भारत का कॉर्पोरेट परिदृश्य एक गहरे और निर्णायक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। जिस देश में हर साल लाखों युवा इंजीनियरिंग, विज्ञान और तकनीकी डिग्रियां लेकर नौकरी के सपने सजाते हैं, वहीं अब वही डिग्रियां अकेले पर्याप्त नहीं मानी जा रहीं। भारत की बड़ी कंपनियां, जिन्हें सामूहिक रूप से इंडिया इंक कहा जाता है, अब फ्रेश ग्रेजुएट्स की बड़े पैमाने पर भर्ती से पीछे हटती दिख रही हैं। इसकी जगह वे उन युवाओं को प्राथमिकता दे रही हैं जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स, क्लाउड कंप्यूटिंग और ऑटोमेशन जैसे उन्नत तकनीकी क्षेत्रों में पहले से दक्ष हैं।

यह बदलाव केवल भर्ती संख्या में कटौती तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय रोजगार बाजार की सोच और दिशा दोनों को बदल रहा है। यह एक ऐसा मोड़ है जहां डिग्री आधारित सिस्टम से हटकर कौशल आधारित अर्थव्यवस्था आकार ले रही है।
इंडिया इंक की नई सोच: संख्या नहीं, दक्षता महत्वपूर्ण
बीते एक दशक तक भारत की कॉर्पोरेट कंपनियां बड़े पैमाने पर कैंपस प्लेसमेंट के जरिए फ्रेश ग्रेजुएट्स को नौकरी देती थीं। खासकर STEM यानी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित से जुड़े छात्रों के लिए अवसर अपेक्षाकृत अधिक थे। लेकिन अब यह मॉडल तेजी से अप्रासंगिक होता जा रहा है।
कंपनियां महसूस कर रही हैं कि नए कर्मचारियों को ट्रेन करने में लगने वाला समय, लागत और संसाधन उनके व्यवसायिक लक्ष्यों को धीमा कर रहा है। तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया में कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों की जरूरत है जो पहले दिन से ही उत्पादक हों। यही कारण है कि इंडिया इंक अब वर्कफोर्स की संख्या बढ़ाने के बजाय विशेष विशेषज्ञता हासिल करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
फ्रेशर हायरिंग में ऐतिहासिक गिरावट
स्टाफिंग सेक्टर से जुड़े आंकड़े इस बदलाव को साफ तौर पर दर्शाते हैं। वित्तीय वर्ष 2022 में जहां STEM फ्रेशर्स की भर्ती लगभग चार लाख तक पहुंच गई थी, वहीं अगले ही वर्षों में इसमें लगातार गिरावट दर्ज की गई। वित्तीय वर्ष 2023 में यह संख्या घटकर लगभग दो लाख तीस हजार रह गई। इसके बाद वित्तीय वर्ष 2024 में यह और गिरकर डेढ़ लाख के आसपास पहुंच गई।
वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए अनुमान और भी चिंताजनक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि STEM फ्रेशर हायरिंग अब केवल डेढ़ लाख के आसपास ही सिमट सकती है। इसका अर्थ यह है कि केवल चार वर्षों में भारत में तकनीकी स्नातकों की एंट्री लेवल भर्तियों में लगभग साठ प्रतिशत तक की गिरावट आ चुकी है।
केवल 70 प्रतिशत कंपनियां ही कर रही फ्रेशर भर्ती की योजना
कॉर्पोरेट सेक्टर की बदलती प्राथमिकताओं का एक और संकेत यह है कि अब सभी कंपनियां फ्रेशर्स को भर्ती करने में रुचि नहीं दिखा रहीं। हालिया आकलनों के अनुसार, इस वित्तीय वर्ष में केवल लगभग सत्तर से चौहत्तर प्रतिशत कंपनियां ही फ्रेश ग्रेजुएट्स को नियुक्त करने की योजना बना रही हैं।
इसका मतलब यह है कि हर चार में से एक कंपनी अब सीधे तौर पर फ्रेशर्स को नजरअंदाज कर रही है। यह स्थिति उन युवाओं के लिए और भी कठिन हो जाती है जो पारंपरिक शिक्षा प्रणाली से निकलकर सीधे नौकरी बाजार में प्रवेश करना चाहते हैं।
डिग्री से आगे बढ़ चुकी है कंपनियों की अपेक्षा
अब कंपनियों के लिए केवल इंजीनियरिंग या साइंस की डिग्री होना पर्याप्त नहीं रह गया है। नियोक्ता उन उम्मीदवारों को तरजीह दे रहे हैं जिन्हें क्लाउड प्लेटफॉर्म्स, डेटा पाइपलाइंस, मशीन लर्निंग मॉडल्स, ऑटोमेशन टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के व्यावहारिक उपयोग का अनुभव हो।
यह बदलाव इस बात का संकेत है कि शिक्षा और उद्योग के बीच की खाई अब और स्पष्ट हो गई है। विश्वविद्यालय जहां अभी भी सैद्धांतिक शिक्षा पर अधिक जोर देते हैं, वहीं उद्योग को ऐसे प्रोफेशनल्स चाहिए जो वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सकें।
वेतन बढ़ा, लेकिन अवसर घटे
दिलचस्प बात यह है कि जहां एक ओर फ्रेशर्स के लिए नौकरियों की संख्या घट रही है, वहीं दूसरी ओर विशेष कौशल रखने वाले उम्मीदवारों के वेतन में वृद्धि देखी जा रही है।
सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग और डेटा से जुड़े एंट्री लेवल पदों के लिए औसत वार्षिक वेतन वर्ष 2020 में लगभग साढ़े तीन लाख रुपये था, जो 2025 में बढ़कर पांच लाख रुपये तक पहुंच गया। इसी तरह STEM फ्रेशर्स के लिए औसत वेतन भी एक साल में तीन लाख से बढ़कर चार लाख रुपये के करीब पहुंच गया है।
यह स्पष्ट संकेत है कि कंपनियां अब कम लोगों को भर्ती कर रही हैं, लेकिन उन्हें बेहतर भुगतान देने को तैयार हैं, बशर्ते उनके पास सही कौशल हो।
AI और डेटा स्किल्स बने नई भर्ती की धुरी
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल एक तकनीकी शब्द नहीं रह गया है, बल्कि यह हर उद्योग की रीढ़ बनता जा रहा है। वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा, ई-कॉमर्स और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में AI आधारित समाधान तेजी से अपनाए जा रहे हैं।
इसी वजह से कंपनियां उन युवाओं की तलाश में हैं जो केवल कोड लिखना नहीं जानते, बल्कि डेटा को समझकर उससे व्यावसायिक निर्णय निकाल सकें। मशीन लर्निंग, डेटा साइंस और क्लाउड आर्किटेक्चर जैसे कौशल अब सबसे अधिक मांग में हैं।
स्टार्टअप्स की नई रणनीति: लीन और स्मार्ट
केवल बड़ी कंपनियां ही नहीं, बल्कि स्टार्टअप्स भी इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। कई नए और स्थापित स्टार्टअप्स ने अपने संगठनात्मक ढांचे को छोटा और अधिक कुशल बनाने का फैसला किया है।
कुछ कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की संख्या में कटौती करते हुए केवल उन भूमिकाओं पर ध्यान केंद्रित किया है जो सीधे तौर पर बिजनेस ग्रोथ से जुड़ी हैं। इन संगठनों का मानना है कि सीमित लेकिन अत्यधिक कुशल टीम ही तेजी से बदलते बाजार में टिक सकती है।
कैंपस हायरिंग मॉडल पर पुनर्विचार
कभी भारत की पहचान रही बड़े पैमाने की कैंपस हायरिंग अब कंपनियों के लिए सवालों के घेरे में है। कॉर्पोरेट नेतृत्व यह समझने लगा है कि हजारों फ्रेशर्स को एक साथ भर्ती कर उन्हें प्रशिक्षित करने में लगने वाला खर्च अब उचित रिटर्न नहीं दे पा रहा।
इसके बजाय कंपनियां अब चुनिंदा संस्थानों से, चुनिंदा प्रोफाइल्स के लिए, लक्षित भर्ती करना ज्यादा प्रभावी मान रही हैं। इससे प्रशिक्षण लागत कम होती है और उत्पादकता तेजी से बढ़ती है।
डिजिटल साक्षरता से डिजिटल विशेषज्ञता तक
एक समय था जब बेसिक कंप्यूटर नॉलेज और प्रोग्रामिंग भाषा का ज्ञान ही पर्याप्त माना जाता था। लेकिन अब यह स्तर काफी पीछे छूट चुका है। डिजिटल परिवर्तन की अगली लहर में कंपनियों को ऐसे विशेषज्ञ चाहिए जो जटिल तकनीकों का रणनीतिक उपयोग कर सकें।
अब मांग केवल डिजिटल साक्षरता की नहीं, बल्कि डिजिटल विशेषज्ञता की है। यही कारण है कि AI, डेटा और ऑटोमेशन में दक्ष युवाओं को बाकी सभी पर बढ़त मिल रही है।
भविष्य की तस्वीर: युवाओं के लिए सीख
भारतीय रोजगार बाजार में यह बदलाव अस्थायी नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। यह संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में भी पारंपरिक डिग्री आधारित भर्ती मॉडल वापस नहीं लौटेगा।
जो युवा भविष्य में सुरक्षित और बेहतर करियर चाहते हैं, उन्हें निरंतर सीखने, नई तकनीकों को अपनाने और उद्योग की जरूरतों के अनुरूप खुद को ढालने की आवश्यकता होगी। केवल डिग्री नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल स्किल्स ही रोजगार की कुंजी बनेंगी।
निष्कर्ष: बदलते समय की मांग
इंडिया इंक का यह नया रुख भारतीय युवाओं के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इस बात की कि पुराने रास्ते अब उतने कारगर नहीं रहे, और अवसर इस मायने में कि जो युवा खुद को नई तकनीकों में दक्ष बनाएंगे, उनके लिए संभावनाओं के दरवाजे अब भी खुले हैं।
भारत का रोजगार बाजार अब गुणवत्ता को प्राथमिकता दे रहा है, और यही भविष्य की दिशा तय करेगा।
