उत्तर प्रदेश के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट पद पर तैनात रहे अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे ने देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था से जुड़े एक बड़े और संवेदनशील मुद्दे को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। उनका इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक घटनाक्रम नहीं बनकर रह गया, बल्कि इसके साथ विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के नए नियमों पर देशभर में बहस तेज हो गई। इस बहस ने राजनीति, समाज, शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे कई पहलुओं को एक साथ जोड़ दिया है।

अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे के पीछे जो कारण बताए, उन्होंने उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता और भेदभाव से जुड़े नए नियमों को सीधे सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। उन्होंने यह आरोप लगाया कि उत्तर प्रदेश में एक तरह का ब्राह्मण विरोधी माहौल बनाया जा रहा है और साथ ही यूजीसी के नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को अपराधी की तरह देखने की मानसिकता को बढ़ावा देते हैं।
उनके इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों और छात्र संगठनों तक, हर जगह यूजीसी के नए नियमों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगीं।
यूजीसी के नए नियम आखिर हैं क्या
यूजीसी ने 13 जनवरी को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम 2026 जारी किया। इन नियमों का घोषित उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना और किसी भी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना है। ये नियम सरकारी और निजी, दोनों तरह के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों पर समान रूप से लागू होंगे।
नए प्रावधानों के तहत हर उच्च शिक्षण संस्थान में एक ‘इक्विटी सेल’ या ‘समता प्रकोष्ठ’ का गठन अनिवार्य किया गया है। यह इक्विटी सेल एक तरह से आंतरिक न्यायिक व्यवस्था की तरह काम करेगी, जहां छात्र या छात्राएं यह शिकायत दर्ज करा सकेंगे कि उनके साथ किसी भी आधार पर भेदभाव हुआ है। यदि समिति को शिकायत सही लगती है तो वह संस्थान को तत्काल कार्रवाई की सिफारिश करेगी।
यूजीसी का कहना है कि यह व्यवस्था इसलिए जरूरी है ताकि छात्रों को भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने के लिए बाहरी मंचों पर न जाना पड़े और कैंपस के भीतर ही समाधान मिल सके।
समानता की परिभाषा और विवाद की जड़
नए नियमों का मूल उद्देश्य धर्म, जाति, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान, विकलांगता या सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकना है। इसमें विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और दिव्यांग छात्रों को संरक्षण देने की बात कही गई है।
लेकिन विवाद की असली जड़ जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा में बदलाव को माना जा रहा है। पहले के मसौदे में जातिगत भेदभाव से सुरक्षा का दायरा केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक सीमित था। अब नए नियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी को भी इस श्रेणी में शामिल कर लिया गया है।
कुछ वर्गों का कहना है कि यह विस्तार सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है, क्योंकि इससे उनके खिलाफ झूठे या दुर्भावनापूर्ण आरोप लगाए जाने की संभावना बढ़ सकती है।
इक्विटी कमेटी की संरचना पर सवाल
नए नियमों के तहत बनने वाली इक्विटी कमेटी में ओबीसी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दिव्यांग वर्ग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है। इस समिति का काम भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करना और निष्पक्ष सिफारिश देना है।
विरोध करने वालों का तर्क है कि समिति की संरचना में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधि का उल्लेख न होना निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। उनका कहना है कि जब जांच करने वाली समिति में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा, तो फैसलों पर पक्षपात का आरोप लगना स्वाभाविक है।
इसी आशंका के चलते सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोग इन नियमों को ‘जनरल कैटेगरी विरोधी’ करार दे रहे हैं।
अलंकार अग्निहोत्री के आरोप और उनका प्रभाव
अलंकार अग्निहोत्री ने अपने इस्तीफे के बाद यह कहा कि यूजीसी के नए नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को पहले से ही संदेह के घेरे में खड़ा कर देते हैं। उनके अनुसार, यह नियम एक ऐसा माहौल बना सकते हैं जहां सामान्य वर्ग के छात्रों को हर समय खुद को निर्दोष साबित करना पड़े।
उनके इस बयान ने इस मुद्दे को प्रशासनिक गलियारों से बाहर निकालकर आम जनमानस की बहस बना दिया। कई संगठनों ने इसे सामान्य वर्ग के खिलाफ साजिश बताते हुए विरोध प्रदर्शन की घोषणा कर दी।
सड़कों पर उतरे संगठन और बढ़ता विरोध
करणी सेना जैसे संगठनों ने खुले तौर पर यूजीसी के नए नियमों का विरोध करने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि ये नियम सामाजिक समानता के नाम पर एक वर्ग विशेष को निशाना बना रहे हैं। उनका तर्क है कि कानून का उद्देश्य सभी के लिए समान होना चाहिए, न कि किसी एक वर्ग को प्राथमिकता देना।
इन संगठनों का मानना है कि यदि नियमों में संशोधन नहीं किया गया, तो यह उच्च शिक्षा संस्थानों में टकराव और अविश्वास का माहौल पैदा करेगा।
सरकार का पक्ष और ओबीसी को शामिल करने का तर्क
सरकार और यूजीसी का पक्ष इससे अलग है। उनका कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी छात्रों को भी लंबे समय से भेदभाव का सामना करना पड़ता रहा है, लेकिन उनकी शिकायतें अक्सर सामने नहीं आ पाती थीं। इसी कमी को दूर करने के लिए ओबीसी को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है।
इस संबंध में शिक्षा से जुड़ी संसदीय समिति ने भी सिफारिश की थी कि ओबीसी छात्रों को समान सुरक्षा दी जाए। इसी सिफारिश के आधार पर नियमों में यह बदलाव किया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सवाल
राजनीतिक दलों के भीतर भी इस मुद्दे पर एकरूपता नहीं है। कुछ नेताओं ने नए नियमों की मंशा का समर्थन किया है, तो कुछ ने इसके क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं।
प्रियंका चतुर्वेदी ने इस अधिसूचना पर सवाल उठाते हुए कहा कि कैंपस में किसी भी प्रकार का जातिगत भेदभाव गलत है, लेकिन कानून को समावेशी और संतुलित होना चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा कि झूठे मामलों की स्थिति में क्या प्रक्रिया होगी और दोष तय करने के मानदंड क्या होंगे।
उनका कहना है कि कानून की भाषा और उसका क्रियान्वयन स्पष्ट, सटीक और सभी के लिए समान होना चाहिए, ताकि किसी भी तरह की गलतफहमी या दुरुपयोग की गुंजाइश न रहे।
वहीं दूसरी ओर निशिकांत दुबे ने इन नियमों का बचाव करते हुए कहा कि संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है और यह नियम किसी एक वर्ग के खिलाफ नहीं है। उनका कहना है कि यह नियम अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्गों के साथ-साथ सामान्य वर्ग पर भी समान रूप से लागू होगा।
समाज और शिक्षा के बीच खड़ी नई चुनौती
यूजीसी के नए नियमों ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि समानता और निष्पक्षता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक ओर जहां भेदभाव से पीड़ित वर्गों को सुरक्षा देना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर यह भी उतना ही आवश्यक है कि किसी भी कानून का दुरुपयोग न हो।
उच्च शिक्षा संस्थान केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे समाज का प्रतिबिंब भी होते हैं। ऐसे में वहां लागू होने वाले नियमों का असर पूरे समाज पर पड़ता है।
निष्कर्ष: समाधान या नया विवाद
यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य भले ही समानता को बढ़ावा देना हो, लेकिन जिस तरह से इनका विरोध हो रहा है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि नियमों की व्याख्या और क्रियान्वयन को लेकर और स्पष्टता की जरूरत है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार और यूजीसी इस बढ़ते विवाद को संवाद और संशोधन के जरिए कैसे सुलझाते हैं।
