दक्षिण एशिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था में पाकिस्तान अक्सर अपने वित्तीय संकट, विदेशी कर्ज और अस्थिरता के कारण चर्चा में रहता है। लेकिन हाल के वर्षों में एक ऐसा बदलाव सामने आया है जिसने न केवल अंतरराष्ट्रीय मीडिया बल्कि पड़ोसी देशों का भी ध्यान खींचा है। यह बदलाव किसी बड़े उद्योग, तकनीकी क्रांति या ऊर्जा परियोजना से नहीं, बल्कि एक ऐसे पशु से जुड़ा है जिसे अब तक हाशिए पर रखा जाता रहा है। पाकिस्तान में गधों की आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है और यह संख्या 60 लाख के पार पहुंच चुकी है।

यह वृद्धि संयोग नहीं है। इसके पीछे एक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कारण छिपा है और वह है चीन की बढ़ती मांग। बीते पांच वर्षों में पाकिस्तान दुनिया में गधों की आबादी के लिहाज से तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। यह स्थिति पाकिस्तान के लिए अवसर और चुनौती दोनों बनकर सामने आई है।
गधों की बढ़ती संख्या और उसके पीछे का कारण
पाकिस्तान के पशुपालन और कृषि से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि गधों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। यह वृद्धि प्राकृतिक प्रजनन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक प्रक्रिया का हिस्सा बनती जा रही है। ग्रामीण इलाकों में गधों को पालने की प्रवृत्ति बढ़ी है और कई क्षेत्रों में यह आजीविका का नया साधन बन रहा है।
इस पूरी कहानी के केंद्र में चीन है, जो पाकिस्तान का पुराना रणनीतिक और आर्थिक साझेदार माना जाता है। चीन में गधों की खाल की मांग तेजी से बढ़ी है और इसी मांग ने पाकिस्तान को एक नए व्यापारिक अवसर के रूप में उभारा है।
एजियाओ: एक पारंपरिक उत्पाद, आधुनिक बाजार
चीन में गधों की खाल का उपयोग जिस उत्पाद के लिए किया जाता है, उसे एजियाओ कहा जाता है। यह एक पारंपरिक चीनी औषधीय और सौंदर्य उत्पाद है, जिसका इस्तेमाल सौंदर्य प्रसाधनों, स्वास्थ्य टॉनिक और कई प्रकार की दवाओं में किया जाता है। पारंपरिक चीनी चिकित्सा पद्धति में एजियाओ को रक्तवर्धक और त्वचा के लिए लाभकारी माना जाता है।
पिछले एक दशक में एजियाओ उद्योग में जबरदस्त विस्तार हुआ है। बीजिंग स्थित बिजनेस और फाइनेंस कंसल्टिंग फर्म न्यूजिजी के अनुसार, वर्ष 2023 तक इस उद्योग का बाजार आकार 8 अरब डॉलर से अधिक हो चुका था। जैसे-जैसे चीन में मध्यम वर्ग की आय बढ़ी, वैसे-वैसे सौंदर्य और स्वास्थ्य उत्पादों की मांग भी तेज हुई और इसी के साथ गधों की खाल की जरूरत भी कई गुना बढ़ गई।
अफ्रीका से पाकिस्तान तक: सप्लाई चेन में बड़ा बदलाव
लंबे समय तक चीन अपनी गधों की खाल की जरूरत के लिए अफ्रीकी देशों पर निर्भर रहा। कई अफ्रीकी देशों में बड़े पैमाने पर गधों का निर्यात चीन को किया जाता था। लेकिन इस व्यापार के गंभीर सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम सामने आने लगे। स्थानीय परिवहन, खेती और ग्रामीण जीवन पर गधों की कमी का असर दिखने लगा।
इन परिस्थितियों को देखते हुए फरवरी 2024 में अफ्रीकी संघ ने गधों की खाल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। यह फैसला चीन के लिए एक बड़ा झटका था क्योंकि उसकी एजियाओ इंडस्ट्री की सप्लाई चेन अचानक टूट गई।
इसी खाली जगह को भरने के लिए चीनी खरीदारों की नजर पाकिस्तान पर गई। पाकिस्तान में पहले से ही बड़ी संख्या में गधे मौजूद थे और ग्रामीण इलाकों में इन्हें पालने की परंपरा भी रही है।
पहले भी हो चुका है यह कारोबार
यह पहली बार नहीं है जब चीन ने गधों के लिए पाकिस्तान की ओर रुख किया हो। वर्ष 2014 और 2015 के बीच इस व्यापार में तेज़ी आई थी और उस दौरान लगभग दो लाख गधों की खाल चीन को निर्यात की गई थी। हालांकि उस समय पाकिस्तान सरकार ने इस पर सख्ती दिखाई थी।
सरकार को आशंका थी कि गधों का मांस घरेलू बाजार में बेचा जा सकता है, जबकि इस्लाम में गधे का मांस हराम यानी वर्जित माना जाता है। इसी कारण आधिकारिक तौर पर इस व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
प्रतिबंध के बावजूद जारी रहा अनौपचारिक व्यापार
सरकारी रोक के बावजूद यह व्यापार पूरी तरह बंद नहीं हुआ। पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अनौपचारिक और अवैध तरीके से गधों की खाल का निर्यात जारी रहा। कई मामलों में स्थानीय एजेंट और विदेशी खरीदारों की मिलीभगत सामने आई।
कुछ मामलों में एक खाल की कीमत 3 लाख पाकिस्तानी रुपये तक पहुंचने की खबरें आईं। एक चर्चित मामले में एक चीनी नागरिक और उसके पाकिस्तानी सहयोगियों पर केस भी दर्ज किया गया था। इस घटना ने पाकिस्तान में एक नई बहस को जन्म दिया कि क्या आर्थिक लाभ के लिए धार्मिक निषेधों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
ग्वादर में गधा बूचड़खाना और नया अध्याय
फरवरी 2025 में इस व्यापार ने एक नया और औपचारिक रूप ले लिया जब चीन की की हैंगेंग ट्रेड कंपनी ने पाकिस्तान के ग्वादर में 70 लाख डॉलर की लागत से एक गधा बूचड़खाना स्थापित किया। यह परियोजना चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जुड़े क्षेत्र में स्थित है, जिससे इसके रणनीतिक महत्व पर भी चर्चा शुरू हो गई।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, इस बूचड़खाने से चीन को हर साल लगभग 3 लाख गधों की सप्लाई किए जाने की योजना है। यह आंकड़ा पाकिस्तान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा माना जा रहा है, लेकिन इसके साथ ही कई गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
आर्थिक अवसर या दीर्घकालिक खतरा
पाकिस्तान में कई किसान और पशुपालक इस व्यापार को आर्थिक संजीवनी के रूप में देख रहे हैं। बढ़ती कीमतों के कारण गधों को पालना अब लाभकारी माना जाने लगा है। कुछ क्षेत्रों में तो यह आय का प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है।
लेकिन दूसरी ओर विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि मौजूदा गति से गधों का निर्यात जारी रहा तो आने वाले वर्षों में पाकिस्तान में भी गधों की आबादी तेजी से घट सकती है। अफ्रीकी देशों का उदाहरण सामने है, जहां इस व्यापार के कारण स्थानीय परिवहन और कृषि व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचा।
सामाजिक और धार्मिक पहलू
इस पूरे घटनाक्रम का एक संवेदनशील पहलू धार्मिक और सामाजिक भी है। गधे का मांस इस्लाम में वर्जित है, इसलिए यह सवाल उठता है कि क्या केवल खाल के लिए बड़े पैमाने पर इस पशु का वध समाज में स्वीकार्य होगा।
कुछ धार्मिक विद्वान इसे आर्थिक मजबूरी से जोड़कर देखते हैं, जबकि अन्य इसे नैतिक और धार्मिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं। यह बहस आने वाले समय में और तेज़ हो सकती है।
चीन-पाकिस्तान संबंधों का नया आयाम
यह व्यापार चीन और पाकिस्तान के संबंधों को एक नए स्तर पर ले जाता है। जहां एक ओर यह आर्थिक सहयोग का उदाहरण है, वहीं दूसरी ओर यह पाकिस्तान की संसाधन-आधारित अर्थव्यवस्था की सीमाओं को भी उजागर करता है।
चीन की मांग के अनुरूप उत्पादन बढ़ाना अल्पकालिक लाभ दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में इसके परिणामों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
निष्कर्ष: अवसर और चेतावनी साथ-साथ
पाकिस्तान में गधों की बढ़ती आबादी और चीन को उनकी सप्लाई एक असामान्य लेकिन महत्वपूर्ण आर्थिक कहानी बन गई है। यह कहानी दिखाती है कि वैश्विक बाजार कैसे स्थानीय जीवन को प्रभावित करता है।
यह अवसर पाकिस्तान को कुछ समय के लिए आर्थिक राहत दे सकता है, लेकिन यदि संतुलन नहीं बनाया गया तो यही अवसर भविष्य में एक नई समस्या का रूप भी ले सकता है।
