मध्य प्रदेश की मिट्टी ने हमेशा से मेहनत, नवाचार और उम्मीद की नई कहानियाँ लिखी हैं। इन्हीं कहानियों में से एक है सीहोर जिले के लखन वर्मा की प्रेरणादायक यात्रा — एक ऐसे किसान की जो परंपरा और विज्ञान को जोड़कर खेती को लाभ और सम्मान का साधन बना रहा है। आज, लखन वर्मा का नाम न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि विदेशों में भी चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि नीदरलैंड की एक कंपनी ने उनसे 260 टन वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) का ऑर्डर दिया है। यह उपलब्धि न सिर्फ एक किसान की मेहनत का परिणाम है, बल्कि भारत की जैविक खेती की ताकत का भी प्रमाण है।

दो दशक की लगन से अंतरराष्ट्रीय पहचान
खंडवा गांव के निवासी लखन वर्मा ने 20 साल पहले जब जैविक खेती की शुरुआत की, तब बहुत से लोग इसे ‘पुरानी पद्धति’ कहकर हंसी उड़ाते थे। लेकिन वर्मा ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने पशु अपशिष्ट और खेतों के कचरे से खाद बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने वर्मी कम्पोस्ट की विधि सीखी, जिसमें केंचुओं की मदद से अपशिष्ट को जैविक खाद में बदला जाता है।
वर्ष 2015 में उन्होंने अपने खेत में एक छोटा-सा वर्मी कम्पोस्ट यूनिट लगाया। शुरुआत में यह सिर्फ अपने खेत की जरूरत के लिए था। लेकिन परिणाम इतने बेहतरीन मिले कि उन्होंने इसे व्यावसायिक रूप दे दिया। आज उनकी यूनिट से प्रतिवर्ष सैकड़ों टन खाद तैयार होती है।
स्थानीय बाजार से अंतरराष्ट्रीय व्यापार तक
स्थानीय बाजार में उनकी खाद 14–15 रुपये प्रति किलोग्राम के दर पर बिकती है। लेकिन अब उन्हें जो नीदरलैंड का ऑर्डर मिला है, उसकी कीमत करीब 5 अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹442 प्रति किलो) तय हुई है। यानी एक साधारण किसान अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहा है — वह भी अपने पर्यावरण-हितैषी उत्पाद के साथ।
लखन वर्मा बताते हैं, “मैंने अपनी वेबसाइट पर अपने उत्पाद की जानकारी डाली थी। कुछ ही महीनों बाद नीदरलैंड की कंपनी ने मुझसे संपर्क किया और उन्होंने मेरे वर्मी कम्पोस्ट के सैंपल मंगवाए। टेस्टिंग के बाद उन्होंने 260 टन खाद का ऑर्डर दिया।”
वर्मी कम्पोस्ट बनाने की प्रक्रिया
वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के लिए लखन वर्मा स्थानीय पशुपालकों से गोबर खरीदते हैं। एक क्विंटल गोबर की कीमत ₹100 तय की गई है। इसके साथ खेतों के सूखे पत्ते, सब्जियों के छिलके और अन्य जैविक कचरे का उपयोग किया जाता है। इन्हें विशेष पिट्स (खड्डों) में केंचुओं के साथ रखा जाता है, जो इन्हें पचाकर पौष्टिक खाद में बदल देते हैं।
यह खाद नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम और सूक्ष्म पोषक तत्वों से भरपूर होती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, सिर्फ सात क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट एक एकड़ जमीन को पूरी तरह उपजाऊ बना सकता है।
गांव में रोजगार का नया माध्यम
वर्मी वर्मा की इस पहल से न सिर्फ उनकी आय बढ़ी, बल्कि गांव में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए। उनके उत्पादन केंद्र पर 14 स्थायी मजदूर काम करते हैं, जिनमें कई महिलाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा, आसपास के पशुपालकों को भी गोबर बेचकर अतिरिक्त आय का साधन मिला है।
स्थानीय ग्रामीण बताते हैं, “पहले गोबर खेतों में बेकार पड़ा रहता था, अब यही हमारे लिए कमाई का जरिया बन गया है।”
नीदरलैंड क्यों चुन रहा है सीहोर की खाद?
नीदरलैंड अपनी कृषि तकनीकों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। लेकिन वहां की मिट्टी लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से कमजोर होती जा रही है। ऐसे में, नीदरलैंड की कंपनियां अब प्राकृतिक और जैविक विकल्पों की तलाश में हैं। वर्मी कम्पोस्ट उस दिशा में सबसे सफल समाधान माना जा रहा है।
नीदरलैंड की कंपनी ने सीहोर की मिट्टी से तैयार इस जैविक खाद को इसलिए चुना क्योंकि यह न केवल पौष्टिक है, बल्कि पूरी तरह रासायनिक-मुक्त (Chemical-free) भी है।
वैज्ञानिकों की राय
कृषि विशेषज्ञ डॉ. विवेक तोमर कहते हैं —
“वर्मी कम्पोस्ट खेती के लिए एक क्रांतिकारी कदम है। अगर किसान इसे अपने खेतों में इस्तेमाल करें तो लागत घटेगी, उपज बढ़ेगी और मुनाफा कई गुना होगा। अगर इसे व्यावसायिक रूप में अपनाया जाए, तो यह कम लागत में अधिक आय देने वाला उद्योग साबित हो सकता है।”
जैविक खेती के फायदे
- मिट्टी की उर्वरता बरकरार रहती है
- फसलों में कीटनाशक अवशेष नहीं रहते
- लंबे समय तक भूमि उत्पादक बनी रहती है
- किसानों की लागत में 40–50% तक कमी आती है
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाती है
चुनौतियाँ भी हैं
हालांकि इस सफलता के बावजूद लखन वर्मा कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। जैविक खाद के निर्यात के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करना पड़ता है — जैसे गुणवत्ता परीक्षण, सर्टिफिकेशन, पैकिंग और शिपिंग प्रक्रिया। इन सबमें काफी समय और लागत लगती है।
लखन वर्मा कहते हैं, “अगर सरकार हमें निर्यात प्रक्रिया में तकनीकी मदद दे, तो देश के हजारों किसान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं।”
सरकार और समाज के लिए संदेश
लखन वर्मा की कहानी यह साबित करती है कि अगर संकल्प हो, तो खेत की मिट्टी से भी वैश्विक पहचान बनाई जा सकती है। यह कहानी हर उस किसान के लिए प्रेरणा है जो रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों से परेशान है और एक नई राह तलाश रहा है।
