इंदौर शहर में वर्षों तक यातायात व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा रहे बीआरटीएस कॉरिडोर को हटाने की प्रक्रिया अब एक नए और अहम चरण में प्रवेश कर चुकी है। जहां पहले सड़क के बीच बने कॉरिडोर, लेन डिवाइडर और पिलर्स हटाने पर ध्यान दिया जा रहा था, वहीं अब सबसे बड़ी चुनौती बीआरटीएस के बस स्टॉप और बची हुई रेलिंग को हटाना बन गई है। नगर निगम ने इस काम को पूरा करने के लिए अलग से टेंडर प्रक्रिया शुरू करने का फैसला लिया है, जिससे यह स्पष्ट हो गया है कि बीआरटीएस को पूरी तरह समाप्त करने की दिशा में प्रशासन कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहता।

पुरानी एजेंसी के हटने से अटका काम
बीआरटीएस हटाने का कार्य पहले एक एजेंसी को सौंपा गया था, लेकिन बीच में ही उस एजेंसी ने काम अधूरा छोड़ दिया। इसके पीछे कारणों को लेकर कई तरह की चर्चाएं रहीं, लेकिन परिणाम यह हुआ कि बस स्टॉप और बड़ी मात्रा में लगी स्टील रेलिंग जस की तस रह गई। इससे न केवल ट्रैफिक प्लानिंग प्रभावित हुई बल्कि शहर की सूरत भी अधूरी और अव्यवस्थित नजर आने लगी। निगम अधिकारियों के अनुसार, पुरानी एजेंसी के अचानक काम छोड़ देने से परियोजना को दोबारा व्यवस्थित करना पड़ा और अब हर हिस्से के लिए अलग-अलग रणनीति अपनाई जा रही है।
बस स्टॉप तोड़ना क्यों बन गया चुनौती
बीआरटीएस के बस स्टॉप सामान्य बस स्टॉप से कहीं अधिक मजबूत और भारी संरचना वाले हैं। इनमें मोटे स्टील फ्रेम, मजबूत छत, प्लेटफॉर्म और सुरक्षा रेलिंग लगी हुई है। इन संरचनाओं को हटाने के लिए विशेष मशीनरी, अनुभवी श्रमिक और सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि नगर निगम ने इसे सामान्य तोड़फोड़ कार्य की बजाय एक अलग ठेके के रूप में देने का निर्णय लिया है।
नए टेंडर की तैयारी और ठेकेदारों को संदेश
नगर निगम ने साफ कर दिया है कि जो भी ठेकेदार इस काम को लेना चाहते हैं, उन्हें विधिवत टेंडर प्रक्रिया में हिस्सा लेना होगा। निगम का उद्देश्य यह है कि काम पारदर्शी तरीके से हो, समय पर पूरा हो और किसी भी तरह की लापरवाही से बचा जा सके। अधिकारियों का कहना है कि इस बार टेंडर की शर्तें पहले से अधिक सख्त होंगी, ताकि बीच में काम छोड़ने जैसी स्थिति दोबारा पैदा न हो।
बीआरटीएस से निकलेगा 1.53 लाख किलो स्टील
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बीआरटीएस के बस स्टॉप और रेलिंग हटाने से लगभग 1.53 लाख किलो स्टील निकलेगा। यह स्टील नगर निगम के लिए एक बड़ी संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है। निगम की योजना है कि इस स्क्रैप स्टील का उचित मूल्यांकन कर नीलामी की जाए या फिर इसे अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं में उपयोग में लाया जाए। इससे निगम को आर्थिक लाभ भी होगा और संसाधनों का पुनः उपयोग भी सुनिश्चित किया जा सकेगा।
शहर की यातायात व्यवस्था पर पड़ेगा असर
बीआरटीएस बस स्टॉप हटाने का काम आसान नहीं है और इसे करते समय यातायात प्रबंधन एक बड़ी चुनौती रहेगा। निगम ने संकेत दिए हैं कि काम चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा ताकि आम नागरिकों को कम से कम परेशानी हो। कुछ इलाकों में अस्थायी डायवर्जन, गति सीमा में बदलाव और अतिरिक्त ट्रैफिक पुलिस की तैनाती की जा सकती है।
बीआरटीएस हटाने के पीछे का उद्देश्य
बीआरटीएस को हटाने का निर्णय लंबे समय से चर्चा में था। समय के साथ यह महसूस किया गया कि यह कॉरिडोर शहर की मौजूदा ट्रैफिक जरूरतों के अनुरूप नहीं रहा। निजी वाहनों की बढ़ती संख्या, सड़क चौड़ीकरण की आवश्यकता और जाम की समस्या को देखते हुए इसे हटाने का फैसला लिया गया। निगम का मानना है कि बीआरटीएस हटने के बाद सड़कें अधिक खुली होंगी, जिससे ट्रैफिक का दबाव कम होगा।
नागरिकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया
बीआरटीएस हटाने और अब बस स्टॉप तोड़े जाने को लेकर शहरवासियों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है। कुछ लोग इसे जरूरी कदम मानते हैं और मानते हैं कि इससे ट्रैफिक व्यवस्था बेहतर होगी। वहीं कुछ नागरिकों का कहना है कि पहले बीआरटीएस को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए था। हालांकि निगम का तर्क है कि मौजूदा परिस्थितियों में यह फैसला शहर के दीर्घकालिक हित में है।
स्टील प्रबंधन और पारदर्शिता पर जोर
1.53 लाख किलो स्टील का प्रबंधन निगम के लिए बड़ी जिम्मेदारी है। अधिकारियों का कहना है कि हर किलो स्टील का हिसाब रखा जाएगा और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होगी। किसी भी तरह की अनियमितता से बचने के लिए रिकॉर्ड, वीडियोग्राफी और थर्ड पार्टी ऑडिट जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं।
आगे की योजना क्या है
बस स्टॉप और रेलिंग हटाने के बाद निगम की योजना सड़कों के पुनर्विकास की है। इनमें नई लेन मार्किंग, फुटपाथ सुधार, साइकिल ट्रैक और स्मार्ट ट्रैफिक सिग्नल जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं। उद्देश्य यह है कि बीआरटीएस हटने के बाद खाली हुई जगह का उपयोग शहर की जरूरतों के अनुसार किया जाए।
निष्कर्ष
इंदौर में बीआरटीएस बस स्टॉप तोड़ने के लिए नए टेंडर की तैयारी केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह शहर के भविष्य की यातायात व्यवस्था से जुड़ा बड़ा फैसला है। 1.53 लाख किलो स्टील की रिकवरी, ठेकेदारों के लिए नई जिम्मेदारियां और नागरिकों के लिए संभावित राहत, यह सब मिलकर इस फैसले को बेहद महत्वपूर्ण बना देता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि निगम इस चुनौती को कितनी कुशलता से पूरा करता है और इंदौर को एक बेहतर ट्रैफिक मॉडल की ओर ले जाता है।
