इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश कर चुकी दुनिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां शीत युद्ध की छाया दोबारा गहराने लगी है। फरवरी 2026 में अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियारों की संख्या सीमित करने वाली अंतिम प्रमुख संधि ‘न्यू स्टार्ट’ की अवधि समाप्त होने जा रही है। यह केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज़ की समाप्ति नहीं है, बल्कि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक गहरी चिंता का संकेत भी है।

बीते सात दशकों में परमाणु हथियारों ने दुनिया को जितना सुरक्षित बनाया है, उससे कहीं अधिक असुरक्षित भी किया है। ‘न्यू स्टार्ट’ संधि को उस संतुलन की आखिरी दीवार माना जाता है, जो अमेरिका और रूस जैसे महाशक्तियों को असीमित परमाणु विस्तार से रोकती रही है। इसके समाप्त होने के साथ ही यह सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि क्या दुनिया एक नई और अधिक खतरनाक परमाणु हथियारों की होड़ की ओर बढ़ रही है।
द्वितीय विश्व युद्ध से शुरू हुई परमाणु प्रतिस्पर्धा
परमाणु हथियारों की कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शुरू होती है, जब जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन एक-दूसरे से पहले इस विनाशकारी शक्ति को हासिल करने की कोशिश में लगे थे। उस समय अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा ने मिलकर एक अत्यंत गोपनीय परियोजना शुरू की, जिसे इतिहास में ‘मैनहट्टन प्रोजेक्ट’ के नाम से जाना गया। इस परियोजना का उद्देश्य नाजी जर्मनी से पहले परमाणु बम विकसित करना था।
अमेरिका के लॉस एलामोस में वैज्ञानिकों ने इस परियोजना के तहत पहला परमाणु बम तैयार किया। 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए हमलों ने न केवल युद्ध की दिशा बदली, बल्कि यह भी दिखा दिया कि परमाणु हथियार मानव सभ्यता के लिए कितने भयावह हो सकते हैं। अमेरिका आज भी इकलौता देश है जिसने युद्ध में परमाणु हथियारों का प्रयोग किया है।
सोवियत संघ की एंट्री और हथियारों की दौड़
मैनहट्टन प्रोजेक्ट पूरी तरह गुप्त नहीं रह सका। सोवियत संघ को एक जासूस के माध्यम से इस परियोजना की जानकारी मिल गई थी। इसके बाद उसने भी अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज़ी से आगे बढ़ाया और 1949 में कज़ाख़स्तान में पहला परमाणु परीक्षण किया। यहीं से अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हुई।
दोनों महाशक्तियों के पास जितने अधिक हथियार होते गए, उतना ही यह एहसास गहराता गया कि एक गलती पूरी दुनिया को तबाह कर सकती है। इसी डर ने हथियार नियंत्रण पर बातचीत की नींव रखी, लेकिन इसे ठोस रूप लेने में कई दशक लग गए।
हथियार नियंत्रण की पहली कोशिशें
1970 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ ने पहली बार गंभीर रूप से परमाणु हथियारों की सीमा तय करने पर बातचीत शुरू की। 1971 में ‘स्ट्रैटेजिक आर्म्स लिमिटेशन टॉक्स’ यानी साल्ट-1 समझौता हुआ, जिसमें पहली बार परमाणु मिसाइलों की संख्या सीमित करने पर सहमति बनी। हालांकि इसमें सभी प्रकार के हथियार शामिल नहीं थे।
इसके बाद 1979 में साल्ट-2 पर सहमति बनी, लेकिन सोवियत संघ द्वारा अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप के कारण अमेरिका ने इस पर औपचारिक मंज़ूरी नहीं दी। इसके बावजूद दोनों देशों ने लंबे समय तक इसकी शर्तों का पालन किया, जो उस दौर की राजनीतिक समझदारी को दर्शाता है।
आईएनएफ संधि और शीत युद्ध का अंत
1980 के दशक के उत्तरार्ध में परमाणु हथियार नियंत्रण को लेकर एक बड़ा मोड़ आया। अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत संघ के नेता मिखाइल गोर्बाचेव ने परमाणु हथियार मुक्त विश्व की कल्पना को आगे बढ़ाया। इसी सोच के परिणामस्वरूप 1987 में इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लियर फोर्सेज यानी आईएनएफ संधि पर हस्ताक्षर हुए।
इस संधि के तहत 500 से 5500 किलोमीटर तक मार करने वाली परमाणु मिसाइलों को नष्ट करने का निर्णय लिया गया। यह पहला मौका था जब दोनों देशों ने पूरी एक श्रेणी के परमाणु हथियार खत्म करने पर सहमति जताई। इससे शीत युद्ध के तनाव को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई।
हालांकि बाद के वर्षों में इस संधि पर भी सवाल उठे। नाटो का आरोप था कि रूस ने मध्यम दूरी की नई मिसाइलें विकसित कर इस समझौते का उल्लंघन किया। रूस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया। अंततः 2019 में अमेरिका ने इस संधि से खुद को अलग कर लिया और बाद में रूस ने भी इसे मानने से इनकार कर दिया।
परमाणु अप्रसार संधि और उसकी सीमाएं
परमाणु हथियारों की बढ़ती संख्या और संभावित तबाही को देखते हुए 1970 में परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी लागू की गई। इसका उद्देश्य था कि जिन देशों के पास पहले से परमाणु हथियार हैं, वे धीरे-धीरे उनकी संख्या घटाएं और जिनके पास नहीं हैं, वे इन्हें हासिल करने की कोशिश न करें।
इसके बदले गैर-परमाणु देशों को शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के लिए तकनीकी सहयोग देने का वादा किया गया। इस संधि को दुनिया की सबसे सफल हथियार नियंत्रण संधियों में से एक माना जाता है, क्योंकि इसके बाद परमाणु हथियारों की संख्या 70 हज़ार से घटकर लगभग 13 हज़ार रह गई।
हालांकि इस संधि की अपनी सीमाएं भी रहीं। भारत, पाकिस्तान और इसराइल ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए। उत्तर कोरिया पहले इसका हिस्सा था, लेकिन बाद में इससे बाहर निकल गया और अपने परमाणु हथियार विकसित किए।
दुनिया में कितने देशों के पास परमाणु हथियार
वर्तमान में नौ देशों के पास परमाणु हथियार होने की पुष्टि मानी जाती है। रूस के पास लगभग चार हज़ार और अमेरिका के पास करीब 3700 परमाणु हथियार हैं। इनके अलावा भारत, पाकिस्तान, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और उत्तर कोरिया भी परमाणु शक्ति संपन्न हैं। इसराइल ने अपने परमाणु हथियारों को लेकर कभी आधिकारिक पुष्टि या खंडन नहीं किया, लेकिन अनुमान है कि उसके पास लगभग 90 परमाणु हथियार हो सकते हैं।
1960 के दशक में यह आशंका थी कि दुनिया के 40 से 50 देश परमाणु हथियार हासिल कर लेंगे, लेकिन एनपीटी के कारण यह संख्या सीमित रही। इसके बावजूद हाल के वर्षों में कई देश अपने परमाणु भंडार को आधुनिक बनाने और बढ़ाने में लगे हुए हैं।
न्यू स्टार्ट संधि: आखिरी सुरक्षा कवच
2009 में अमेरिका और रूस ने एक नई संधि पर बातचीत शुरू की, जिसे ‘न्यू स्टार्ट’ नाम दिया गया। 2010 में इस पर हस्ताक्षर हुए और 2011 से यह लागू हुई। इस संधि के तहत दोनों देशों द्वारा तैनात परमाणु हथियारों की संख्या 1550 तक सीमित की गई।
इस संधि की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें पारदर्शिता और निरीक्षण की व्यवस्था थी। दोनों देशों को साल में दो बार एक-दूसरे को अपने हथियारों की संख्या की जानकारी देनी होती थी और वे एक-दूसरे के परमाणु ठिकानों का निरीक्षण भी कर सकते थे।
यूक्रेन युद्ध और संधि पर बढ़ता तनाव
कोविड महामारी के दौरान निरीक्षण प्रक्रिया बाधित हुई। इसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने हालात और बिगाड़ दिए। अमेरिका की प्रतिक्रिया से नाराज़ होकर रूस ने अमेरिकी निरीक्षकों को अपने ठिकानों तक पहुंच देने से इनकार कर दिया। अमेरिका ने रूस पर संधि उल्लंघन के आरोप लगाए।
अब जबकि ‘न्यू स्टार्ट’ की अवधि फरवरी 2026 में समाप्त होने जा रही है और इसे पहले ही एक बार बढ़ाया जा चुका है, इसके आगे विस्तार की संभावना बेहद कम दिख रही है।
न्यू स्टार्ट के बाद क्या होगा
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘न्यू स्टार्ट’ के खत्म होने के बाद अचानक हथियारों की संख्या बढ़ेगी, यह जरूरी नहीं है। लेकिन उन्हें सीमित रखने वाले नियम और पारदर्शिता की व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, जो सबसे बड़ी चिंता है।
बहुपक्षीय संधि की संभावना भी फिलहाल कमजोर दिखती है। चीन, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों की अलग-अलग सुरक्षा चिंताएं हैं, जिससे किसी साझा समझौते पर सहमति बनना मुश्किल है।
गैर-परमाणु देशों की बदलती सोच
परमाणु हथियार नियंत्रण व्यवस्था के कमजोर होने से गैर-परमाणु देशों की सोच भी बदल सकती है। उत्तर कोरिया का उदाहरण दिखाता है कि परमाणु हथियार होने से अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करना आसान हो जाता है। इससे कई देश यह सोचने पर मजबूर हो सकते हैं कि उनकी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार जरूरी हैं।
निष्कर्ष: अनिश्चित भविष्य और बढ़ता खतरा
‘न्यू स्टार्ट’ संधि की समाप्ति केवल अमेरिका और रूस की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए चेतावनी है। हथियार नियंत्रण की आखिरी बड़ी दीवार के गिरने से वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था और अधिक अस्थिर हो सकती है।
आज दुनिया फिर उसी सवाल के सामने खड़ी है, जो शीत युद्ध के दौर में पूछा गया था। क्या मानवता इस विनाशकारी शक्ति को नियंत्रित कर पाएगी या इतिहास खुद को दोहराएगा। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव कहीं ज्यादा बड़ा है।
