भोपाल शहर के लिए मेट्रो सेवा केवल एक परिवहन परियोजना नहीं, बल्कि आधुनिक शहरी विकास, पर्यावरण के अनुकूल यात्रा और भविष्य की जरूरतों का प्रतीक मानी जा रही थी। जब भोपाल मेट्रो का संचालन शुरू हुआ, तब उम्मीद की जा रही थी कि यह शहर के ट्रैफिक दबाव को कम करेगी, लोगों को आरामदायक और तेज़ यात्रा का विकल्प देगी और राजधानी को एक नई पहचान दिलाएगी। लेकिन संचालन के एक महीने के भीतर ही जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्होंने इन उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

भोपाल मेट्रो इस समय भारी आर्थिक घाटे से जूझ रही है। रोज़ाना जहां इसके संचालन पर करीब आठ लाख रुपये खर्च हो रहे हैं, वहीं टिकट और अन्य माध्यमों से होने वाली आमदनी महज पंद्रह हजार रुपये के आसपास सिमट गई है। यह अंतर न सिर्फ प्रबंधन के लिए चिंता का कारण बना हुआ है, बल्कि आम जनता और नीति-निर्माताओं के लिए भी सोचने का विषय बन गया है कि आखिर इतनी बड़ी परियोजना से अपेक्षित लाभ क्यों नहीं मिल पा रहा।
एक महीने का संचालन और सामने आई सच्चाई
भोपाल मेट्रो के संचालन को अभी एक महीना ही पूरा हुआ है, लेकिन शुरुआती आंकड़े उत्साहजनक नहीं कहे जा सकते। शुरुआत में मेट्रो को लेकर लोगों में उत्सुकता दिखी थी। पहले कुछ दिनों तक यात्रियों की संख्या करीब सात हजार प्रतिदिन तक पहुंची, जिससे यह उम्मीद बनी थी कि धीरे-धीरे यह संख्या और बढ़ेगी।
लेकिन समय के साथ हालात इसके उलट होते चले गए। यात्रियों की संख्या लगातार घटती गई और अब स्थिति यह है कि रोज़ाना केवल 300 से 350 यात्री ही मेट्रो का उपयोग कर रहे हैं। यह गिरावट इतनी तेज़ रही कि मेट्रो प्रबंधन को अपने संचालन कार्यक्रम में बदलाव करने पड़े।
खर्च और कमाई के बीच बढ़ती खाई
किसी भी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के लिए शुरुआती घाटा असामान्य नहीं माना जाता, लेकिन भोपाल मेट्रो के मामले में खर्च और आय के बीच की खाई बेहद चौड़ी नजर आ रही है। रोज़ाना लगभग आठ लाख रुपये का खर्च बिजली, स्टाफ, रखरखाव और अन्य संचालन संबंधी मदों पर हो रहा है। इसके मुकाबले टिकट बिक्री से मिलने वाली आय मात्र पंद्रह हजार रुपये के आसपास है।
यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो मेट्रो का संचालन आर्थिक रूप से टिकाऊ बना रहना मुश्किल हो सकता है। यही वजह है कि विशेषज्ञ और प्रबंधन दोनों ही इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि आखिर कहां चूक हो रही है और इसे कैसे सुधारा जा सकता है।
घटते यात्री और बदला हुआ संचालन शेड्यूल
यात्रियों की संख्या में आई भारी गिरावट का सीधा असर मेट्रो के फेरे पर पड़ा है। कम मांग को देखते हुए प्रबंधन ने 5 जनवरी से सुबह के चार फेरे घटाने का फैसला किया। पहले भोपाल मेट्रो रोज़ाना 17 फेरे लगा रही थी, लेकिन अब यह संख्या घटकर 13 रह गई है।
यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि अनावश्यक खर्च को कुछ हद तक कम किया जा सके। हालांकि, फेरे घटाने के बावजूद आय में कोई खास सुधार नहीं हो पाया है। इससे यह साफ होता है कि समस्या केवल फेरे या समय-सारणी की नहीं, बल्कि मेट्रो के समग्र उपयोग और पहुंच से जुड़ी है।
यात्रियों की कमी के पीछे कारण
भोपाल मेट्रो के प्रति यात्रियों की रुचि कम होने के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। सबसे बड़ा कारण फिलहाल मेट्रो नेटवर्क का सीमित दायरा है। एंड-टू-एंड कनेक्टिविटी न होने के कारण लोगों को अपनी यात्रा के लिए मेट्रो के साथ अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है। इससे समय और खर्च दोनों बढ़ जाते हैं, जिससे लोग मेट्रो की बजाय पुराने विकल्पों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं।
इसके अलावा शहर में पहले से मौजूद बस, ऑटो और निजी वाहनों की सुविधा भी लोगों को मेट्रो की ओर आने से रोक रही है। जब तक मेट्रो सीधे रिहायशी इलाकों, बाजारों और प्रमुख दफ्तरों को नहीं जोड़ेगी, तब तक आम नागरिक के लिए यह पूरी तरह आकर्षक विकल्प नहीं बन पाएगी।
विज्ञापन से उम्मीदें और भविष्य की रणनीति
घाटे से उबरने के लिए भोपाल मेट्रो प्रबंधन की निगाहें अब गैर-टिकट आय पर टिकी हैं। विज्ञापन को एक बड़े विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। मेट्रो कोच, स्टेशन और आसपास के क्षेत्रों में विज्ञापन के जरिए अतिरिक्त आय अर्जित करने की योजना पर काम किया जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मेट्रो को व्यावसायिक दृष्टि से बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया जाए, तो विज्ञापन से होने वाली कमाई घाटे को कुछ हद तक कम कर सकती है। इसके साथ ही भविष्य में जैसे-जैसे मेट्रो नेटवर्क का विस्तार होगा और एंड-टू-एंड कनेक्टिविटी बेहतर होगी, यात्रियों की संख्या बढ़ने की उम्मीद भी जताई जा रही है।
शहर के विकास और मेट्रो का महत्व
भोपाल जैसे तेजी से बढ़ते शहर के लिए मेट्रो दीर्घकालिक जरूरत मानी जाती है। बढ़ती आबादी, बढ़ता ट्रैफिक और प्रदूषण की समस्या को देखते हुए मेट्रो जैसी आधुनिक परिवहन व्यवस्था का महत्व और भी बढ़ जाता है। हालांकि, शुरुआती दौर में घाटा होना स्वाभाविक है, लेकिन इसके लिए ठोस रणनीति और जनता का भरोसा जीतना जरूरी होता है।
यदि मेट्रो को शहर के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बनाया जाए, समय-सारणी को यात्रियों की जरूरतों के अनुसार ढाला जाए और अन्य परिवहन साधनों के साथ बेहतर तालमेल बैठाया जाए, तो स्थिति में सुधार संभव है।
आम जनता की प्रतिक्रिया और उम्मीदें
भोपाल के कई नागरिक मानते हैं कि मेट्रो एक अच्छी पहल है, लेकिन फिलहाल यह उनकी जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर पा रही है। लोगों की राय है कि जब तक मेट्रो उन्हें उनके घर के पास से गंतव्य तक सहज रूप से नहीं पहुंचाएगी, तब तक इसका उपयोग सीमित ही रहेगा।
वहीं कुछ लोग इसे भविष्य की निवेश योजना मानते हैं। उनका कहना है कि मेट्रो का असली फायदा तब सामने आएगा, जब इसका पूरा नेटवर्क तैयार हो जाएगा और शहर के प्रमुख हिस्से आपस में जुड़ जाएंगे।
आर्थिक संकट या अस्थायी चुनौती
भोपाल मेट्रो के सामने मौजूदा घाटा एक बड़ी चुनौती जरूर है, लेकिन इसे पूरी तरह असफलता कहना जल्दबाजी होगी। देश के कई शहरों में मेट्रो परियोजनाओं को शुरुआती वर्षों में इसी तरह की आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा है। समय के साथ, नेटवर्क विस्तार और यात्रियों की संख्या बढ़ने पर स्थिति में सुधार भी देखने को मिला है।
हालांकि, भोपाल मेट्रो के लिए यह जरूरी है कि वह इस शुरुआती दौर में ही अपनी कमजोरियों को पहचाने और उन्हें दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाए।
आगे का रास्ता और जरूरी फैसले
आने वाले महीनों में यह तय होगा कि भोपाल मेट्रो किस दिशा में आगे बढ़ती है। क्या विज्ञापन और अन्य आय स्रोत इसे राहत देंगे, या फिर यात्रियों की संख्या बढ़ाने के लिए बड़े बदलाव करने होंगे। यह भी संभव है कि समय के साथ लोग मेट्रो को अपनाने लगें, जैसे अन्य शहरों में हुआ है।
फिलहाल, भोपाल मेट्रो की रफ्तार पर घाटे का ब्रेक लगा हुआ है। यह ब्रेक अस्थायी साबित होगा या लंबे समय तक बना रहेगा, इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।
