मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में जिंसी स्थित स्लॉटर हाउस से जब्त किए गए 26 टन गोमांस का मामला अब केवल एक स्थानीय अपराध नहीं रह गया है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है, यह साफ होता जा रहा है कि यह एक सुनियोजित और संगठित अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क का हिस्सा था, जिसकी जड़ें भारत से बाहर खाड़ी देशों तक फैली हुई थीं। इस खुलासे ने प्रशासन, जांच एजेंसियों और आम जनता सभी को चौंका दिया है।

जिस मामले को शुरुआत में नगर निगम और स्थानीय पुलिस की कार्रवाई माना जा रहा था, वही अब अत्याधुनिक तकनीक, फर्जी दस्तावेजों, सरकारी तंत्र की कथित मिलीभगत और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों से जुड़ा एक बड़ा नेटवर्क बनकर सामने आया है। जांच के केंद्र में असलम कुरैशी उर्फ असलम चमड़ा नाम का व्यक्ति है, जिस पर आरोप है कि वह लंबे समय से प्रतिबंधित गोमांस को विदेशों तक भेजने का कारोबार चला रहा था।
जिंसी स्लॉटर हाउस से शुरू हुई कहानी
भोपाल के जिंसी इलाके में स्थित स्लॉटर हाउस से जब 26 टन गोमांस बरामद हुआ, तब किसी को अंदाजा नहीं था कि यह मामला इतना बड़ा रूप ले लेगा। मौके पर की गई कार्रवाई के बाद जब जांच आगे बढ़ी, तो पता चला कि यहां केवल अवैध कटान नहीं हो रहा था, बल्कि इसे एक संगठित प्रक्रिया के तहत अंजाम दिया जा रहा था।
जांच एजेंसियों के अनुसार गोवंश के कटान के बाद मांस को उसी परिसर में वैज्ञानिक और पेशेवर तरीके से प्रोसेस किया जाता था। पैकेजिंग, स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन के हर चरण में इस बात का ध्यान रखा जाता था कि माल अंतरराष्ट्रीय बाजार के मानकों के अनुरूप दिखे और कहीं भी संदेह न पैदा हो।
असलम कुरैशी और कथित सरकारी संरक्षण
जांच में सामने आया कि इस पूरे नेटवर्क का संचालन असलम कुरैशी उर्फ असलम चमड़ा कर रहा था। आरोप है कि उसे नगर निगम के कुछ अधिकारियों और सरकारी तंत्र के भीतर बैठे लोगों का कथित संरक्षण प्राप्त था। इसी संरक्षण की आड़ में वह वर्षों से प्रतिबंधित गोमांस का कारोबार बेखौफ होकर चला रहा था।
सूत्रों के अनुसार असलम ने अपने लिए ऐसा सिस्टम तैयार किया था, जिसमें हर स्तर पर सुरक्षा कवच मौजूद था। स्थानीय स्तर पर कटान से लेकर दस्तावेज तैयार करने तक और फिर बंदरगाहों के जरिए विदेश भेजने तक, हर जगह उसके संपर्क सक्रिय थे।
फर्जी दस्तावेजों का खेल और पशु चिकित्सकीय प्रमाण-पत्र
इस पूरे तस्करी नेटवर्क की सबसे अहम कड़ी फर्जी दस्तावेज थे। जांच में यह बात सामने आई कि गोवंश के मांस को कागजों में भैंस का मांस दर्शाया जाता था। इसके लिए पशु चिकित्सक के प्रमाण-पत्रों का सहारा लिया जाता था।
आरोप है कि नगर निगम के एक सरकारी पशु चिकित्सक द्वारा जारी किए गए सर्टिफिकेट में मांस को वैध श्रेणी में दिखाया जाता था। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर कस्टम और निर्यात से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी की जाती थीं, जिससे जांच एजेंसियों की नजर से यह खेप बच निकलती थी।
अंतरराष्ट्रीय मानकों जैसी पैकेजिंग
जांच एजेंसियों को यह देखकर भी हैरानी हुई कि जब्त किए गए मांस की पैकेजिंग पूरी तरह कॉर्पोरेट और अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी। हर पैकेट पर विशेष टैग और क्यूआर कोड लगे हुए थे, जिनसे माल की पहचान और ट्रैकिंग की जा सकती थी।
मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए अत्याधुनिक वैक्यूम सीलिंग तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था। इस तकनीक के जरिए न केवल मांस की गुणवत्ता बनाए रखी जाती थी, बल्कि उसकी गंध भी बाहर नहीं आती थी, जिससे परिवहन के दौरान किसी तरह का संदेह न हो।
सुरक्षित कॉरिडोर और बंदरगाहों का इस्तेमाल
तस्करों ने इस पूरे नेटवर्क के लिए एक सुरक्षित कॉरिडोर तैयार कर रखा था। भोपाल से मांस को सीधे मुंबई और चेन्नई जैसे बड़े बंदरगाहों तक भेजा जाता था। वहां से इसे समुद्री मार्ग के जरिए बैंकॉक, दुबई और अन्य खाड़ी देशों तक पहुंचाया जाता था।
कई मामलों में रेलवे पार्सल सेवा का भी दुरुपयोग किया गया। मांस को इस तरह पैक किया जाता था कि वह सामान्य कार्गो जैसा दिखाई दे और किसी को शक न हो।
खाड़ी देशों तक फैला नेटवर्क
जांच में यह भी सामने आया है कि इस तस्करी नेटवर्क के तार केवल भारत तक सीमित नहीं थे। असलम कुरैशी के खाड़ी देशों में सक्रिय संपर्क थे। बताया जा रहा है कि दुबई और आसपास के इलाकों में उसके कारोबारी रिश्ते मजबूत थे।
कुछ सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों का दावा है कि असलम नियमित रूप से दुबई जाता था और वहां उसके संपर्क इस अवैध कारोबार को संभालते थे। हालांकि इन दावों की पुष्टि जांच के बाद ही हो पाएगी, लेकिन इससे मामले की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सामाजिक संगठनों के आरोप और राजनीतिक चुप्पी
इस मामले को लेकर सामाजिक संगठनों ने भी सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर अवैध गतिविधि बिना बड़े लोगों की संलिप्तता के संभव नहीं है। आरोप लगाए गए हैं कि मामले में प्रभावशाली लोग शामिल हैं, लेकिन अब तक किसी बड़े नाम पर कार्रवाई नहीं हुई है।
राज्य के शीर्ष स्तर पर भी इस मामले को लेकर चुप्पी देखी जा रही है, जिससे कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। आम लोगों के बीच यह चर्चा है कि क्या जांच निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ पाएगी।
प्रशासन का पक्ष और जांच की स्थिति
नगर निगम प्रशासन का कहना है कि मामला अभी जांच के अधीन है और पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का दावा है कि दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है और जरूरत पड़ने पर उन्हें दोबारा रिमांड पर लेकर विस्तृत पूछताछ की जाएगी। अब मामले की जांच विशेष जांच दल को सौंप दी गई है, जिससे उम्मीद की जा रही है कि पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो सकेगा।
एसआईटी से उम्मीदें और आगे की राह
विशेष जांच दल को सौंपे जाने के बाद यह उम्मीद जगी है कि जांच अब और गहराई से होगी। एसआईटी के सामने चुनौती केवल यह पता लगाने की नहीं है कि मांस कहां भेजा जा रहा था, बल्कि यह भी है कि इस नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे और उन्हें किस स्तर पर संरक्षण मिल रहा था।
यह मामला प्रशासनिक पारदर्शिता, कानून के पालन और अंतरराष्ट्रीय अपराध से निपटने की क्षमता की भी परीक्षा बन गया है।
निष्कर्ष: एक केस, कई सवाल
भोपाल के जिंसी स्लॉटर हाउस से पकड़ा गया 26 टन गोमांस अब एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की कहानी बन चुका है, जो आधुनिक तकनीक, फर्जी दस्तावेजों और कथित सरकारी संरक्षण के सहारे फल-फूल रहा था।
यह मामला केवल कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम पर भी सवाल खड़े करता है, जो ऐसे अपराधों को पनपने देता है। अब सबकी नजरें एसआईटी की जांच पर टिकी हैं, जिससे उम्मीद की जा रही है कि सच पूरी तरह सामने आएगा और दोषियों को सजा मिलेगी।
