निवेश के रूप में उभर कर सामने आया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण एशिया के विकसित देश जापान में देखने को मिला है, जहां देश का गोल्ड रिजर्व ऐतिहासिक रिकॉर्ड पर पहुंच गया है।

जापान का यह रिकॉर्ड केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उसकी वैश्विक रणनीति, अमेरिका और भारत के साथ मजबूत संबंधों तथा चीन के साथ बढ़ते तनाव की पृष्ठभूमि में बेहद अहम संकेत देता है।
रिकॉर्ड स्तर पर जापान का गोल्ड रिजर्व
बीते वर्ष सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई जबरदस्त तेजी ने जापान के गोल्ड रिजर्व को नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक जापान का गोल्ड रिजर्व करीब 120 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच गया है। यह स्तर अपने आप में ऐतिहासिक है क्योंकि साल 2024 की तुलना में इसमें लगभग 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
दिलचस्प बात यह है कि इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण सोने की खरीदारी नहीं बल्कि सोने की कीमतों में आई तेजी है। जापान ने बीते सालों में बहुत ज्यादा मात्रा में नया सोना नहीं खरीदा, लेकिन वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ने से उसके मौजूदा भंडार का मूल्य तेजी से बढ़ गया।
2022 से दोगुना हुआ सोने का मूल्य
अगर तुलना की जाए तो 2022 की तुलना में जापान के गोल्ड रिजर्व का मूल्य लगभग दोगुना हो चुका है। उस समय वैश्विक बाजार में सोना अपेक्षाकृत सस्ता था, लेकिन अब महंगाई, भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर की स्थिति को लेकर बढ़ती चिंताओं ने सोने को निवेशकों की पहली पसंद बना दिया है।
इसी का असर यह हुआ कि जापान की कुल विदेशी मुद्रा संपत्ति में सोने की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 9 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा बताता है कि जापान अब अपने रिजर्व को केवल डॉलर या बॉन्ड्स तक सीमित नहीं रखना चाहता, बल्कि उसमें स्थिरता और सुरक्षा के लिए सोने की भूमिका भी बढ़ा रहा है।
फॉरेक्स रिजर्व में भी मजबूत स्थिति
जापान केवल गोल्ड रिजर्व के मामले में ही नहीं, बल्कि कुल विदेशी मुद्रा भंडार के लिहाज से भी दुनिया के सबसे मजबूत देशों में शामिल है। देश का कुल फॉरेक्स रिजर्व अब 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है, जो 2021 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है।
इतना ही नहीं, जापान की कुल रिजर्व एसेट्स यानी विदेशी मुद्रा, सोना और अन्य संपत्तियों को मिलाकर आंकड़ा करीब 1.37 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। यह स्थिति जापान को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में एक बेहद भरोसेमंद और स्थिर अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करती है।
चीन के बाद दूसरे नंबर पर जापान
अगर वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो विदेशी मुद्रा भंडार के मामले में जापान केवल चीन से पीछे है। चीन के पास इस समय लगभग 3.68 ट्रिलियन डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।
इस सूची में तीसरे स्थान पर स्विट्जरलैंड है, जिसके पास करीब 927 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। भारत इस सूची में चौथे स्थान पर है, जिसके पास लगभग 662 अरब डॉलर का फॉरेक्स रिजर्व है। इसके बाद रूस, हॉन्ग कॉन्ग, सऊदी अरब, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और सिंगापुर जैसे देश आते हैं।
यह आंकड़े साफ दिखाते हैं कि क्षेत्रफल और आबादी में भारत से काफी छोटा होने के बावजूद जापान आर्थिक संसाधनों के मामले में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में है।
अमेरिका के साथ गहरी आर्थिक दोस्ती
जापान की आर्थिक रणनीति का एक बेहद अहम पहलू अमेरिका के साथ उसका मजबूत रिश्ता है। आज भी जापान अमेरिका के सरकारी बॉन्ड्स यानी यूएस ट्रेजरी का सबसे बड़ा विदेशी धारक बना हुआ है।
वर्तमान में जापान के पास लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स हैं। यह आंकड़ा बताता है कि जापान को अमेरिकी अर्थव्यवस्था और डॉलर पर अब भी गहरा भरोसा है।
जब दुनिया यूएस ट्रेजरी से दूरी बना रही है
पिछले कुछ समय में कई देशों ने अमेरिकी बॉन्ड्स में अपनी हिस्सेदारी कम की है। भारत, चीन, ब्राजील और सऊदी अरब जैसे देशों ने यूएस ट्रेजरी से धीरे-धीरे दूरी बनाते हुए सोने में निवेश बढ़ाया है। इसका कारण डॉलर पर निर्भरता कम करना और वित्तीय जोखिम को संतुलित करना माना जा रहा है।
इसके उलट जापान ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड्स में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है। यह फैसला दर्शाता है कि जापान अमेरिका को केवल रणनीतिक साझेदार ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी सबसे सुरक्षित विकल्प मानता है।
भारत और अमेरिका के साथ रणनीतिक संतुलन
जापान की विदेश और आर्थिक नीति में भारत और अमेरिका दोनों का अहम स्थान है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए जापान, भारत और अमेरिका के बीच सहयोग लगातार बढ़ा है।
भारत के साथ जापान के रिश्ते केवल कूटनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और तकनीकी साझेदारी पर भी आधारित हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश, सेमीकंडक्टर और रक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है।
चीन के साथ बढ़ता तनाव
जहां एक तरफ जापान अमेरिका और भारत के साथ अपने रिश्ते मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ चीन के साथ उसका तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। पूर्वी एशिया में क्षेत्रीय विवाद, समुद्री सीमाओं को लेकर मतभेद और सामरिक प्रतिस्पर्धा ने दोनों देशों के संबंधों को जटिल बना दिया है।
चीन जहां तेजी से अपने गोल्ड रिजर्व को बढ़ा रहा है, वहीं डॉलर से दूरी बनाने की रणनीति पर भी काम कर रहा है। जापान की नीति इससे अलग दिखाई देती है, जहां वह सोने के साथ-साथ डॉलर आधारित परिसंपत्तियों को भी संतुलित तरीके से संभाल रहा है।
दुनिया में सबसे ज्यादा सोना किसके पास
अगर केवल गोल्ड रिजर्व की बात करें तो अमेरिका अब भी दुनिया में पहले स्थान पर है। अमेरिका के पास करीब 8,133 टन सोना है। इसके बाद जर्मनी के पास 3,350 टन, इटली के पास 2,452 टन और फ्रांस के पास 2,437 टन सोना है।
रूस और चीन भी इस सूची में तेजी से ऊपर आए हैं। रूस के पास लगभग 2,330 टन और चीन के पास करीब 2,304 टन गोल्ड रिजर्व है। स्विट्जरलैंड, भारत, जापान, तुर्की और नीदरलैंड भी टॉप गोल्ड होल्डिंग देशों में शामिल हैं।
जापान इस सूची में करीब 846 टन सोने के साथ नौवें स्थान पर है। हालांकि मात्रा के लिहाज से वह शीर्ष देशों से पीछे है, लेकिन मूल्य के हिसाब से उसका गोल्ड रिजर्व रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है।
सोना क्यों बन रहा है सबसे सुरक्षित विकल्प
वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ने के साथ-साथ सोने की मांग लगातार बढ़ रही है। केंद्रीय बैंक अब इसे केवल परंपरागत संपत्ति नहीं बल्कि रणनीतिक सुरक्षा कवच के रूप में देख रहे हैं।
महंगाई, मुद्रा अवमूल्यन और भू-राजनीतिक तनाव के दौर में सोना ऐसा निवेश माना जाता है जो लंबे समय में अपनी कीमत बनाए रखता है। जापान का उदाहरण दिखाता है कि विकसित अर्थव्यवस्थाएं भी अब सोने को नजरअंदाज नहीं कर रहीं।
जापान की आर्थिक स्थिति का व्यापक अर्थ
जापान का रिकॉर्ड गोल्ड रिजर्व और मजबूत फॉरेक्स भंडार यह संकेत देता है कि देश भविष्य की वैश्विक चुनौतियों के लिए खुद को तैयार कर रहा है। अमेरिका के साथ मजबूत वित्तीय रिश्ते, भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी और चीन के प्रति सतर्क रुख, तीनों मिलकर जापान की वैश्विक भूमिका को परिभाषित कर रहे हैं।
यह स्थिति न केवल एशिया बल्कि पूरी दुनिया के लिए यह संदेश देती है कि आर्थिक ताकत केवल उत्पादन या व्यापार से नहीं, बल्कि मजबूत रिजर्व रणनीति से भी बनती है।
