हरदा जिले की एक साधारण सी ग्राम पंचायत में घटी एक दुखद घटना अब पूरे जिले के प्रशासनिक और कर्मचारी तंत्र को झकझोर रही है। ग्राम पंचायत पलासनेर में पदस्थ पंचायत सचिव ओमप्रकाश गुर्जर की ड्यूटी के दौरान हुई आकस्मिक मृत्यु ने न केवल उनके परिवार को गहरे शोक में डुबो दिया, बल्कि पंचायत व्यवस्था में काम कर रहे सैकड़ों कर्मचारियों के मन में भी डर, आक्रोश और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।

यह घटना किसी सामान्य दिन की तरह ही शुरू हुई थी, लेकिन कुछ ही पलों में हालात ऐसे बदले कि एक अनुभवी कर्मचारी की जान चली गई और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए।
ड्यूटी के दौरान जांच और बिगड़ती तबीयत
घटना वाले दिन ग्राम पंचायत पलासनेर में नियमित शासकीय कार्य चल रहा था। इसी दौरान पंचायत से जुड़े कार्यों की समीक्षा और जांच के लिए एक जांच दल पंचायत कार्यालय पहुंचा। बताया जा रहा है कि जांच टीम के पहुंचने के बाद माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया।
पंचायत सचिव ओमप्रकाश गुर्जर उस समय अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे। जांच के दौरान उनसे दस्तावेजों, कार्यों और योजनाओं को लेकर सवाल-जवाब किए जा रहे थे। इसी बीच उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने लगी।
सहकर्मियों के अनुसार, उन्होंने असहजता की शिकायत की और कुछ ही देर में उनकी हालत गंभीर हो गई। उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता देने का प्रयास किया गया, लेकिन इससे पहले ही उन्हें हृदयाघात आ गया। थोड़ी ही देर में उनकी मृत्यु हो गई।
एक जिम्मेदार कर्मचारी का अंत
ओमप्रकाश गुर्जर को उनके सहकर्मी एक जिम्मेदार, शांत और मेहनती कर्मचारी के रूप में जानते थे। पंचायत स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन, रिकॉर्ड संधारण और प्रशासनिक समन्वय में उनकी भूमिका अहम मानी जाती थी।
उनकी अचानक मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या पंचायत स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों पर काम का अत्यधिक दबाव डाला जा रहा है। क्या जांच और निरीक्षण की प्रक्रिया मानवीय संवेदनाओं को नजरअंदाज कर रही है।
इन सवालों ने अब व्यक्तिगत शोक को एक सामूहिक आंदोलन में बदल दिया है।
सचिव संघ का आक्रोश और संगठित प्रतिक्रिया
घटना के बाद जिले के पंचायत सचिवों में गहरा रोष देखने को मिला। सचिव संघ ने इस मौत को केवल एक प्राकृतिक घटना मानने से इनकार किया और इसे ड्यूटी के दौरान उत्पन्न मानसिक दबाव से जोड़कर देखा।
सोमवार को जिले भर के सचिव एकजुट होकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और एक ज्ञापन सौंपा। इस ज्ञापन में उन्होंने पूरे मामले की न्यायिक जांच की मांग की। सचिव संघ का कहना है कि जब तक यह स्पष्ट नहीं होता कि जांच के दौरान किस तरह का दबाव बनाया गया और किन परिस्थितियों में सचिव की तबीयत बिगड़ी, तब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी।
प्रशासनिक अधिकारियों पर उठे सवाल
सचिव संघ ने ज्ञापन में जिला पंचायत के अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी प्रवीण कुमार इवने की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं। संघ का आरोप है कि जांच प्रक्रिया के दौरान अनावश्यक मानसिक दबाव बनाया गया, जिससे यह दुखद घटना हुई।
संघ ने मांग की है कि संबंधित अधिकारी की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो और यदि किसी भी स्तर पर लापरवाही या अमानवीय व्यवहार पाया जाता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
कलेक्टर और प्रशासन की प्रतिक्रिया
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन हरकत में आया है। कलेक्टर ने सचिव संघ के ज्ञापन को गंभीरता से लेते हुए पूरे मामले की रिपोर्ट तलब की है।
प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया है कि किसी भी कर्मचारी के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा और यदि जांच में किसी प्रकार की प्रशासनिक चूक सामने आती है, तो आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
सीईओ के निर्देश और आंतरिक जांच
जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी की ओर से भी इस घटना को गंभीरता से लिया गया है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि घटना से जुड़े सभी तथ्यों की विस्तृत जांच की जाए।
इस जांच में यह देखा जाएगा कि जांच टीम किस उद्देश्य से पंचायत पहुंची थी, जांच की प्रक्रिया कैसी थी, और क्या किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन या अनावश्यक दबाव बनाया गया।
पंचायत व्यवस्था में काम का बढ़ता दबाव
यह घटना केवल एक व्यक्ति की मौत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पंचायत व्यवस्था में कार्यरत कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों पर रोशनी डालती है।
पंचायत सचिवों को अक्सर सीमित संसाधनों, बढ़ते काम और लगातार निरीक्षण के बीच काम करना पड़ता है। योजनाओं का क्रियान्वयन, ऑनलाइन पोर्टल का प्रबंधन, शिकायतों का निराकरण और उच्च अधिकारियों के निर्देशों का पालन, यह सब एक ही व्यक्ति के कंधों पर होता है।
मानसिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक संवेदनशीलता
इस दुखद घटना के बाद पंचायत कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा भी सामने आया है। सचिव संघ का कहना है कि प्रशासनिक तंत्र को यह समझना होगा कि कर्मचारी भी इंसान हैं, मशीन नहीं।
जांच और निरीक्षण आवश्यक हैं, लेकिन उनका तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे भय और मानसिक तनाव न पैदा हो। यदि कार्यप्रणाली में मानवीय दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया, तो ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
ओमप्रकाश गुर्जर की मौत से उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। परिवार के लिए यह सिर्फ एक कर्मचारी की मौत नहीं, बल्कि उनके जीवन के सहारे का अचानक छिन जाना है।
परिवार ने भी निष्पक्ष जांच की मांग की है और उम्मीद जताई है कि उन्हें न्याय मिलेगा।
न्यायिक जांच की मांग क्यों जरूरी
सचिव संघ और परिजन दोनों का मानना है कि केवल विभागीय जांच से सच्चाई सामने नहीं आएगी। वे चाहते हैं कि पूरे मामले की न्यायिक जांच हो, ताकि किसी भी स्तर पर दबाव, लापरवाही या अमानवीय व्यवहार की परतें खुल सकें।
न्यायिक जांच से न केवल दोषियों की पहचान होगी, बल्कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस दिशा-निर्देश भी तय हो सकेंगे।
प्रशासन के लिए चेतावनी
यह घटना प्रशासन के लिए एक चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। यदि जमीनी स्तर पर काम कर रहे कर्मचारियों की सुरक्षा, सम्मान और मानसिक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया, तो व्यवस्था की नींव कमजोर हो सकती है।
एक मजबूत प्रशासन वही होता है, जो अपने कर्मचारियों की भलाई को प्राथमिकता देता है।
आगे की राह
अब सबकी नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी है। क्या जांच निष्पक्ष होगी, क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी, और क्या पंचायत कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।
ओमप्रकाश गुर्जर की मौत केवल एक दुखद घटना न बनकर रह जाए, बल्कि इससे सबक लेकर व्यवस्था में सुधार हो, यही उम्मीद सभी कर रहे हैं।
